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कृतार्थ

एक शिष्य का अपने गुरु के लिए लिखा गया भावनाओं का सार... अपने मन के विचारों को शब्दों में पिरोते हुए अपने मन की आवाज को गुरु समक्ष प्रस्तुत किया गया है। 
कृतार्थ के विषय में अपने गुरु माननीय श्री हरि मुस्तिकर को उनके शिष्य विलास बाबर द्वारा लिखा गया एक खुला पत्र...

प्रिय महोदय,
सस्नेह नमस्ते, 
मैं आपसे क्या कह सकता हूँ...?

साहब, सर, एचआरएम या हरि दादा? क्योंकि मैंने जीवन के हर खास मोड़ पर इन सभी नामों से आवाज दी और आपने मेरी आवाज को हमेशा प्रतिसाद दिया।
दादा, आपके बड़े भाई जैसे स्वभाव के कारण, आपसे दिल खोलकर बात करने का साहस कभी नहीं हुआ। बस आपका आदेश, आपकी आज्ञा पालन से ही हम चले हैं। मैं आपके बारे में अपने मन की भावनाओं को आपके सामने व्यक्तिगत रूप से या फोन पर विस्तार से व्यक्त नहीं कर सकता हूं। इसका मुझे पूरा एहसास है क्योंकि आज भी आपकी आदर भरी दृष्टि मुझ पर बनी हुई है। आपसे ही मैंने कम से कम शब्द बोलकर दूसरी ओर से ढेर सारा काम निकालने का सिद्धांत सीखा है, लेकिन आज इस अप्रकाशित पत्र में मैं अपनी भावनाओं को रोके बिना अपने विचारों को शब्दों में पिरोने जा रहा हूँ।
हाल ही में आपके 78 वें जन्मदिन के अवसर पर मैं एक बहुत ही शानदार और शुभ कार्यक्रम में आपके साथ शामिल हो सका और मुझे इस कार्यक्रम की अनुमति और जिम्मेदारी देने के लिए आपका तहेदिल से बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं।
सबसे पहले तो आपको जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं। आपकी महानता अद्वितीय है क्योंकि कृतार्थ गौरव ग्रंथ अनावरण समारोह की मुख्य अध्यक्षता का डॉ. प्रदीप (बाबासाहब) तराणेकर महाराज ने उत्साहपूर्वक स्वीकार की। इसके लिए वह एक दिन पहले ही सपत्निक इंदौर से पधारे। यह हमें आपकी और उनकी आध्यात्मिक आत्म- चेतना और ऋणानुबंध को दर्शाता है। दादा, केवल आपके नाम का उपयोग करके मुकुल व गौरी ने पुण्यनगरी के भूषण, समाज मार्गदर्शक नेता पूर्व विधायक उल्हास दादा पवार से संपर्क किया। तब वे तुरंत अतिथि बनने के लिए तैयार हो गये और मैं मुस्तिकर दादा के बारे में एक लेख प्रस्तुत करना चाहता हूं, क्या अब भी अवसर मिल सकता है? ऐसा पूछने पर अंक तैयार होने के कारण उस समय मैंने कृतार्थ रिटर्न्स के दूसरे भाग में लेख शामिल करेंगे, ऐसा मजाक में उनके सवाल का जवाब दिया। 
हम सभी के पसंदीदा, हमारे भाग्यविधाता, प्राणहर और गुरु, किर्लोस्कर न्यूमैटिक कंपनी के अध्यक्ष श्री राहुल जी किर्लोस्कर को जब हम 10 अगस्त को मिले और उन्हें बताया कि आप मुख्य अतिथि के रूप में इस समारोह में उपस्थित रहें, यह हम सभी की मनोकामना हैं, तो उन्होंने भी विना विलंब किए मैं आऊंगा कि पुष्टि की। जिसके अनुसार वह तय समय पर विष्णु कृपा हॉल पहुंच गए। इन सभी महानुभावों ने आपके गौरव समारोह में सम्मिलित होने का निमंत्रण स्वीकार किया और पधारकर खूब बोल बोले क्योंकि आपने कमाए हुए बेहद मधुर रिश्तों की वजह से इस अवसर पर मुझे इन सबका अनुभव समारोह में महसूस करना प्राप्त हुआ।
