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ऊन और पोल्ट्री पंख अपशिष्ट को पशुओं के लिये चारा और उर्वरक में बदलने की एक नई विधि विकसित

इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी मुंबई के कुलपति प्रोफेसर ए बी पंडित ने अपने छात्रों के साथ केराटिन अपशिष्ट को पालतू जानवरों के भोजन और पौधों के लिए उर्वरकों में बदलने की एक तकनीक विकसित की है
    भारतीय वैज्ञानिकों ने मानव बालऊन और मुर्गी के पंखों जैसे केराटिन अपशिष्ट को उर्वरकोंपालतू जानवरों और जानवरों के चारे में बदलने के लिए एक नया टिकाऊ और किफायती समाधान विकसित किया है। भारत हर साल बड़ी मात्रा में मानव बालमुर्गी के पंखों के अपशिष्ट और ऊन के अपशिष्ट का उत्पादन करता है। इन अपशिष्ट को फेंक दिया जाता हैजमीन में दबा दिया जाता हैलैंडफिलिंग के लिए इस्तेमाल किया जाता हैया जला दिया जाता हैजिससे पर्यावरणीय खतरेप्रदूषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बढ़ जाता है और ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि होती है। ये अपशिष्ट अमीनो एसिड और प्रोटीन के सस्ते स्रोत हैंजो पशु चारा और उर्वरक के रूप में उपयोग किये जाने की उनकी क्षमता को रेखांकित करते हैं।
    इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी मुंबई के कुलपति प्रोफेसर ए बी पंडित ने अपने छात्रों के साथ केराटिन अपशिष्ट को पालतू जानवरों के भोजन और पौधों के लिए उर्वरकों में बदलने की एक तकनीक विकसित की है। पेटेंट की जा चुकी यह नई तकनीकआसानी से बड़े स्तर पर इस्तेमाल योग्यपर्यावरण के अनुकूलऊर्जा-दक्ष हैऔर यह अमीनो एसिड युक्त लिक्विड फर्टिलाइजर को वर्तमान में बाजार में मिल रहे उत्पादों की तुलना में अधिक किफायती बनाएगी।
    उन्होंने अपशिष्ट को बिक्री योग्य उर्वरकों और पशु आहार में बदलने के लिए उन्नत ऑक्सीकरण का उपयोग किया। इसके पीछे की प्रमुख तकनीक में शुरुआती प्रक्रिया के बाद हाइड्रोडायनैमिक केविटेशन नाम की एक तकनीक के जरिये केराटिन का जल-अपघटन शामिल हैजिसमें बहते तरल में वाष्पीकरणबबल फॉर्मेशन और बबल इम्प्लोशन का इस्तेमाल किया जाता है।  
    इस तरह के रूपांतरण के लिए मौजूदा रसायनिक और भौतिक तरीकों में ऊर्जा का अधिक इस्तेमाल होता हैऔर ये रासायनिक रूप से खतरनाक हैंऔर इसमें कई चरण शामिल होतें हैं जिसके परिणामस्वरूप अंतिम उत्पाद की लागत बढ़ती है। इस तकनीक के साथजैसा कि टीम द्वारा गणना की गयी है,  बड़े पैमाने पर स्थापित संयंत्र में प्रति टन कच्चे माल को संसाधित करने की लागतबाजार में मौजूदा उत्पाद की तुलना में गुना सस्ती है।
    वैज्ञानिक वर्तमान में रेवोल्टेक टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेडगुजरात के सहयोग से इस तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू कर रहे हैं। उत्पादन में इस प्रगति से तरल जैवउर्वरक जो कि बाजार में मौजूद उत्पादों की तुलना में तीन गुना अधिक कारगर हैंकिसानों को सस्ती दर पर उपलब्ध होंगे।
अधिक जानकारी के लिएप्रोफेसर एबी पंडितकुलपतिरासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थानमाटुंगामुंबई (ab.pandit@ictmumbai.edu.in) से संपर्क करें।

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