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दर्पण : परिवर्तन का शास्त्र व शस्त्र आद्य संपादक बालशास्त्री जांभेकर

6 जनवरी दर्पण दिन के अवसर पर विशेष लेख...
राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ तभी होगा जब समाज सुधरेगा। यह मत आचार्य बालशास्त्री जांभेकर का मत था। समाचार पत्रों में सार्वजनिक जीवन में मंथन करने की बड़ी शक्ति होती है। इसका उपयोग सामाजिक परिवर्तन के लिए किया जा सकता है, बालशास्त्री जांभेकर ने इसका अध्ययन किया, इसलिए उन्होंने उस समय की गलत परम्पराओं पर प्रहार किया। बालशास्त्री जांभेकर धार्मिक और सामाजिक सुधारों के प्रति प्रगतिशील व्यवहारवादी थे, इसलिए उन्होंने दर्पण का प्रयोग एक शास्त्र और सामाजिक परिवर्तन के हथियार के रूप में किया।
आचार्य बालशास्त्री जांभेकर ने 6 जनवरी 1832 को मुंबई में अंग्रेजी और मराठी भाषाओं में एक पाक्षिक, दर्पण शुरू करके एक मराठी समाचारपत्र शुरू किया। दर्पण दिवस पर विशेष लेख...