इस सम्मान समारोह की उत्सव मूर्ति यानी आप (हम सभी के आदर्श, किर्लोस्कर न्यूमैटिक्स के पूर्व प्रबंध निदेशक, श्री हरि रामचन्द्र मुस्तिकर उर्फ दादा) और आपकी अर्धांगिनी लता मुस्तिकर कार्यक्रम स्थल पर लक्ष्मी-विष्णु की जोड़ी का आश्चर्यजनक रूप मनमोहक लग रही थी। मेरी एक और पसंदीदा जोड़ी मुकुल और गौरी थी, जिन्होंने मुस्कुराते हुए सभी लगभग 200 मेहमानों का स्वागत किया। वे सभी से खुशी-खुशी मिल रहे थे, बातें कर रहे थे। मेरे मित्र विजय घमंडे और अशोक पाटिल जैसे धुरंदर नेतृत्व सभी अग्रणों पर उनका मार्गदर्शन कर रहे थे।
दादा, आपके कारण ही मैं इन महानुभावों के साथ मंच पर बैठने से स्वयं को सौभाग्यशाली महसूस करता हूँ। मेरे दाहिने हाथ पर आपका बेटा मिलिंद मुस्तिकर के होने से मुझे समारोह के समन्वय की जिम्मेदारी से डर नहीं लग रहा था। कार्यक्रम की शुरुआत में बहुत ही मधुर आवाज में प्रांजलिताई बर्वे की शारदा स्तवन को बहुत ध्यान से मैं सुन रहा था, लेकिन नज़र सामने की ओर चमक रही थी। चूँकि मेरे मार्गदर्शक प्रमोद देशपांडे सर और इस समारोह का मेरा साथी व संपादक मित्र सुधीर मेथेकर और ग्रंथ प्रकाशक भालचंद्र कुलकर्णी पहली पंक्ति में विराजमान होने से मुझे ऑल इज वेल का एहसास हो रहा था।
कंपनी के वरिष्ठजन, गुरुजन, किर्लोस्कर न्यूमैटिक कंपनी के मेरे प्रिय सहकर्मी, हमारे केपीसीएल डायमंड व्हाट्सएप ग्रुप के सदस्य, पूरा मुस्तिकर परिवार, उनके रिश्तेदार और पूरी मंडली शांति से इस स्तवन को सुन रही थी। सम्पूर्ण वातावरण सुरमय और पवित्र अनुरोध से अभिभूत हुआ था। मंच पर दादा आप एक छोर पर थे और मैं दूसरे छोर पर नहीं बोलने पर भी मुझे थोड़ी चिंता हो रही थी। मेरा सामान्य समर्थन यानी आप मुझसे दूर थे। फिर स्वानंद ने मेरे नाम का उच्चारण किया क्योंकि मुझे स्वागत और परिचय देना था। जब मैं बोलने के लिए उठा तो मैंने आपकी ओर देखा तब मुझे आपकी ओर देखकर महसूस हुआ कि आपने मुझे अपनी आंखों से आशीर्वाद दे दिया है कि ‘मैं हूं ना।’
दादा, क्या मैं आपको सच बता सकता हूं, स्वागत और परिचय देते समय मुझे बस केवल इतना ही याद रहा है कि मैंने अपना नाम विलास बाबर के रूप में शुरू किया और मैंने 25 वर्षों तक किर्लोस्कर न्यूमैटिक कंपनी में सेवा की। कार्यक्रम के बाद जब प्रमोद देशपांडे और उपस्थितों ने मुझसे कहा कि आपने स्वागत और परिचय बखूबी दिया तो मुझे विश्वास हो गया कि जरूर कुछ अच्छा हुआ है क्योंकि मैं अभिभूत हुआ था, इसलिए आँखों के सामने तो यादों की फ़्लैशबैक का पिक्चर चालू था। जो बहुत तेज़ था, क्या कहें और क्या न कहें? विचार स्पष्ट थे, शब्द विचारोत्तेजक थे, मन स्थिर था, वाणी दृढ़ थी, भाषण में क्या और कितना शामिल करना है? यह लेकिन मैंने तय नहीं किया था। सिर्फ दस मिनट में अपने विचार व्यक्त करने का लक्ष्य सामने रखा था।
