श्री राम प्रताप चौबे (सैनिक बाबा)
अहिरौली, बक्सर (बिहार)
बात उन दिनों की है जब मैं तालीम के बारे में लोगों से गुफ़्तगू कर रहा था। तब मैंने बारह वीं जमात में दाखिला लिया था। मेरी किताब में कबीर दास की एक साखी के कुछ आयत ब-तौर सबूत लिखे गए थे। कबीर ने तालीम की बेक़द्री पर एक बेबस और लाचार तालीमयाफ़्ता शख़्स के दिल के दर्द को अपने लफ़्ज़ों में कुछ यूं लिखा है-
न पढ़ते तो खाते सौ तरह से कमा कर,
सब खोए गए हैं, बस तालीम पाक।
न जंगल में रेवड़ चराने के क़ाबिल,
न बाजार में बोझ ढोने के क़ाबिल॥
और न जाने क्या क्या?
पर इन्हें पढ़ने के बाद फ़ारसी के एक मुहावरे/ लोकोक्ति की सच्चाई मेरे सामने दिखाई पड़ने लगी-
पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, देखो रे कुदरत का खेल।
मैं सोचने के लिए मजबूर हो गया कि क्या वाक़ई तालीम हासिल करना परले सिरे की बेव़कूफ़ी है? जब से मैंने इन पंक्तियों को पढ़ा तब से मुझे एहसास हो गया कि मैं अपनी जिंदगी में गुनाहे अज़ीम कर बैठा हूं। न पढ़ते, न सनद का एहसास होता, न सनद का ग़ुरुर होता, न किसी के सामने खड़े होकर अपने बारे में कहने की ज़रूरत पड़ती। जब से सनद हासिल किया है तब से अपने आप को अकेला महसूस करने लगा हूं। ऐसा लगता है कि मैं अकेला हो गया हूं।
यूं तो किस्सा-गोई कोई अच्छी लत नहीं है पर किस्से सुनाना लोगों की मजबूरी रही है। कुछ आप बीती सुनाते हैं, कुछ दूसरों की देखी हुई सुनाते हैं या कुछ नामा़कूल तो दूसरों से सुनी हुई भी सुनाते रहते हैं। कबीरदास ने ठीक ही कहा है कि तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आंखिन की देखी, लेकिन कहते वे भी थे। किस्से कहना या किस्से सुनाना एक शगल रहा है। बात यह है कि संसार में रहने वाले हर आदमी को या तो कहने की आदत होती है या सुनने की। मज़े की बात है कि मैं ना तो कुछ कहना चाहता हूं और ना ही किस्से सुनाना चाहता हूं। मगर अपना दर्द भी बयां करो तो दुनिया उसे किस्सा-गोई ही समझ लेती है। इस दुनिया में एक से एक किस्सा-गोई हुए हैं। उनकी नकल भी नहीं कर सकता मैं पर अपनी बात कहे बिना रह भी नहीं सकता। मेरा दर्द यह है कि मैंने तालीम हासिल कर आलिम-फ़ाजिल की सनद हासिल कर ली। अब इसी का नतीजा है कि कदम कदम पर मेरे सामने कभी कबीर, कभी रैदास, कभी गुरु नानक, कभी सुकरात और कभी अरस्तू चौबीसों घंटे मेरे ज़हन में चक्कर काटते रहते हैं। कोई कहता है- यह मत करो तो कोई कहता है वह मत करो। वर्षों की जद्दोजहद के बाद भी मैं खुद को रोक नहीं पाया और इस बात की खोज में लग गया कि आखिर इस दर्द की दवा क्या है? क्या तालीम याफ़्ता होना कोई गुनाह है? क्या हासिल की हुई तालीम को उसी के अनुसार तामिल करना गुनाह है या फिर पढ़कर समझकर भी उन्हीं जाहिलों की तरह लापरवाह बन जाऊं। अकेले तो मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाता, पर कई लोगों से मेल-मुलाक़ात, तक़रीरे आम और नोक-झोंक के बाद इस बात पर इत्मीनान किया कि तालीमयाफ़्ता होना दुनिया में बहुत बड़ा गुनाह है। क्या सोचा था क्या हो गया? तालीम ऐसी चीज़ है कि उसे हम किसी को दिखा भी नहीं सकते और इतनी ख़तरनाक है कि छुपा कर भी नहीं रख सकते। अगर हम सचमुच तालीमयाफ़्ता हैं तो लाख कोशिशों के बावजूद भी मौक़ बे मौ़के अपने आप को रोक नहीं पाते। अब देखिए कितने थोड़े अल्फ़ाजों में लोगों ने यह बात कह दी है कि दोहराते हुए भी शर्म आ रही है लगता है आप अफ़लातून के अब्बा हो। आप यह सोच रहे होंगे कि मैं यूं ही बातें बना रहा हूं पर बात ऐसी नहीं है। बात यह है बल्कि सच तो यही है कि ऊंची तालीम हासिल करने के बाद जब जिंदगी के ज़लज़ले या दलदल में पांव रखा तो समझ में आया कि तालीमयाफ़्ता होना कितनी बुरी बात है? पहले तो बहुत अच्छा लगता था जब अपने तालीम की, अपने सनद की, अपने दिमाग की, वाहवाही लूटते थे। इला़के में मेरे नाम की धूम मच गई थी पर जैसे-जैसे रोजी रोटी की जुगाड़ में चप्पलें घिसने लगीं वैसे-वैसे सारे सनद बोझ मालूम होने लगे।
