पुणे, अप्रैल (हड़पसर एक्सप्रेस न्यूज नेटवर्क)
जब तक बच्चा जन्म लेता रहेगा, तब तक भारतीय भाषाएँ जीवित रहेंगी। जितना भाषा से कटेंगे, उतना संस्कृति से भी कटते जाएँगे। साहित्य और संस्कृति से दूर जाना अर्थात अपने देश से दूर जाना। हमारी मानसिकता ने संस्कृत और भारतीय भाषाओं को हाशिए पर ला दिया है। हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी और अपनी भाषा का आग्रह रखना होगा। भारतीय साहित्य की ब्रांडिंग करनी होगी। ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें पाठक पुस्तकें खरीदें ताकि साहित्य का समुचित प्रसार हो सके।
उपरोक्त विचार सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर विजय कुमार रोडे ने व्यक्त किए। हिंदी आंदोलन परिवार के वार्षिक हिंदी उत्सव और सम्मान समारोह में उपस्थितजनों को वे कार्यक्रम के अध्यक्ष के रूप में संबोधित कर रहे थे।
हिंदी आंदोलन परिवार के संस्थापक, अध्यक्ष श्री संजय भारद्वाज ने विश्व पुस्तक दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम को प्रासंगिक बताया। आपने कहा कि हिंआंप की 28 वर्ष की यात्रा में ध्येयनिष्ठा, अविराम श्रम, अनुशासन और समर्पित कार्यकर्ताओं का बड़ा योगदान है। मासिक साहित्यिक गोष्ठियाँ संस्था की प्राणवायु हैं। हिंआंप अब तक 285 गोष्ठियाँ कर चुका है। 500 से अधिक रचनाकारों को मंच दे चुका है। हर वार्षिकोत्सव में संचालन का दायित्व एक नये व्यक्ति को देना हिंआंप की एक और विशेषता है। बटोरकर बड़ा होने के समय में बाँटकर बड़ा होने का हिंआंप अनुपम उदाहरण है। उबूंटू अर्थात हम हैं इसलिए मैं हूँ का चैतन्य प्रतीक है हिंआंप। हिंआंप द्वारा प्रतिवर्ष दिये जानेवाले हिंदीभूषण और हिंदीश्री सम्मान, योग्यता और पुरस्कार का संतुलन दर्शाते हैं। बिना किसी अनुदान के अपने सदस्यों के दम पर खड़ा यह संगठन, इस क्षेत्र के सर्वाधिक सक्रिय संगठनों में से एक है। आप हैं तो हिंआंप है।
जब तक बच्चा जन्म लेता रहेगा, तब तक भारतीय भाषाएँ जीवित रहेंगी। जितना भाषा से कटेंगे, उतना संस्कृति से भी कटते जाएँगे। साहित्य और संस्कृति से दूर जाना अर्थात अपने देश से दूर जाना। हमारी मानसिकता ने संस्कृत और भारतीय भाषाओं को हाशिए पर ला दिया है। हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी और अपनी भाषा का आग्रह रखना होगा। भारतीय साहित्य की ब्रांडिंग करनी होगी। ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें पाठक पुस्तकें खरीदें ताकि साहित्य का समुचित प्रसार हो सके।
उपरोक्त विचार सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर विजय कुमार रोडे ने व्यक्त किए। हिंदी आंदोलन परिवार के वार्षिक हिंदी उत्सव और सम्मान समारोह में उपस्थितजनों को वे कार्यक्रम के अध्यक्ष के रूप में संबोधित कर रहे थे।