फ्लैशबैक में बस मेरी आंखों के सामने 1982 में प्रशिक्षु इंजीनियर विलास से लेकर 2011 में महाप्रबंधक के पद से मेरी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति तक का सफर, साथ ही पिछले 12 वर्षों से मेरा खुद का उद्योग एवं समूह और समूह का अध्यक्ष का सफर मेरे सामने घूम रहा था। इनमें ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, चीनी और इथेनॉल परिवहन इन उद्योग की जो प्रगति हुई वो मेरे समक्ष दिख रही थी। अगले पांच वर्षों के लिए मेरा विज़न, मिशन और मूल्य मेरे तैयार हैं। एक परिवार के रूप में एक साथ एक छत के नीचे हम सभी खुशी खुशी रह रहे हैं। जीवन में आपको आदर्श मानकर एवं अनुसरण करते हुए एक आदर्श परिवार मुखिया के रूप में जीवन जीने का प्रयास कर रहा हूँ। यह सब कुछ मुझे बताना था, लेकिन हरिनाम, हरिमहिमा या समय की कमी के कारण यह सब बताना संभव नहीं हो पाया था।
दादा, हमारे केपीसी में काम कर चुके 225 कर्मियों का केपीसीएल डायमंड नाम से एक व्हाट्सएप ग्रुप है। हम सभी पूर्व केपीसी कर्मियों की दिल से यही मनोकामना थी कि आपका अमृतजयंती जन्मदिन यानी 75 वां जन्मदिन (3 साल पहले यानी 2020) में बड़े पैमाने पर मनाना चाहते थे, लेकिन उस वक्त पूरी दुनिया में कोरोना की पहली लहर फैल चुकी थी, लॉकडाउन जारी था, इसलिए अमृत महोत्सव का आयोजन नहीं हो सका। उसके बाद के वर्ष हमने आपके पानशेत फार्म हाउस में 76 वां और पिछले वर्ष 77 वां जन्मदिन उत्सव गारवा रिज़ॉर्ट में अपने तरीके से मनाया। हालाँकि इस वर्ष आपके 78 वें जन्मदिन पर मैंने स्वयं और कुछ मित्रों ने (सुधीर मेथेकर, चांदेकर, प्रमोद देशपांडे, निरगुडकर, घमंडे और कई अन्य) 78 लेखों का गौरव ग्रंथ प्रकाशित करने का निर्णय लिया था। तद्नुसार, कृतार्थ नामक यह गौरवग्रंथ प्रकाशित हुआ और मेरा एक सपना साकार हो गया है। सर मैं हमेशा आपसे आत्मकथा लिखने का आग्रह करता था, आपसे मिलने पर हर बार हमेशा उसी बात पर जोर देता था, लेकिन आपने इसकी बिल्कुल भी सराहना नहीं की बल्कि जवाब में हमेशा कहते थे कि मैंने ऐसा क्या विशेष किया है कि मैं अपनी आत्मकथा लिखूं? आप ऐसा कहते थे और हमेशा मेरा प्रस्ताव अस्वीकार कर देते थे।
सर, मैं जीवन में आज जो कुछ भी हूं बस आपकी वजह से हूं, मेरी तरह मेरे दोस्तों का भी जीवन आपके कारण  बदल गया है। ऐसी कई सफलता की कहानियाँ हैं। मेरे जैसे कई लोगों के मन में आपके प्रति यादगार अभिमान की गर्व की घटनाएँ घटी हैं। आप पर हमें बहुत-बहुत गर्व है, इसलिए भले ही आप अपनी आत्मकथा नहीं लिखने जा रहे हों, लेकिन मैंने उन सभी भावनाओं को लिखने और आपके बारे में एक प्रशंसा की एक पुस्तक प्रकाशित करने का संकल्प लिया है और मैं अनिच्छा से ही सही आपकी अनुमति के लिए दिल से धन्यवाद देता हूं। कृतार्थ इस गौरवशाली ग्रंथ के प्रकाशन के लिए संपादक श्री सुधीर मेथेकर, मुकुल, गौरीताई और लता भाभी तथा एकवीरा प्रकाशन ने काफी प्रयास किया हैं, इसलिए ही यह भव्य कृतार्थ समारोह संपन्न हो सका।
