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माध्यमों के शोर में वाणी का मौन

-डॉ. सुनील देवधर
भ्रमणध्वनि : 9823546592
E-Mail-sunilkdeodhar@gmail.com

मैं रेडियो सुनता हूँ
और देखता हूँ
भाषाओं में छुपे चित्र
महसूस करता हूँ
शब्दों की भेष, उसके रंग
बनाता हूँ एक आकृति
और खो जाता हूँ
अपने ही कल्पना लोक में
आकाश के स्वप्न में।
लगभग 90 के दशक तक, समाचारपत्रों के अलावा, शिक्षा, सूचना और मनोरंजन के लिए आकाशवाणी एक मात्र सहज, सुलभ और सस्ता रास्ता था, जो बहुजन के हिताय, उपलब्ध था। आकाशवाणी का ध्येय वाक्य ‘बौद्ध त्रिपिटक’ से लिया गया है। पूरा श्लोक इस तरह है-
चरण भिक्खवे चारिकं,
बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय
लोकानुकम्पाय अत्याय,
सुखाय देव मनुस्सानम्।
और इसमें कोई संदेह नहीं कि बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय का महत्वपूर्ण उद्देश्य लेकर आकाश वाणी ने अपने कार्य और कार्यक्रमों की योजना बनाई। देश के साहित्य, संस्कृति, कला, भाषा और लोक संस्कृति और साहित्य के लिए जो कार्य किया, उसे भुलाया नहीं जा सकता। इतना ही नहीं लोकजीवन में गति, चेतना और प्रगति की अंत:सलिला आकाशवाणी के कार्यक्रमों से प्रवाहित होती रही।
इसी बीच दूरदर्शन का आगमन भी हो चुका था, 15 अगस्त 1982 से भारतीय उपग्रह ‘इनसेट-1ए’ के माध्यम से विभिन्न दूरदर्शन केंद्रों से एक साथ ही कार्यक्रम दिखाना संभव हुआ। फिर धीरे-धीरे दूरदर्शन का विस्तार होता रहा। स्वाभाविक ही था कि दृश्य शब्द से अधिक मुखर होता है और उस दृश्य के आकर्षण ने शब्द को कुछ सीमा तक प्रभावित किया, लेकिन इसके बावजूद दोनों ही माध्यमों में ये कार्यक्रमों की एक विशिष्ट पहचान बनी और दोनों ही माध्यम, अपने कार्य और कार्यक्रमों का संपादन सुचारू रूप से कर रहे थे।
इसी बीच संचार माध्यमों की स्वायत्तता के लिए समय समय पर उठते सवालों के साथ एक प्रक्रिया सन् 1976 से प्रारंभ हुई और 15 सितंबर 1977 से ‘प्रसार भारती’ ने अपना ‘कार्य’ आरंभ किया। प्रसार भारती (भारतीय प्रसारण निगम) आकाशवाणी के लिए एक घातक पहल सिद्ध हुई। अब तक के प्रसार भारती के कार्य और शैली को देखते हुए कहना होता है कि इससे केंद्रों और कर्मचारियों की उपेक्षा, उदासीनता और निराशा का माहौल मिला। सन् 1995 से लेकर 2015 तक कार्यक्रम प्रभाग में न तो कोई नई नियुक्तियां हुईं और न ही कोई पदोन्नतियां की गईं। अभी भी एक मामूली सी भर्ती प्रक्रिया के अलावा विशेष कुछ भी नहीं हुआ है। आज अवस्था यह है कि महाराष्ट्र जैसे प्रदेश के 20 केंद्रों पर कहीं भी केंद्र निदेशक ही नहीं है, शेष भारत में भी यही स्थिति है।
प्रसार भारती की कार्यप्रणाली को देखते हुए जनवरी 1984 में ‘इलस्ट्रेटेड विकली’ को दिए साक्षात्कार में जो बात श्री राजीव गांधी ने कही थी वो सच जान पड़ती है। उन्होंने कहा था, ‘अभी हमें माध्यमों के इस्तेमाल का तरीका नहीं आता। ऐसी स्थिति के बीच रहने के लिए हमें एक लंबी प्रक्रिया से गुजरकर तैयार होना पड़ेगा। यूरोप के बहुत से देशों में स्वायत्तता प्राप्त नहीं है। बावजूद इसके वे अच्छा काम कर रहे हैं, उनकी प्रणाली में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे हम भाषा या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बाधक मानें।’
श्री राजीव गांधी के इस कथन के आलोक में इस कड़वे लेकिन सच्ची बात को कहना होगा, प्रसार भारती शब्द में समाहित अक्षरों के आशय कहीं गुम हो गए हैं। भारती का अर्थ है- भाषा। भाषा से साहित्य जुड़ा है। साहित्य से जनहित, जनरंजन, लेकिन प्रसार भारती को प्रसारण से कुछ लेना-देना नहीं है, कार्यक्रमों को रिले करने, बंद करने और अवधि घटाने के संकेत समय समय पर मिलते रहे हैं। प्रसार भारती से अन्य माध्यम या स्वयं सरकार कोई प्रश्न नहीं पूछता कि अब तक के वर्षों में केंद्रों की यह अवस्था क्यों है?