हिंदी आंदोलन परिवार के संस्थापक, अध्यक्ष श्री संजय भारद्वाज ने विश्व पुस्तक दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम को प्रासंगिक बताया। आपने कहा कि हिंआंप की 28 वर्ष की यात्रा में ध्येयनिष्ठा, अविराम श्रम, अनुशासन और समर्पित कार्यकर्ताओं का बड़ा योगदान है। मासिक साहित्यिक गोष्ठियाँ संस्था की प्राणवायु हैं। हिंआंप अब तक 285 गोष्ठियाँ कर चुका है। 500 से अधिक रचनाकारों को मंच दे चुका है। हर वार्षिकोत्सव में संचालन का दायित्व एक नये व्यक्ति को देना हिंआंप की एक और विशेषता है। बटोरकर बड़ा होने के समय में बाँटकर बड़ा होने का हिंआंप अनुपम उदाहरण है। उबूंटू अर्थात हम हैं इसलिए मैं हूँ का चैतन्य प्रतीक है हिंआंप। हिंआंप द्वारा प्रतिवर्ष दिये जानेवाले हिंदीभूषण और हिंदीश्री सम्मान, योग्यता और पुरस्कार का संतुलन दर्शाते हैं। बिना किसी अनुदान के अपने सदस्यों के दम पर खड़ा यह संगठन, इस क्षेत्र के सर्वाधिक सक्रिय संगठनों में से एक है। आप हैं तो हिंआंप है।
हिंआंप के वार्षिक हिंदी उत्सव में देवनागरी लिपि के प्रचार-प्रसार के लिए जीवन समर्पित करने वाले प्रा. लछमण हरद्वाणी को हिंदीभूषण सम्मान से अलंकृत किया गया। उनके अस्वस्थ होने के कारण उनके प्रतिनिधि के रूप में डॉ. सदानंद महाजन ने पुरस्कार ग्रहण किया। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यरत ई-अभिव्यक्ति के सम्पादक श्री हेमंत बावनकर और वरिष्ठ साहित्यकार अलका अग्रवाल को हिन्दीश्री सम्मान प्रदान किया गया। सम्मान में स्मृतिचिह्न, शॉल, नारियल एवं तुलसी का पौधा प्रदान किया गया।
डॉ. महाजन ने अपने वक्तव्य में प्रा. हरद्वाणी के साथ अपने 57 वर्ष पुरानी मित्रता का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सिंधी के लिए देवनागरी लिपि का उपयोग करने के लिए प्रा. हरद्वाणी को अनेक बार उपेक्षा का शिकार भी होना पड़ा। अपने लक्ष्य पर अडिग रहनेवाले इस भाषासेवी के योगदान को सम्मान देने के लिए उन्होंने हिंदी आंदोलन परिवार की प्रशंसा की।
श्री हेमंत बावनकर ने अपनी साहित्यिक यात्रा के विभिन्न पड़ावों को याद किया। ई-अभिव्यक्ति को अब तक 5 लाख से अधिक पाठक देख चुके हैं। पत्रिका में अबतक 16480 रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। दैनिक पत्रिका की निरंतरता के लिए उन्होंने अपने लेखकों और पाठकों के प्रति आभार प्रकट किया।
श्रीमती अलका अग्रवाल ने उस घटना को याद किया, जिससे क्षुब्ध होकर उन्होंने पहली बार अपनी भावनाओं को काग़ज़ पर उतारा था। उसके बाद से लेखन का सिलसिला आरम्भ हुआ जो अबतक दस पुस्तकों की संपदा उनके नाम कर चुका है। अपनी साहित्यिक यात्रा में हिंआंप की प्रेरणा और मासिक गोष्ठियों का उन्होंने विशेष उल्लेख किया। साथ ही उनके योगदान को मान्यता देने के लिए हिंआंप का धन्यवाद किया।
महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ने पिछले दिनों गत तीन वर्ष के पुरस्कारों की घोषणा की थी। इनमें हिंआंप के डॉ. रमेश मिलन (नाटक), श्रीमती वीनु जमुआर (जीवनी), डॉ. नंदिनी नारायण (अनुवाद) और श्रीमती अलका अग्रवाल (बाल कहानियाँ) के नाम सम्मिलित थे। इस समारोह में संस्था ने इन चारों साहित्यकारों को भी सम्मानित किया।
कार्यक्रम की प्रस्तावना एवं स्वागत वक्तव्य सुधा भारद्वाज ने किया। अतिथियों का परिचय डॉ. लतिका जाधव, पुष्पा गुजराथी, प्राजक्ता अभ्यंकर ने दिया।
