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*बुद्ध के दर्शन से पारिस्थितिकी का पुनर्स्‍थापन संभव : प्रो. बैद्यनाथ लाभ*

वर्धा, दिसंबर (हड़पसर एक्सप्रेस न्यूज नेटवर्क)
    म‍हात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में भारतीय दर्शन महासभा के  95वें अधिवेशन तथा एशियाई दर्शन सम्‍मेलन में बुद्ध जयंती व्‍याख्‍यान में नव नालंदा महाविहार, बिहार के कुलपति प्रो. बैद्यनाथ लाभ ने कहा कि बुद्ध के दर्शन से पारिस्थितिकी का पुनर्स्‍थापन संभव है। उन्‍होंने कहा कि  बुद्ध ने दु:ख मुक्ति के लिए चार आर्यसत्‍य तथा अष्‍टांगिक मार्ग बताये। बुद्ध मानते थे कि तृष्‍णा का विनाश करना या उसे रोकना संभव है। जितनी तृष्‍णा कम होगी उतने ही दु:ख कम होंगे। उन्‍होंने कहा कि बुद्ध ने मन को नियंत्रित करने का विचार दिया और मन को पवित्र करने के लिए समाधि की बात कही।
    चार दिवसीय आयोजन के तीसरे दिन 29 दिसंबर को गालिब सभागार में स्‍मृति व्‍याख्‍यानों का आयोजन किया गया जिसमें गांधी दर्शन और शांति विषय पर कल्‍या‍णी विश्‍वविद्यालय, पश्चिम बंगाल के पूर्व कुलपति प्रो. दिलीप कुमार मोहंता ने, राजीव गांधी महाविद्यालय, शिमला के दर्शन विभाग के डॉ. पंकज बसोटिया ने दया कृष्‍ण स्‍मृति व्‍याख्‍यान दिया तथा प्रो. पद्मा पद्मनाभन ने सद्गुरु स्‍वामी ज्ञानानंद सरस्‍वती व्‍याख्‍यान प्रस्‍तुत किया।
    प्रो. दिलीप कुमार मोहंता ने कहा कि गांधी का अंहिसा, सर्वोदय और न्‍यासिता का दर्शन आज भी प्रासंगिक है । आदर्श समाज की स्‍थापना के लिए उनके दर्शन को देश-समाज के लिए अपनाने की आवश्‍यकता है। प्रो. मोहंता ने कहा कि गांधी मशीन के नहीं बल्कि मशीन की हिंसा के विरुद्ध थे। ग्रामीण स्‍तर से सूक्ष्‍म अर्थव्‍यवस्‍था को मजबूत करने के  लिए कुटीर उद्योग की स्‍थापना करने पर गांधी ने बल दिया था। उनका मानना था कि इससे रोजगार सृजन होगा और गरीबी उन्‍मूलन किया जा सकेगा। प्रो. मोहंतो ने कहा कि गांधी के सुशासन तत्‍व के साथ-साथ हमें सामाजिक और राजनैतिक विचार में गांधी दर्शन को अपनाने की आवश्‍यकता है।
    दया कृष्‍ण स्‍मृति व्‍याख्‍यान में डॉ. पंकज बसोटिया ने बताया कि दया कृष्‍ण महान दार्शनिक थे। धर्म और अहिंसा को लेकर उनका दर्शन मानव को नई दिशा देता है। उनके दर्शन पर प्रो. अंबिकादत्त शर्मा ने कहा कि दया कृष्‍ण को प्रश्‍नदेवता कहा जाता था। वे 20वीं सदी के महान दार्शनिक थे। प्रो. पद्मा पद्मनाभन ने सरस्‍वती माता पर दिये व्‍याख्‍यान में सरस्‍वती माता के दर्शन को विस्‍तार से समझाते हुए कहा कि सरस्‍वती माता ने सत्‍य, अहिंसा, धर्म और सौच इन चार स्‍तंभों का तत्व  प्रस्‍तुत किया। मन, वाणी और कृति से किसी को दु:ख न देने का दर्शन उनके जीवन से प्राप्‍त होता है। प्रो. पद्मा पद्मनाभन ने परिस्थिति के अनुसार कृति के लिए श्रीकृष्‍ण को कला का मर्मज्ञ संज्ञा देते हुए महेश व्‍यंकटरमण का शोध आलेख प्रस्‍तुत किया।
    भारतीय दर्शन महासभा के महासचिव आचार्य एस. पनीरसेल्‍वम ने अतिथियों का स्‍वागत कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्‍ल की पुस्‍तक ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और विचारक’ देकर  किया।
    कार्यक्रम का संचालन डॉ. गौरी शर्मा ने किया। इस अवसर पर देश-विदेश के विद्वान अतिथि, प्रतिनिधि, विश्‍वविद्यालय के अध्‍यापक एवं विद्यार्थी  बड़ी संख्‍या में उपस्थित थे।

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