जैसा मैंने ऊपर बताया है कि तेल बेचने की तरफ मेरा ध्यान कभी गया ही नहीं था। बेचना क्या, दुकानदारी की तरफ ध्यान ही नहीं जा रहा था। शुक्र खुदा का। एक दिन एक भले आदमी ने मुझे सरकारी नौकरी पाने का तरीका बता दिया। मैं आज तक उसका एहसानमंद हूं, जिसने मुझे सरकारी नौकरी पाने की तरकीब बताई पर गालियां उसे भी देता हूं क्योंकि उस नामा़कूल ने कभी यह नहीं बताया कि सरकारी महक़मे में अफलातूनी दिमाग नहीं चाहिए। अगर हो सके तो दिमाग को इस्तेमाल ही ना किया जाए और मैंने देखा कि ऐसे बहुत से लोग हैं। ज्यादातर वे लोग खुशहाल हैं जिनके पास अपना दिमाग ही नहीं है। अब बात आती है मेरे दर्द की। मेरा दर्द तो अब पैदा हुआ है। मैं तो बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध की बात को याद करके रोता हूं। उन्होंने यह बात सभी को नहीं बताई। उन्होंने कहा है कि बुद्धि ही दुख का कारण है। सचमुच मुझे लगता है दर्दे तालीम उनको भी था या दर्दे तालीम उनके जुनून में था। ऐसे ही दुनिया के अनेक जाने-माने लोग एक के बाद एक मुझे अपनी बातें सुनाते रहते हैं। अब देखने वाली बात यह है कि मेरे साथ ऐसा क्या हुआ जिससे मुझे इस बात का एहसास हुआ कि तालीमयाफ्ता होना ताज़िरात-ए-हिंद की दफ़ा 302 के तहत संगीन जुर्म है पर इसकी सज़ा न तो फांसी है और न ही उम्र ़कैद। इसकी सज़ा इतनी ख़तरनाक है कि उसका अनुमान या अंदेशा केवल तालीमयाफ़्ता ही महसूस कर सकता है। तालीमयाफ़्ता को देखकर लोग केवल इतना ही कह देते हैं कि आप तो पढ़े लिखे हो। आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था या आपकी पढ़ाई का कोई फ़ायदा नहीं। आपने क्या पढ़ाई की? ज़रा सोचिए उस आदमी के ऊपर क्या गुजरती होगी जब उसे यह अल्फ़ाज़ सुनने पड़ते होंगे। अनपढ़ आदमी कुछ भी करे दलील एक ही होती है- छोड़ो यार, वह अनपढ़ गंवार है। उसे मालूम नहीं था वगैरह-वगैरह पर तालीमयाफ़्ता होकर कोई छोटा सा गुनाह भी कर दे या अनजाने में हो जाए तो लोग बात का बतंगड़ बना देते हैं। जितने मुंह उतनी बातें। जितनी बातें लोग तालीमयाफ़्ता को देखकर उसके विरोध में करते हैं उतनी शायद कोई दुश्मनों के बारे में भी नहीं करता होगा। अक्सर दुख में डूबा हुआ वह तालीमयाफ़्ता शायद यही गाना गाता होगा सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी। कभी वह अपनी सनद को देखता होगा कभी, अपनी तकदीर को कोसता होगा, कभी दुनिया को गालियां देता होगा पर करता होगा कुछ ना कुछ जरूर। क्योंकि इस दुनिया में जो भी दिमाग की बातें करता है दुनिया उसको देखना नहीं चाहती और दुनिया में कदम-कदम पर उसके राह में रोड़े आते होंगे। दुनिया में वही कामयाब है जो दुनिया वालों को उल्टे छूरे से मूड़ सकता है और दुनिया खुश भी उन्हीं से रहती है। एक संत ने कहा भी है कि झूठ कहे तो जग पतियावे और सांच कहे तो मारन धावे पर मेरी मजबूरी यह है कि जो मैंने देखा है, पढ़ा है, जो समझा है, उससे अलग बात भी मैं नहीं कर सकता। मुझे मंजूर नहीं है। हो सकता है कि इसके लिए मुझे सुकरात या तस्लीमा नसरीन या कुलबर्गी पानसरे की तरह जान के ही लाले पड़ जाएं। अपने दर्द को मैं किसी से बयां भी नहीं कर सकता पर अपने दर्दे तालीम को लिखकर रख रहा हूं ताकि वक्त बेवक्त काम आए। जिन्होंने मेरी तकरीर को पढ़ लिया है वे अपने उज़्र-ओ-एतराज़ बाकायदा लिखकर मेरे पास भेजें। मैं उनकी शिकायतें दूर कर दूंगा। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि अनपढ़ तो मेरी इस बात को समझ ही नहीं सकता क्योंकि उसे पढ़ना नहीं आता और किसी दूसरे से पढ़वा कर कोई सुन तो सकता है पर मेरे पास अपने उज्र लिख कर नहीं भेज सकता। लिहाज़ा अगर मेरी किसी से अदावत होगी तो जरूर वह भी पढ़ा लिखा होगा और वह मेरे पास कोई शिकायत नहीं करेगा। इसी इत्मीनान के साथ मैं रोज रात को चैन से सोता हूं और सुबह चिट्ठियों वाला डब्बा खोलकर देखता हूं जो खाली मिलता है। सच तो यह है कि जिसने भी तालीम हासिल की है वह भी मेरे ही जैसा महसूस करता होगा या करेगा। देखता हूं कभी कोई शिकायत आती है या नहीं? कभी कोई तालीमयाफ़्ता मेरे इस विचार से अलग विचार रखता है या नहीं? मुझे तो यक़ीन ही नहीं पूरा इत्मीनान है कि कोई पढ़ा लिखा शख्स (अगर सचमुच पढ़ा लिखा है तो) मेरे इस दर्द के विरुद्ध चूं तक नहीं कहेगा बल्कि वह भी अपना दर्द बयां करने के लिए मजबूर हो जाएगा। मेरा हमदर्द बन जाएगा।

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