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जाति और प्रमाण-पत्र

सांसद नवनीत राणा के जाति प्रमाण-पत्र को रद्द किए जाने पर अनेक सवालों का जन्म हो गया है। जाति आधारित ऊंच नीच पर फिर से विचार करना आवश्यक प्रतीत हो रहा है। जाति प्रमाण-पत्र जारी करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी आमतौर पर तहसीलदार होते हैं या  जिन्हें सरकार ने इसके लिए अधिकार सौंपे हैं वे जिम्मेदार होते हैं। सबसे पहले शिक्षा में फीस माफ कराने और प्रवेश प्राप्त करने के लिए जाति प्रमाण-पत्र की आवश्यकता होती है। उच्च व तकनीकी शिक्षा में प्रवेश के लिए जाति के वैलिडिटी प्रमाण-पत्र की आवश्यकता होती है जिसे डायरेक्टर सोशल वेलफेयर द्वारा जारी किया जाता है और जिसे प्राप्त करने के लिए विद्यार्थियों को नाकों चने चबाने पड़ते हैं। विशेष कर महाराष्ट्र से सटी प्रादेशिक सीमाओं के विद्यार्थी जो महाराष्ट्र में शिक्षा प्राप्त करते हैं पर वेलिडिटी प्रमाण-पत्र के समय महाराष्ट्र के विद्यार्थी नहीं रहते। इसी प्रकार केंद्रीय कर्मचारियों के बच्चे जो किसी भी प्रदेश के हो सकते हैं और उस प्रदेश में उनकी जड़ें भी समाप्त हो चुकी होती हैं पर महाराष्ट्र में दसवीं के बाद वेलिडिटी प्रमाण-पत्र के समय वे महाराष्ट्र के नहीं होते। चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी के जाति प्रमाण-पत्र के साथ शिक्षा प्रमाणपत्रों और वेलिडिटी प्रमाणपत्र की क्या जाँच नहीं होती? चुनाव प्रत्याशी द्वारा तो कई घोषणा पत्र भी प्रस्तुत करने होते हैं शायद। और बड़े उच्च अधिकारी उनकी जाँच करते होंगे। फर्जी जाति प्रमाण-पत्र और वेलिडिटी प्रमाण-पत्र जारी करने वाले अधिकारी के विरुद्ध क्या कार्रवाई की जाती है। ऐसे ही सवाल जाति सूची पर हैं। एक ही मद में चमार मोची के समकक्ष आठ दस जातियां दी हुई हैं। तो जाति प्रमाण-पत्र किस जाति के नाम से जारी किया जाए। सांसद महोदया को चमार और मोची दोनों कैसे मान लिया गया। इंटरनेट पर अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की सूचियां देखने पर मालूम होता है कि बहुत सी ