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खुल कर जी लेंगे

कवि राजेश जाधव 
(महाराष्ट्र) 9422253742

कुछ पुरानी क्लासिक फिल्में, 
देखनी  थीं,  पर रह जाती हैं!
सदाबहार कुछ गीत पुराने, 
देखना, सुनना रह जाता है!

वो साइकिल जो पड़ी धूल में,
महीनों से उसे छुआ ही नहीं! 
स्पोर्ट शुज थे नये नवेले, 
बक्से से निकले ही नहीं!

बांसुरी पर भी सा रे गा मा 
बजते बजते रह जाता है,
तबले का भी धा  धिं  धिं धा
बोल कहां अब वो आता है!

दोस्तो से घंटों तक बातें,
अब ऐसी  फुरसत ही कहां!
हंसते हंसते लोटपोट होना,
अब ऐसी  फुरसत ही कहां!

नये साल में इन बातों को,
हम वास्तव में कर ही लेंगे!
जीवन जो अनमोल मिला है, 
खुल कर उसको हम जी लेंगे!

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