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सिंधुमाई


अनाथों की थी वो माँ
चली गई छोड़ कर माँ
तेरे उपकार न भूलूं माँ
माँ बाप का प्यार तुझसे
मिला

तेरे प्यार को मैैं माई
तरस गया मेरी माई
तू ही थी मेरी सिंधुमाई
मुझे छोड़ तू कहाँ गई

श्मशान में दिन निकाले
तूने मुर्दों की आग पे 
माँ रोटियां सेक खाई हैं
इतनी हिम्मत तूने दिखाई है 

भूखी प्यासी दर दर भटकी
कोख में बच्ची तेरे पल रही
बच्ची तू थी पर मन की सच्ची
लड़ रही थी तू अकेली

कष्ट सहकर कितने
हमें पाला पोसा तूने
कहाँ कहाँ भटक के
भाषण तूने करके

इन बेवारस बच्चों को
गले लगाया माँ तूने
हाथ ही से अपने
खिलाये सबको निवाले..!

कवयित्री -कविता चव्हाण,
जलगांव, महाराष्ट्र

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