पुस्तक समीक्षा
जब वी मेट, सोचा न था, मेरे ब्रदर की दुल्हन, ए वेडनेसडे, दे दनादन, थोड़ी लाइफ थोड़ा मैजिक, लव आजकल, अज़ब प्रेम की ग़जब कहानी, शब्द जैसी सफल फिल्मों के गीतकार इरशाद कामिल की पुस्तक है- काली औरत का ख़्वाब।
पुस्तक की विधा न तो केवल गद्य है और न ही केवल पद्य क्योंक कि बॉम्बे- आने के बाद ही इरशाद कामिल को पता चलता है कि फिल्मों की कहानी में गाने होते हैं, ये तो सब जानते हैं। हर गाने के पीछे एक कहानी होती है ये सब नहीं जानते। बस, सड़कों की धूल फाँकते-फाँकते वह गाने लिखने लगा और कहानियाँ बनने लगी।
प्रस्तुत पुस्तक में कहानियां हैं, गीत हैं, चित्र हैं, इरशाद की सुंदर हस्तलिपि में लिखित डायरी के मूल पृष्ठ हैं। पुस्तक की भाषा काफी सधी हुई है क्यों कि इरशाद को परिवार से मिली उर्दू, स्कूल से पाई हिंदी और समाज से सीखी पंजाबी, इसलिए इरशाद की भाषा पर पकड़ और समझ इतनी पुख़्ता, पक्की और ठेठ है। इसका अन्दाजा आप उसकी ग़जलों से, उसकी कविताओं और ख़ासकर फ़िल्म के गीतों से लगा सकते हैं।
आजकल के भारतीय फिल्मी गीत आमतौर पर अपने द्विअर्थी संवादों एवं अश्लीलता के चलते सभ्य समाज से बहिष्कृत हैं, लेकिन इरशाद की शायरी में इसका लेशमात्र भी प्रभाव नहीं देखा जा सकता-
बातें लिए मैं रूह की
चौखट पे खड़ा हूँ !
तू जिस्म के मकान से
बाहर नहीं आता !!
जहाँ चर्चित एवं लोकप्रिय फिल्म जब वी मेट के गीतकार इरशाद प्रसिद्ध गीत ‘मौजां ही मौजां’ के पीछे की कहानी विस्तार से बताते हैं वहीं गंभीरता एवं दार्शनिकता की परतों के नीचे हमें कवि की सादगी एवं सरलता भी दिखाई देती हैं -
हम सादा तबियत लोगों का
क्या सजना सँवरना साहिब जी !
इन राख सरीखे शोलों का
क्या जलना बुझना साहिब जी !!
हमारी फिल्मों में प्राय: प्रेमी-प्रेमिका पर गीत लिखे जाते हैं, उनका बखूबी से चित्रीकरण होता है, वे सराहे भी खूब जाते हैं लेकिन इरशाद ने फिल्मी शब्द में पति-पत्नी के प्रेम पर भी गीत लिख दिया-
“लो शुरू अब चाहतों का सिलसिला हो रहा है
मिट रही है दूरियां और फासला खो रहा है
हो रही है बात कुछ ऐसी जिसमें
शब्द गुम हैं, अर्थ मतलब चुपके से खो रहा है।
और
बड़े शहर में ख्वा़ब खड़े हैं
कदम-कदम ...............एएएएए
ख्व़ाब की सूली कौन चढ़े हैं
कसम से हम तुम .............।”
पुस्तक की विधा न तो केवल गद्य है और न ही केवल पद्य क्योंक कि बॉम्बे- आने के बाद ही इरशाद कामिल को पता चलता है कि फिल्मों की कहानी में गाने होते हैं, ये तो सब जानते हैं। हर गाने के पीछे एक कहानी होती है ये सब नहीं जानते। बस, सड़कों की धूल फाँकते-फाँकते वह गाने लिखने लगा और कहानियाँ बनने लगी।
प्रस्तुत पुस्तक में कहानियां हैं, गीत हैं, चित्र हैं, इरशाद की सुंदर हस्तलिपि में लिखित डायरी के मूल पृष्ठ हैं। पुस्तक की भाषा काफी सधी हुई है क्यों कि इरशाद को परिवार से मिली उर्दू, स्कूल से पाई हिंदी और समाज से सीखी पंजाबी, इसलिए इरशाद की भाषा पर पकड़ और समझ इतनी पुख़्ता, पक्की और ठेठ है। इसका अन्दाजा आप उसकी ग़जलों से, उसकी कविताओं और ख़ासकर फ़िल्म के गीतों से लगा सकते हैं।
आजकल के भारतीय फिल्मी गीत आमतौर पर अपने द्विअर्थी संवादों एवं अश्लीलता के चलते सभ्य समाज से बहिष्कृत हैं, लेकिन इरशाद की शायरी में इसका लेशमात्र भी प्रभाव नहीं देखा जा सकता-
बातें लिए मैं रूह की
चौखट पे खड़ा हूँ !
तू जिस्म के मकान से
बाहर नहीं आता !!