6 जनवरी, 1832 को बालशास्त्री ने पाक्षिक दर्पण शुरू करके मराठी अखबारों के युग की शुरुआत की। उस घटना को 191 साल हो चुके हैं। उनके इस महान कार्य की स्मृति में राज्य में प्रतिवर्ष 6 जनवरी को ‘दर्पण दिवस’ मनाया जाता है।
बालशास्त्री ने उस समय शुरू हुई प्रिंटिंग प्रेस का वास्तविक उपयोग किया और सामाजिक जागरण के लिए के लिए दर्पण को ज्योति के रूप में उसकी लौ को जलाए रखा। दर्पण के माध्यम से उन्होंने शिक्षा एवं मनोरंजन का समन्वय किया। दर्पण अंग्रेजी शिक्षा का मराठी सार बन गया। दर्पण का अंतिम अंक 25 जून 1840 को प्रकाशित हुआ था। आचार्य बालशास्त्री जांभेकर को मराठी में प्रथम संपादक होने का गौरव प्राप्त हुआ। बालशास्त्री जांभेकर ने दर्पण समाचार पत्र की रचना ही नहीं बल्कि समाज सुधार का कार्य भी किया। वास्तव में वे समाज सुधार के पक्ष में आग्रहपूर्ण थे।
सामाजिक सुधार पर जोर
आचार्य बालशास्त्री जांभेकर ने समाज सुधार, शिक्षा और समाचार पत्रों के प्रसार के लिए किया गया कार्य असाधारण है। उनके काम के सम्मान में मुंबई के तत्कालीन गवर्नर सर जेम्स कॉनॉक ने 1840 में बालशास्त्री को जस्टिस ऑफ द पीस की उपाधि से सम्मानित किया। आज समाचार पत्र की भव्यता की गई प्रगति को दर्शाती है, लेकिन आचार्य बालशास्त्री जांभेकर ने उस समय बहुत ही खराब हालत में अखबार चलाने का काम किया। न्यायमूर्ति एन.जी.चंदावरकर ने आचार्य बालशास्त्री जांभेकर के बारे में कहा है कि बालशास्त्री शीर्ष अंग्रेजी अभ्यास के एक महान विद्वान होने के साथ-साथ ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में ज्ञान फैलानेवाले पंडित भी थे। न्यायाधीश का उपरोक्त कथन बालशास्त्री के शैक्षिक कार्यों का संक्षिप्त विवरण है। आचार्य अत्रे ने बालशास्त्री जांभेकर के बारे में एक बहुत ही महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। वह लिखते है कि बालशास्त्री जांभेकर वक्ता नहीं बल्कि सुधारक थे। बालशास्त्री ने न केवल एक प्रोफेसर के रूप में अध्ययन किया बल्कि अपने दर्पण के माध्यम से सामाजिक सुधार पर जोर दिया। आचार्य अत्रे ने यह भी कहा है कि उन्होंने मुंबई महानगर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में मूल्य जोड़ा।
लोक कल्याण और लोक शिक्षा
समाचार पत्रों का इतिहास जनता और आंदोलनों का इतिहास है। समाचार पत्र समाजीकरण की प्रक्रिया को तेज करते हैं। उसके द्वारा लोगों को सामाजिक संकेतों, कार्यात्मक भूमिकाओं और मूल्यों के बारे में शिक्षित करता है। ऐसा जाने-माने मीडिया विशेषज्ञ ए.ए. बर्जर ने कहा। तद्नुसार आचार्य जांभेकर ने केवल लोक कल्याण और लोक शिक्षा के महान उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ‘दर्पण’ का प्रकाशन किया। 1832 का काल निस्संदेह ब्रिटिश शासन का काल था। देशभक्ति के लिए समाज को प्रबोधन की महती आवश्यकता थी। हमारा देश अंग्रेजों के हाथों में था तब हमारे मन में देशभक्ति की भावना जगाने के लिए हमें उस स्थिति से अवगत कराने के लिए एक अखबार होना चाहिए, ऐसा बालशास्त्री ने महसूस किया और दर्पण शुरू किया। दर्पण में उन्होंने एक भी विज्ञापन नहीं छापा। अपने पैसे डालकर उन्होंने करीब आठ साल तक लोगों के लिए अखबार जारी रखा। भाऊ महाजन के सहयोग से मराठी तो उन्होंने स्वयं ‘दर्पण’ के लिए अंग्रेजी पाठ का पक्ष संभाला। अतः ‘दर्पण’ में पाठ की गुणवत्ता उच्च थी।
प्रथम व्याख्याता- शिक्षा निदेशक
बालशास्त्री जांभेकर ग्यारह वर्ष की आयु में संस्कृत की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई पहुंचे। उन्होंने मुंबई में अंग्रेजी का गहन अध्ययन कर विभिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त किया। उनकी रुचि इस बात में थी कि हमारे समाज में ज्ञान का उपयोग कैसे किया जा सकता है। बालशास्त्री जांभेकर ने कड़ी मेहनत करके उस समय की लगभग नौ देशी और विदेशी भाषाओं में महारत हासिल कर ली थी। बालशास्त्री को वर्ष 1834 में भारत के प्रथम प्राध्यापक बनने का गौरव भी प्राप्त हुआ। वह 1845 में शिक्षा निदेशक बने। उन्होंने विभिन्न विषयों पर किताबें लिखीं। इसमें मुख्य रूप से भूगोल, इतिहास, भौतिकी, गणित, खगोल विज्ञान, मनोविज्ञान आदि विषय शामिल हैं। ये किताबें आसान और सरल मराठी भाषा में हैं जिन्हें हर कोई समझ सकता है। इसके साथ ही उन्होंने बालव्याकरण, भूगोलविद्या, सारसंग्रह और नीतिकथा चार पुस्तकें लिखी हैं। एलिफिन्स्टनकृत हिंदुस्थान के आधार पर उन्होंने इतिहास रचा। 1851 में उनकी मृत्यु के बाद हिंदुस्तान का प्राचीन इतिहास पुस्तक प्रकाशित हुई थी। बालशास्त्री अपने छात्रों के बीच लोकप्रिय थे। उनके शिष्यों की सूची में दादाभाई नौरोजी, डॉ. भाऊ दाजी, नारायण दाजी, प्रा. केरो लक्ष्मण छत्रे, डॉ. आत्माराम पांडूरंग, नाना नौरोजी, नौरोजी बेहरामजी, रामचंद्र बालकृष्ण, वासुदेव पांडूरंग, अर्देसर फ्रान्सिस मूस, दफ्तदार केशवराव नरसिंह सहित अन्य गणमान्य व्यक्तियों का समावेश है। 
प्रथम संपादक, समाज सुधारक, शिक्षाविद् जैसे बहुआयामी व्यक्तित्ववाले आचार्य बालशास्त्री जांभेकर ने उस समय की गई मेहनत कठिनाई का भाव निश्चित रूप से आज की मीडिया क्रांति को देखकर उस समय की मेहनत से वाकिफ थे। उनके इस महान कार्य के लिए उन्हें शत शत नमन। 

डॉ. राजू पाटोदकर
उप निदेशक (सूचना), पुणे

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