इस उपेक्षा का एक कारण और भी है और वह यह है कि एफ एम चैनल्स की भीड़ और टी. वी. चैनल्स की बाढ़ में बह रहा जनसमाज एक ‘अर्थहीन प्रसन्नता’ से ग्रस्त है। फिर भी उन्हें दोष देने के बजाय अपने घर को देखना जरूरी है, पर जब अब घर के लोग ही नहीं रहे, तो घर का हाल क्या होगा? आकाशवाणी के पास भाषा का एक संस्कार था और अभी भी है, विविध भारती और केंद्रों से प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों को सुनकर इसे समझा जा सकता है।
रेडियो एक क्षण जीवी माध्यम है, एक बात रेडियो से बोली जाये तो हम पाते हैं कि प्रसारण के साथ ही वह शून्य में विलीन हो जाती है। यहां पलट कर पूर्व संदर्भ देखने की सुविधा नहीं है और न, ही कुछ ठहरकर सोने का अवसर, इसीलिए आकाशवाणी ने शब्द के अर्थ को समझा था और सोचकर बोलने की अपनी नीति बनाई थी। यहां ‘क्या बोला जाए’ से कहीं अधिक ‘क्या बोला जाए’ इस विचार की प्रधानता थी। इन तत्वों का पालन अब थोड़ा कमजोर हुआ है, क्योंकि आकाशवाणी पर प्रायोजित कार्यक्रमों का प्रसारण बढ़ गया है। प्रारंभ में विज्ञापनों के संदर्भ में भी अनेक सावधानियां बरती गईं। कमर्शियल भी है, लेकिन धीरे धीरे प्रसार भारती की राजस्व अर्जन की (अ)नीति से, केंद्रों को दिए गए अव्यवहारिक राजस्व अर्जन के ‘टारगेट’ (लक्ष्य) ने प्रसारण के टारगेट (लक्ष्य और उद्देश्य) को विचलित कर दिया।
निसंदेह विज्ञापन आज का ‘युग धर्म’ है और जीवन का आवश्यक अंग भी, साथ ही राजस्व अर्जन एक आवश्यकता हो सकती है, लेकिन ‘अर्जन’ का ‘विसर्जन’ कहां हो रहा है, इसे भी तो विचार में लाना होगा। विज्ञापनों की भीड़ में कार्यक्रमों की गुणवत्ता और समय के खो जाने का खतरा बढ़ गया है। वैसे भी ये समय दृश्य माध्यमों के वर्चस्व का समय है, जिसके चलते हमारा ‘श्रोता’ ‘दर्शक’ में बदल गया है, यह कई अर्थों में ‘सुने जाने योग्य’ शब्दों पर संकट है, जो शायद अंतत: वाणी के संस्कारों को विदा करेगा। दूसरी ओर दर्शक भी ‘मूक दर्शक’ बन गया है। ऐसे समय में आकाशवाणी की भूमिका और उसके कार्यक्रमों का प्रसारण न केवल महत्वपूर्ण है, बल्कि भाषा, साहित्य, संगीत के माध्यम से मनुष्य के वैचारिक कल्पना लोक को बचाए रखने के लिए अनिवार्य भी है।
इस नज़रिये से भी आकाशवाणी/विविध भारती को देखना होगा, सुनना होगा। कार्यक्रमों की जितनी विविधता आज भी आकाशवाणी के पास है उतनी अन्य माध्यमों के पास नहीं है और शायद उन माध्यमों ने वैसा चाहा भी नहीं। आकाशवाणी कार्यक्रमों और विविध भारती की विविधता को प्रसार भारती की नीति और नियत के चलते जिस घुटन का अनुभव हो रहा है, उसे नज़रअंदाज कर देने का अर्थ है, एक समृद्ध विरासत का विसर्जन और ये विसर्जन सरकार भी देख रही है और समाज भी अनुभव कर रहा है।
‘जन’ माध्यम के रूप में आकाशवाणी की भूमिका अब बदल रही है, क्योंकि जिस जन-मन की बात उसके द्वारा की जाती रही वे जन-मन ही अब बदल रहे हैं। 50 से 80 के आयु वर्ग के कुछ लोग हैं जिनकी स्मृतियों में आकाशवाणी के वे दिन, वे लोग रचे बसे हैं, उनकी यादों के झरोखे से जब तब किसी कार्यक्रम की (चर्चा) सुनहरी किरण झांक जाती है।
उदासीनता के बादल ‘आकाश’ में गहरा  गए हैं और ‘वाणी’ अवरुद्ध हो चली है। इन माध्यमों के शोर में शब्दों की खामोशी को अगर कोई सुन सके तो यह खामोशी, यह मौन हमें अधिक शांत और सचेत कर सकेगा।
संकट तो यही है कि आवाजों की इस दुनिया में खामोशी पहचाने कौन?
-डॉ. सुनील देवधर
भ्रमणध्वनि : 9823546592

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