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चिंतन-मनन और चिंता

-श्री सत्येंद्र सिंह
पुणे, महाराष्ट्र

बैठकों की भरमार, राजधानियों से महानगर, महानगर से नगर और नगर से गांव की यात्राओं का महत्व बढ़ रहा है। सबसे अधिक महत्व बढ़ा है ट्विटर का। आजकल ट्विटर हैंडल पर लिखे जा रहे संदेश ही समाचार हैं। और उनके अर्थ निकालना, गढ़ना और आम जनता तक पहुंचाना हर प्रकार के मीडिया जैसे न्यूज चैनल, फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम, समाचारपत्रों तक का भी परम कर्तव्य बन गया है। आम जनता कौन सी है, यह किसी को नहीं मालूम। पर सब आम जनता की बात करते हैं। किसी जगह एक पार्टी हार जाती है तो कहती है वाह री मूर्ख जनता और जीतने वाली पार्टी कहती है कि आम जनता सब समझती है और समय पर अपनी सूझबूझ का परिचय देती हुई न्याय भी करती है। 
उच्चाधिकारियों को तो महामारी से लड़ने और अपने से उच्च के आदेश पालन से ही फुरसत नहीं। उन्हें अपने परिवार तक को देखने की फुरसत नहीं और उनके मजबूत कंधों पर अपने क्षेत्र के सभी परिवारों का बोझ भी है न, हाय हाय कैसे सहन करें बेचारे। यही हाल अधीनस्थ कर्मचारियों का है। ऊपर से लोगों को  अन्न-जल, बिजली-पानी, सड़क, बस, रेल, वायुयान उपलब्ध कराने की पूरी जिम्मेदारी तो उनकी है ही, अब वैक्सीन की नई भयावह जिम्मेदारी और आन पड़ी है। ऊपर नीचे के सभी दिलों में, मनों में यह भ्रष्टाचार और फन फैलाए खड़ा हो जाता है। उसके सामने उनका कोई वश नहीं चलता। आखिर उनका परिवार भी तो आम जनता का ही हिस्सा है और ऐसे ही सब अपने-अपने परिवार का  ख्याल रखते रहे तो आम जनता के एक हिस्से की सेवा ही हुई न। कार्य के घंटों का कोई हिसाब नहीं, क्योंकि लॉकडाउन खुलने-लगने पर सब निर्भर हो गया है। दुकानों को समय पर खुलवाना और बंद कराना सुनिश्चित करने की महती जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। दुकानदार, दुकान में माल भर पा रहा है या नहीं, माल की   आवाजाही भी है या नहीं, उसके बच्चों पर क्या बीत रही है, यह देखने सोचने की जिम्मेदारी उनकी नहीं है।  दुकानदार का परिवार शायद आम जनता का हिस्सा नहीं है। हर प्रकार का निर्माण कार्य, छोटी बड़ी फैक्ट्री वगैरह बंद करवाना तो  उनकी जिम्मेदारी है परंतु खुलवाने में मदद करना उनकी जिम्मेदारी के अंतर्गत नहीं है। उद्योग धंधों में मजदूर हैं या नहीं, उद्योग व निर्माण कार्य की कठिनाइयों से भी उनका कोई संबंध नहीं। उनका संबंध या तो टैक्स से है या महामारी की रोकथाम। उद्योग और निर्माण कार्य के लिए स्टील, सीमेंट या अन्य कच्चा माल मिल रहा है या नहीं इससे भी कोई संबंध नहीं। परिवहन के सभी साधन बुरी तरह प्रभावित हैं।
मनन करने का दायित्व तो लेखक वर्ग का है। सरकारों और नेतृत्व के कार्यकलापों की समीक्षा करते हुए उनका खंडन मंडन करना लेखन उद्देश्य है। खंडन मंडन लेखन की किसी भी विधा में हो सकता है। कुछ गोस्वामी भक्त कोई ‘होय नृप’ वाली नीति पकड़ लेते हैं और कुछ उससे परे ‘मोक्ष प्राप्ति’ की ओर चलते हुए वर्तमान ज्वलंत समस्याओं से आम जनता का ध्यान हटाने में लग जाते हैं तो कुछ नेतृत्व के मार्गदर्शक भी बन जाते हैं। 
महामारी ने सबको झकझोर कर रख दिया है परंतु लेखक अपने रचना धर्म से नहीं डिगा है। महामारी ने घर बैठे एक सुविधा मुहैया करा दी है और वह है ऑनलाइन सेवा। इसलिए अत्यावश्यक कार्यों में व्यवधान कुछ कम हुआ है। लेखन कर्म रचनाधर्मियों के लिए भी जूम, मीट, फेसबुक, वाट्सएप वरदान बन गए हैं। ऑनलाइन पत्र-पत्रिकाएं भी अपना अस्तित्व बनाए रखने में सफल रहीं।
तो चिंतन मनन, अध्ययन अध्यापन, निर्माण उत्पादन सभी कुछ चल ही रहा है। बस चिंता दरकिनार हो गई। पेट्रोल-डीजल के भाव आसमान छूने लगे, उसकी चिंता किसी को नहीं। खाने के तेल के पैसे कब बढ़ गए, पता ही नहीं चला, क्योंकि किसी ने चिंता नहीं जताई। नौकरी खत्म हो रही हैं, उम्मीदवारों के अलावा चिंता किसी को नहीं। आय के साधन कम से कमतर होते जा रहे हैं, प्रभावितों के सिवाय चिंता किसी को नहीं। हां सरकारें अपना एक कर्तव्य बखूबी निभाने में संलग्न है कि पैसे वालों से टैक्स लेकर गरीबों में बांटना, इसकी चिंता भी सब को है। सरकारी कर्मचारियों को वेतन और पेंशन अभी भी मिल रही है, इसकी भी चिंता सबको है। महंगाई भत्ता नहीं मिल रहा इसकी चिंता किसी को नहीं। स्कूल-कॉलेज, विद्यार्थी, अभिभावक सभी चिंता के घेरे में है, इसकी चिंता किसी को नहीं, लेकिन चिंतन मनन जारी है।

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