आपके स्कूल के सहपाठी शशिकांत, जे.जे. कुलकर्णी, अमेरिका से रमेश मुंदड़ा के लेख आने की शुरूआत हुई। 80 सदस्यों ने आपके सान्निध्य की सबसे मार्मिक हृदयस्पर्श करनेवाली घटनाओं को अपने-अपने शब्दों में व्यक्त होते हुए लेख में लिखा है। इस पुस्तक में आपके मुस्तिकर परिवार के वरिष्ठ सदस्यों, भाई, बहन, भतीजे, बेटे, बहुएं, पोते-पोतियों के साथ-साथ लता भाभी और अन्य सदस्यों की भावनाओं का मिलाप इस ग्रंथ में व्यक्त किया गया है।
आपने बचपन से ही देवत्व एवं अध्यात्म का अध्ययन करने को प्राथमिकता दी। आपने 65 साल की उम्र के बाद रिटायरमेंट होने के बाद तो पूरा जीवन गुरु महाराज के साथ- साथ त्रिपदी परिवार को ही समर्पित किया है। आध्यात्मिक स्तर पर आप अपना जीवन बहुत ही शांत, सात्विक और गरिमामय तरीके से जी रहे हैं। इसके संबंध में कुछ संस्मरण आपके आध्यात्मिक सहयोगियों देगलूरकर महाराज, पागे सर एवं अन्य लोगों ने बहुत अच्छे ढंग से हमें समय पर आपके व्यक्तित्व के बारे में अपने विचार व्यक्त करनेवाले लेख सुपुर्द किए। खास बात यह है कि उस समय के आपके सहयोगी मित्र  बी.पी.साहनी, दादा ठाकुर, आर. शंकर, बंसल, आर. डी. कटारिया, मदन लाल, रंजीत लांबे, अजीत पवार, एल.पी. श्रीवास्तव (जो इस कार्यक्रम के लिए विशेष रूप से दिल्ली से पधारे थे) उन्होंने अपने उपकरण और स्पेयर पार्ट का व्यवसाय साहब के मार्गदर्शन में कैसे बढ़ाया, इसके बारे में लिखा है।
सर, आपकी वार्ता में हमेशा किर्लोस्कर परिवार के श्रीकांत भाऊ और शशिताई के प्रति बहुत सम्मान महसूस होता था। आप कहते रहते हैं कि राहुल सर के समर्थन के बिना कुछ भी संभव नहीं होता। उसकी पुष्टि व समर्थन आज राहुल साहब के भाषण से हम सभी को इसका एहसास हुआ। हमें बहुत गर्व महसूस हुआ क्योंकि सभी की ओर से माननीय राहुल साहब ने आपको बधाई दी कि आज किर्लोस्कर न्यूमैटिक कंपनी ने पिछले साल 1200 करोड़ का टर्नओवर और 100 करोड़ का मुनाफा हासिल किया है और यह विजन मुस्तिकर साहब ने अपने कैरियर के दौरान देखा था, मैं उनके इस योगदान को कभी भी नहीं भूलूंगा। उस साकार किये गये स्वप्न का शाब्दिक वर्णन आरसीके साहब के भाषण में सुनकर सभी केपीसीएन को खुशी और गर्व महसूस हुआ।
सर, आपके संबंध में 2005 की खंडेनवमी एवं विजयादशमी के कार्यक्रम में अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में रहते समय पूर्णतः आपकी उचित दृढ़ इच्छा शक्ति और आपके मार्गदर्शन में हमारे द्वारा वायु सेना एवं हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स कंपनी से व्यवस्था की गई नाइट्रोजन ट्रॉली का निरीक्षण व आपकी इच्छाशक्ति के कारण समय पर किया गया डिस्पैच की जो स्मृति मैंने कार्यक्रम में बताई, वह सभी को बहुत पसंद आई। आपकी दृढ़ इच्छाशक्ति उस विपरीत परिस्थितियों में भी कई लोगों को काम करने और प्रभावशाली सफलता दिलाने में सक्षम बनाती है उसका वह ज्वलंत उदाहरण था। किर्लोस्कर न्यूमैटिक कंपनी को वायु गति से प्रगति करनी चाहिए, इससे संबंधित आपके प्रसंग की कई यादें आज भी मेरे मन में हैं। यदि हम उन्हें लिखते रहें तो बड़ी मात्रा में शब्द के महाखंड बन जायेंगे। 