जहाँ चर्चित एवं लोकप्रिय फिल्म जब वी मेट के गीतकार इरशाद प्रसिद्ध गीत ‘मौजां ही मौजां’ के पीछे की कहानी विस्तार से बताते हैं वहीं गंभीरता एवं दार्शनिकता की परतों के नीचे हमें कवि की सादगी एवं सरलता भी दिखाई देती हैं -
हम सादा तबियत लोगों का
क्या सजना सँवरना साहिब जी !
इन राख सरीखे शोलों का
क्या जलना बुझना साहिब जी !!
हमारी फिल्मों में प्राय: प्रेमी-प्रेमिका पर गीत लिखे जाते हैं, उनका बखूबी से चित्रीकरण होता है, वे सराहे भी खूब जाते हैं लेकिन इरशाद ने फिल्मी शब्द में पति-पत्नी के प्रेम पर भी गीत लिख दिया-
“लो शुरू अब चाहतों का सिलसिला हो रहा है
मिट रही है दूरियां और फासला खो रहा है
हो रही है बात कुछ ऐसी जिसमें
शब्द गुम हैं, अर्थ मतलब चुपके से खो रहा है।
और
बड़े शहर में ख्वा़ब खड़े हैं
कदम-कदम ...............एएएएए
ख्व़ाब की सूली कौन चढ़े हैं
कसम से हम तुम .............।”
इरशाद की भाषा पर स्वाभाविक रूप से मुंबईया हिंदी का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। सबकी वाट लग गई। (पृ. 58)
गद्य एवं पद्य दोनों में उनका बिम्ब विधान अनूठा है, प्रतीक एवं उपमान गढ़े हुए एवं कृत्रिम नहीं लगते। उन्होंने पुस्तक में कुछ बहुत सुंदर भाषागत प्रयोग किए हैं -
शायरी पे उसकी भी पकड़ मजबूत थी और ढीला मैं भी नहीं था।” (पृ.46)
मैंने फटाफट दो चपातियाँ उधेड़ी।” (पृ.106)
विचार की अँगीठी पर रोज एक प्रोजेक्ट की हांडी चढ़ती तो थी।” (पृ.121)
मेरी खुशी का ठिकाना रहना मुश्किल था..... राहत की सांस का खजाना मिल गया।” (पृ.148)
काले बूट सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे। बूट मेरे थे।” (पृ.157)
करवट-करवट काटी हुई रात दिन से शर्माती हुई अपना आंचल समेट रही थी।” (पृ.159)
मुंबई की मायानगरी में अपने पैर जमाना लगभग नामुमकिन होता है। सैकड़ों लोग प्रतिदिन अपनी किस्मत आजमाने यहां आते हैं और गुमनामी के अंधेरों में खो जाते हैं। ऐसे ही स्ट्रगलरो” के लिए इरशाद कितनी काम की बात कितनी आसानी से कह जाते हैं :-
सफर जितना लंबा हो, इरादा उतना मजबूत होना चाहिए और मंजिल की उम्मीद उससे भी पुख़्ता। इस तरह के फ़लस़फे हमेशा बाद में समझ में आते हैं।”
कहते हैं कि जीवन में प्रगति करने के लिए पहले हमें सपने देखने होंगे, लेकिन इरशाद उससे भी आगे की बात कहते हैं-
ख़वाब देखना जितना ज़रूरी है, उन्हेें पूरा करने की कोशिश करना उससे भी ज्यादा ज़रूरी।”
जीवन की धुरी प्रेम है, इसे इरशाद बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।-
कामिल करते जाइये प्रीत रीत की बात
चाहे प्रीतम छोड़ दे प्रीत न छोड़े साथ”
पुस्तक में एक रोचक एवं प्रेरणास्पद प्रसंग है, जिसमें टांग टूटने पर इरशाद अपने भाई के साथ डॉक्टर के पास जाते हैं और भाई फिल्मी गीतकार के रूप में इरशाद का परिचय देते हैं। डॉक्टर को जब ‘जब वी मेट’ के गीतकार का परिचय हो जाता है तो वह कहता है कि आप तो बहुत बड़े ‘समाजसेवक’ हैं क्यों कि अच्छे गाने न बनें तो फिर क्या रह जायेगा जिंदगी में?”
पुस्तक में वर्तनी की अशुद्धियां हैं, जिनके चलते कहीं-कहीं पर अर्थ का अनर्थ हो गया है -
दिन अपनी गठरी समेत कर (पृ.155) (समेट कर होना चाहिए था)
एक दूसरी को देखने लगे (पृ.161) (दूसरे होना चाहिए था)
मेरे बड़े भाई सरीखा (पृ.221) (सरीखे होना चाहिए था)
लोग बनाने हैं (पृ.241) (बनाते हैं होना चाहिए था)
इन अशुद्धियों से यदि बचा जाता, तो बेहतर होता।
बहरहाल, इरशाद कामिल ने बालीवुड के अन्य संघर्षरत युवाओं की तरह वह ख़्वाब देखा था कि वह “काली औरत” कम से कम एक बार उनके आगोश में आ जाए और यह ख़वाब फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने वाला हर युवा देखता है। वह “काली औरत” कौन है? इसका पता तो आपको पुस्तिक पढ़ने के बाद ही चलेगा, लेकिन मैं आपको इतना बताते चलूँ कि एक दिन वह “काली औरत” उनकी हो गई और उसके बाद ही उन्होंने लिखा-
ख़्वाबों की दहलीजें कदमों को
अब मेरे हैं चूमती !
