मुख्य समाचार

6/recent/ticker-posts

विचारों की दुनिया

श्री सत्येंद्र सिंह
पुणे (महाराष्ट्र)

एक विचार आता है खुदबखुद,
दूसरा उसे धकेल देता है,
तीसरा उसे ढंक लेने की कोशिश करता है,
तभी चौथा आ धमकता है,
और फिर पांचवां सबके ऊपर,
धौंस जमाता है।
इस तरह विचारों का एक जाल,
बुन जाता है एक दूसरे में गुंथे हुए।
और मेरी निर्विचार होने की साधना,
धीरे धीरे दम तोड़ती सी लगती है,
विचार कभी अंदर उपजते हैं,
तो कभी बाहर से धकियाए आते हैं,
मेरे मैं को ढंकते हुए जाते हैं,
मेरे अस्तित्व को झकझोर जाते हैं,
मैं सोचता रहता हूँ कि
मैं, मैं हूँ या एक विचार,
जिसका स्थायित्व नहीं,
अस्तित्व नहीं।
पता नहीं कब बन जाती है,
विचारों की दुनिया,
मेरी दुनिया,
जहाँ विचार ही होते हैं,
पर मैं कहीं नहीं।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