आनंद समारोह में हमने आपको जो सम्मान प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया था, उसे संपादक और केपीसीएल के मेरे पूर्व सहयोगी सुधीर मेथेकर ने बहुत रचनात्मक ढंग से तैयार किया था। उन्हें मेरे और एक अन्य सहयोगी श्री पुरूषोत्तम थेटेजी ने सम्मानपत्र सुलेखन करके उसे फ्रेमबद्ध व प्रेमबद्ध किया। इस सम्मान प्रमाण पत्र का आपने सार्वजनिक स्वीकृति करने के लिए मैं आपका आभारी हूं। 
सर, आप यानी सीईओ निर्माण करनेवाला ज्ञानपीठ यूनिवर्सिटी हो। आपके नेतृत्व में तैयार हुई हमारी पीढ़ी जैसे कि मैं स्वयं, श्री. प्रमोद देशपांडे, गिरीश गरुड, अनिल सागले, मिथुन चक्रवर्ती, कपिल मल्होत्रा और कई लोग अब सीईओ या एमडी के रूप में काम कर रहे हैं।
वी. शांताराम की प्रसिद्ध फिल्म दो आंखें, बारह हाथ के जैसे हमारी दो आंखों यानी आप सक्षम और धैर्यवान ऐसे हमारे वरिष्ठ और आपके बारह हाथ यानी हम थे। उसमें से इरसल कैदियों की तरह शुरू में लापरवाह थे, लेकिन अब जीवन में सुधार हुआ है। मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि मैं एक बिजनेस मैन के रूप में चौतरफा प्रगति कर रहा हूं। आज मेरे दोनों बेटे सारा कामकाज संभालते हैं। दो ़फैक्टरी यूनिट्स हैं। कई विस्तार योजनाएं हैं, मैं आपकी शैली के अनुरूप काम कर रहा हूं। आपके प्रशिक्षण में प्रशिक्षित प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में सर्वोच्च स्थान पर है। उदाहरण के लिए, श्री प्रमोद देशपांडे पिछले दस वर्षों से दिल्ली की नेक्स जेन कंपनी के अध्यक्ष हैं। श्री गिरीश गरूड भारत में स्थित एक इटालियन कंपनी इंट्रा हायड्रोलिक पंप, जिसका 1000 करोड़ का टर्नओवर है, उस कंपनी के एमडी हैं। अनिल सागले हाल ही में सीड नामक बहुराष्ट्रीय कंपनी के कंट्री मैनेजर बने हैं।
मैं जीवन और व्यवसाय में सफल हूं, लेकिन मैं सफल क्यों हूं? क्योंकि जब भी मुझे कोई समस्या आती है तब सिर्फ मुझे मुस्तिकार मंत्र ही याद आता है। उसका मतलब है मैं चाहता हूं, उसके अनुसार एक सकारात्मक योजना बनाता हूं और उस पर अमल करता हूं। सभी चीजें उसके बाद मेरी नजर में मन की तरह और आसानी से हासिल होती हैं।
सर, मैंने परिचयात्मक भाषण में एक बेहतरीन डायलॉग बोला, जिसे सभी दर्शकों ने दिल से सराहा। ओम शांति ओम इस फिल्म में शाहरुख खान की मौखिक पंक्ति जो लॉ ऑफ अट्रैक्शन के बारे में बात करती है- इतनी सिद्दत से मैंने तुम्हें पाने की कोशिश की है... कि हर जर्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साजिश की है। कहते हैं किसी चीज को पूरी सिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की साजिश में लग जाती है। जीवन के हर पड़ाव पर मुझे हर बार यही अनुभव हुआ है। सभी के लिए आत्मीयता, सहयोग के बारे में आत्मविश्वास और राईट मैन एट राईट प्लेस के सिद्धांत के अनुसार मेरी पहचान एक म्यानहैंडलर और मुन्नाभाई एमबीबीएस सर्किट जैसी थी। इस ग्रंथ के प्रकाशन के लिए भी सेम थिंग घटी है। 
कृतार्थ का विमोचन समारोह मैंने दो वर्ष पहले आंखों के सामने महसूस किया था और हाल ही में वैसा ही हुआ, यह आपका ही अनुग्रह एवं कृपा है।