कार्यक्रम के पूर्वार्द्ध में क्षितिज इंफोटेनमेंट द्वारा नामचीन साहित्यकारों की रचनाओं पर आधारित ‘मेरी भाषा के लोग’ नामक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। इसका लेखन-संचालन संजय भारद्वाज ने किया। इसमें डॉ. रजनी रणपिसे, स्वरांगी साने, अनुजा पंडित, अपर्णा कडसकर, कंचन त्रिपाठी, ऋता सिंह और रेखा सिंह ने प्रस्तुतियाँ दीं।
हिंदी उत्सव का प्रभावी संचालन पूर्णिमा पांडेय ने किया। कार्यक्रम में उल्लेखनीय संख्या में साहित्यकार और भाषा प्रेमी उपस्थित थे। प्रीतिभोज के बाद आयोजन ने विराम लिया।
डॉ. महाजन ने अपने वक्तव्य में प्रा. हरद्वाणी के साथ अपने 57 वर्ष पुरानी मित्रता का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सिंधी के लिए देवनागरी लिपि का उपयोग करने के लिए प्रा. हरद्वाणी को अनेक बार उपेक्षा का शिकार भी होना पड़ा। अपने लक्ष्य पर अडिग रहनेवाले इस भाषासेवी के योगदान को सम्मान देने के लिए उन्होंने हिंदी आंदोलन परिवार की प्रशंसा की।
श्री हेमंत बावनकर ने अपनी साहित्यिक यात्रा के विभिन्न पड़ावों को याद किया। ई-अभिव्यक्ति को अब तक 5 लाख से अधिक पाठक देख चुके हैं। पत्रिका में अबतक 16480 रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। दैनिक पत्रिका की निरंतरता के लिए उन्होंने अपने लेखकों और पाठकों के प्रति आभार प्रकट किया।
श्रीमती अलका अग्रवाल ने उस घटना को याद किया, जिससे क्षुब्ध होकर उन्होंने पहली बार अपनी भावनाओं को काग़ज़ पर उतारा था। उसके बाद से लेखन का सिलसिला आरम्भ हुआ जो अबतक दस पुस्तकों की संपदा उनके नाम कर चुका है। अपनी साहित्यिक यात्रा में हिंआंप की प्रेरणा और मासिक गोष्ठियों का उन्होंने विशेष उल्लेख किया। साथ ही उनके योगदान को मान्यता देने के लिए हिंआंप का धन्यवाद किया।
महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ने पिछले दिनों गत तीन वर्ष के पुरस्कारों की घोषणा की थी। इनमें हिंआंप के डॉ. रमेश मिलन (नाटक), श्रीमती वीनु जमुआर (जीवनी), डॉ. नंदिनी नारायण (अनुवाद) और श्रीमती अलका अग्रवाल (बाल कहानियाँ) के नाम सम्मिलित थे। इस समारोह में संस्था ने इन चारों साहित्यकारों को भी सम्मानित किया।
कार्यक्रम की प्रस्तावना एवं स्वागत वक्तव्य सुधा भारद्वाज ने किया। अतिथियों का परिचय डॉ. लतिका जाधव, पुष्पा गुजराथी, प्राजक्ता अभ्यंकर ने दिया।
कार्यक्रम के पूर्वार्द्ध में क्षितिज इंफोटेनमेंट द्वारा नामचीन साहित्यकारों की रचनाओं पर आधारित ‘मेरी भाषा के लोग’ नामक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। इसका लेखन-संचालन संजय भारद्वाज ने किया। इसमें डॉ. रजनी रणपिसे, स्वरांगी साने, अनुजा पंडित, अपर्णा कडसकर, कंचन त्रिपाठी, ऋता सिंह और रेखा सिंह ने प्रस्तुतियाँ दीं।
हिंदी उत्सव का प्रभावी संचालन पूर्णिमा पांडेय ने किया। कार्यक्रम में उल्लेखनीय संख्या में साहित्यकार और भाषा प्रेमी उपस्थित थे। प्रीतिभोज के बाद आयोजन ने विराम लिया।

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