पहले था मैं पीछे, ये दुनिया
अब पीछे है घूमती !!”
गद्य एवं पद्य दोनों में उनका बिम्ब विधान अनूठा है, प्रतीक एवं उपमान गढ़े हुए एवं कृत्रिम नहीं लगते। उन्होंने पुस्तक में कुछ बहुत सुंदर भाषागत प्रयोग किए हैं -
शायरी पे उसकी भी पकड़ मजबूत थी और ढीला मैं भी नहीं था।” (पृ.46)
मैंने फटाफट दो चपातियाँ उधेड़ी।” (पृ.106)
विचार की अँगीठी पर रोज एक प्रोजेक्ट की हांडी चढ़ती तो थी।” (पृ.121)
मेरी खुशी का ठिकाना रहना मुश्किल था..... राहत की सांस का खजाना मिल गया।” (पृ.148)
काले बूट सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे। बूट मेरे थे।” (पृ.157)
करवट-करवट काटी हुई रात दिन से शर्माती हुई अपना आंचल समेट रही थी।” (पृ.159)
मुंबई की मायानगरी में अपने पैर जमाना लगभग नामुमकिन होता है। सैकड़ों लोग प्रतिदिन अपनी किस्मत आजमाने यहां आते हैं और गुमनामी के अंधेरों में खो जाते हैं। ऐसे ही स्ट्रगलरो” के लिए इरशाद कितनी काम की बात कितनी आसानी से कह जाते हैं :-
सफर जितना लंबा हो, इरादा उतना मजबूत होना चाहिए और मंजिल की उम्मीद उससे भी पुख़्ता। इस तरह के फ़लस़फे हमेशा बाद में समझ में आते हैं।”
कहते हैं कि जीवन में प्रगति करने के लिए पहले हमें सपने देखने होंगे, लेकिन इरशाद उससे भी आगे की बात कहते हैं-
ख़वाब देखना जितना ज़रूरी है, उन्हेें पूरा करने की कोशिश करना उससे भी ज्यादा ज़रूरी।”
जीवन की धुरी प्रेम है, इसे इरशाद बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।-
कामिल करते जाइये प्रीत रीत की बात
चाहे प्रीतम छोड़ दे प्रीत न छोड़े साथ”
पुस्तक में एक रोचक एवं प्रेरणास्पद प्रसंग है, जिसमें टांग टूटने पर इरशाद अपने भाई के साथ डॉक्टर के पास जाते हैं और भाई फिल्मी गीतकार के रूप में इरशाद का परिचय देते हैं। डॉक्टर को जब ‘जब वी मेट’ के गीतकार का परिचय हो जाता है तो वह कहता है कि आप तो बहुत बड़े ‘समाजसेवक’ हैं क्यों कि अच्छे गाने न बनें तो फिर क्या रह जायेगा जिंदगी में?”
पुस्तक में वर्तनी की अशुद्धियां हैं, जिनके चलते कहीं-कहीं पर अर्थ का अनर्थ हो गया है -
दिन अपनी गठरी समेत कर (पृ.155) (समेट कर होना चाहिए था)
एक दूसरी को देखने लगे (पृ.161) (दूसरे होना चाहिए था)
मेरे बड़े भाई सरीखा (पृ.221) (सरीखे होना चाहिए था)
लोग बनाने हैं (पृ.241) (बनाते हैं होना चाहिए था)
इन अशुद्धियों से यदि बचा जाता, तो बेहतर होता।
बहरहाल, इरशाद कामिल ने बालीवुड के अन्य संघर्षरत युवाओं की तरह वह ख़्वाब देखा था कि वह “काली औरत” कम से कम एक बार उनके आगोश में आ जाए और यह ख़वाब फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने वाला हर युवा देखता है। वह “काली औरत” कौन है? इसका पता तो आपको पुस्तिक पढ़ने के बाद ही चलेगा, लेकिन मैं आपको इतना बताते चलूँ कि एक दिन वह “काली औरत” उनकी हो गई और उसके बाद ही उन्होंने लिखा-
ख़्वाबों की दहलीजें कदमों को
अब मेरे हैं चूमती !
पहले था मैं पीछे, ये दुनिया
अब पीछे है घूमती !!”
हमारे फिल्मी गीतों के बारे में सब कुछ जानने के इच्छुक पाठकों के लिए यह एक बेहद ज़रूरी किताब है।
पुस्तक : काली औरत का ख़्वाब
लेखक : इरशाद कामिल
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
संस्करण : द्वितीय, मार्च 2019
मूल्य : 425 रुपए
पृष्ठ संख्या : 252
पुस्तक : काली औरत का ख़्वाब
लेखक : इरशाद कामिल
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
संस्करण : द्वितीय, मार्च 2019
मूल्य : 425 रुपए
पृष्ठ संख्या : 252



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