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भ्रष्टाचार मुक्ति

श्री सत्येंद्र सिंह
पुणे, महाराष्ट्र

हर वर्ष भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने की कसमें खाई जाती हैं, संकल्प किए जाते हैं, कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है पर भ्रष्टाचार है कि न जाने का नाम लेता है और न व्यक्ति को, भारत को, संसार को मुक्त करता है। यही नहीं नए-नए रूपों में देश में, प्रदेश में, समाज में प्रवेश करता रहता है। वैसे देखा जाए तो देश, प्रदेश व समाज तो जड़ हैं और जड़ता में कोई प्रवेश नहीं कर सकता। भ्रष्टाचार की क्या औकात है? जो कुछ होता है चेतन में होता है, जो कुछ करता है वह चेतन करता है। पता नहीं व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार न करने, न सहने की कसम खाता है या नहीं। सामूहिक रूप से अवश्य कसम खाता है। व्यक्तिगत रूप से कसम खा ले तो भ्रष्टाचार रहेगा कहाँ?
व्यक्ति के मन में, सोच में ही सब कुछ रहता है और जब वह कार्यरूप में परिणत होता है तब दिखाई देता है कि कुछ हुआ। भ्रष्टाचार एक व्यक्ति करता है, दूसरा सहता है, तीसरा दुखी होता है और चौथा कसम खाता है। यह कैसी विडम्बना है, लेकिन भ्रष्टाचार होता क्या है। कल मेरी बड़े भाईसाहब से बात हो रही थी। वे बता रहे थे कि मैं पैंशन के लिए जीवन प्रमाण लेने हेतु बैंक गया तो देखा बड़ी भीड़ थी। लाइन लगी थी लेकिन कुछ लोग चुपचाप लाइन के बीच में घुस रहे थे। पीछे वाले एक दो व्यक्ति शोर मचाते तो उत्तर आता कि बहुत पहले आए थे और नंबर लगा कर चले गए।  इसमें किसी को भ्रष्टाचार नहीं दिखता। बैंक का कोई अधिकारी या कर्मचारी किसी के साथ पक्षपात कर दे तो सब भ्रष्टाचार की दुहाई देने लगते हैं।
एक बार मैं एक बड़े मंदिर में दर्शनार्थ गया। दर्शनार्थियों की लंबी पंक्ति लगी थी। नंबर आएगा या नहीं, दर्शन हो पाएंगे या नहीं, इसी सोच में खड़ा था कि एक युवक आया और कहने लगा कि दो सौ रुपए देकर वीआईपी लाइन में दर्शन हो सकते हैं। मैं दुविधा में पड़ गया कि अगर दो सौ रुपए देकर दर्शन कर लूँ तो यह तो नहीं पता कि प्रभु प्रसन्न होंगे या नहीं पर जो लोग घंटों से खड़े हैं उनका कुछ समय अवश्य खा जाऊंगा। उस युवक की आवाज फिर कानों में पड़ी, साहब क्या सोच रहे हैं, दो सौ रुपए ट्रस्ट को ही जाते हैं और जो कुछ होता है वह भगवान की मर्जी से ही होता है और मैंने दो सौ रुपए देकर दर्शन करना भगवान की मर्जी मान ली। अपने ऊपर आज भी बहुत हँसी आती है कि कैसे हम अपने आचार व्यवहार को भगवान के नाम पर भ्रष्ट कर लेते हैं। अगर कोई एक हजार रुपए देकर मुझसे पहले दर्शन कर लेता तो मुझे निश्चित ही भ्रष्टाचार लगता। 
एक लेखक जब अपने विचार से अपने शब्दों में सत्य प्रकट करता है तो कुछ लोग प्रशंसा करते हैं तो कुछ बहुत बुरा मान लेते हैं। कभी कभी तो इतना बुरा मान लेते हैं कि जान के दुश्मन तक बन जाते हैं। प्राचीन काल में दार्शनिकों को मृत्यु दंड तक घोर यातनाएं देने के उल्लेख मिलते हैं। पर आज भी ऐसा होता है कि लोकतंत्र में, राजा के न होते हुए भी लेखकों, विचारकों को, चिंतकों को दंड दिए जा रहे हैं। सलमान रश्दी को केवल अपनी सोच से उपजे सत्य को उजागर करने पर कितने दिन तक अपने घर में कैद रहना पड़ा, यह जग जाहिर है पर जब निकले तो उन पर इतना बड़ा कातिलाना हमला मंच पर सबके सामने, सबकी उपस्थिति में हुआ कि उनका लिखने वाला हाथ काम नहीं कर रहा, मस्तिष्क सोचने योग्य नहीं रहा और एक आँख की दृष्टि भी चली गई है। आखिर उनका दोष क्या था? उनके विचारों से, उनके लेखन से अगर कोई संतुष्ट नहीं है तो न पढ़े उनकी पुस्तकें, न माने उनकी बातें, यह उसकी इच्छा है पर कातिलाना हमला करना और करने के लिए उकसाना तो भ्रष्टाचार का चरम है। 
ऐसे ही एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी को केवल इसलिए बार बार स्थानांतरण के दंश झेलने पड़े कि उसे कायदे कानून से काम करना पसंद है और वह उसके लिए कृतसंकल्प है, तो भ्रष्टाचार की सीमा क्या होगी? एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी को अपने पद से तुरंत इसलिए हटा दिया जाता है कि वह किसी भी व्यक्ति की नियम विरोधी बात नहीं मानता और जो अपनी ड्यूटी पूरी तरह नियम से नहीं करते तथा सरकारी धन का दुरुपयोग करते हैं, उनके विरुद्ध कार्रवाई करता है। जिसे भ्रष्टाचार रोकने, संविधान व कानून का पालन करने के लिए नियुक्त   किया जाता है तो उसे ऐसा करने पर दंड क्यों? एक सच्चे व ईमानदार उच्च प्रशासनिक अधिकारी को ईमानदारी से काम न करने देने पर, उसके समकक्ष, ऊपर और नीचे स्तर के समस्त अधिकारियों पर ही नहीं पूरे प्रशासन तंत्र पर प्रश्नचिह्न खड़े हो जाते हैं। संविधान, नियम व कानून के अनुसार कार्य करना व करने देना देशभक्ति है, न्यायपूर्ण कार्य करना देशभक्ति है, सरकारी समय व धन का सदुपयोग देशभक्ति है। अब कानूनन कार्य कराने वाले, न्याय चाहने वाले कहाँ जाएँ, किसके पास जाएँ? इस संसार से मुक्ति पाने के लिए बहुत से मार्ग बताए गए हैं और हर रोज विद्वतजन, संत, महात्मा प्रवचन देकर बता रहे हैं परंतु भ्रष्टाचार  मुक्ति के लिए न तो कोई मार्ग शास्त्रों में सुझाया गया है और न  ही कोई बताता है, इसलिए परमपिता परमात्मा से ही प्रार्थना   है कि वे भ्रष्टाचार मुक्ति का भी  मार्ग बताएं।

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