सर, मैंने अपने जीवन में आप जैसा इतना सकारात्मक व्यक्ति कभी नहीं देखा। नेपोलियन हिल की थिंक बिग एंड ग्रो रीच एक व्यावहारिक पुस्तक है, मैंने आपके सान्निध्य मैं सीखी है और वैसे मैं जी रहा हूं। अभी भी आपसे बहुत कुछ सीख रहा हूं, अब आपकी तरह मैं भी आध्यात्मिक यात्रा के लिए तरस रहा हूं। आत्म-चेतना की शुरूआत हो गई है।
इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि श्री राहुल साहब ने अच्छे संस्मरण सुनाये। उन्होंने आपके और कार्यक्रम के बारे में बहुत आत्मीयता से प्रेमपूर्वक बात की। उल्हास दादा पवार ने बैठक का रंग बढ़ाया, आपके बारे में बहुत सारी यादें बताईं, भाषण उच्च कोटि का था। अध्यक्ष बाबासाहब तराणेकर महाराज का भाषण अत्यंत विद्वत्तापूर्ण एवं विचारपूर्ण था। उनके संस्कृत श्लोकों को सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए और अंत में, आपका मनोगत बहुत मर्मस्पर्शी दिल को छू लेनेवाला था। आपका सम्मान, कृतार्थ पुस्तक का विमोचन, डाक टिकट का अनावरण और उसके बाद केक काटना पूरी तरह से भव्य बेहतरीन और आनंददायक था। अंततः हमारे मित्र श्री राजीव बर्वे की पसायदान गायकी ने माहौल को मंत्रमुग्ध कर दिया। ऐसा लग रहा था कि कार्यक्रम ख़त्म ही न हो। 
सर, कार्यक्रम के बाद सभी ने आपसे मुलाकात की और बधाई दी। आपके साथ तस्वीरें लीं। सुगरास, शर्करा एवं सात्विक भोजन का आनंद लिया और समय के भीतर यानी रात के 10 बजे के अंदर हमारा शानदार कार्यक्रम संपन्न हो गया। 
सर, मैंने समारोह में अपना भाषण अपनी स्वरचित एक छोटी सी कविता के साथ समाप्त किया, जो सभी को पसंद आई, मैं आपको यह कविता खत से भेज रहा हूं।

शीर्षक - आमचे दैवत, हरी. .!
आमचे एक्स एमडी पक्के सोलापुरी,
सकल जगात त्यांची पर्सनॅलिटी भारी,
त्यांची उत्कृष्ट कामाची पद्धतच न्यारी,
ध्येयपूर्तीसाठी कायम ते आहेत करारी!
कंपनी प्रगतीसाठी घेतली जबाबदारी,
सोबत सर्वांच्या कल्याणाची खबरदारी,
कामगाराप्रती त्यांची अतुट आहे दिलदारी,
त्यांचाच आदर्श वसा घेतला घरोघरी!
नवनवीन उत्पादनाने वाढवली कीर्ती जगभरी,
समृद्धीची पावले केपीसीत उमटवलीत खरोखरी,
सर्व घटकांवर प्रेमाने ते सदैव कृपाछत्र धरी,
असे सर्वांचे आदरणीय, प्रिय व कर्तबगार हरी!

(कविता का हिंदी अनुवाद) 
शीर्षक- हमारे ईश्वर, हरि...!
हमारे पूर्व एमडी पक्के सोलापुरी,
सारी दुनिया पर है उनकी शख्सियत भारी,
उनकी उत्कृष्ट कार्यशैली है न्यारी, 
लक्ष्य प्राप्ति के लिए हैं सदैव प्रतिबद्ध,  
कंपनी की प्रगति की ली जिम्मेदारी,
साथ ही ली सभी के कल्याण की सावधानी, 
श्रमिकों के प्रति है उनकी अटूट सहानुभूति, 
उनके आदर्श का विरासत है घर-घर, 
नए उत्पाद ने बढ़ाई प्रसिद्धि दुनिया भर,
दरअसल, केपीसी में समृद्धि के कदम उभरे, 
सभी तत्वों पर प्रेम से व हमेशा दयालु, ऐसे सभी के आदरणीय, प्रिय और कृतज्ञ हैं हरि..! 
दादा, आप शतायु हों और अपनी कृपा एवं छाया हम पर बनाये रखें।
धन्यवाद!
आपका कृपाभिलाषी,
विलास बाबर
(अनुवादक- दिनेश चंद्रा, संपादक-हड़पसर एक्सप्रेस)

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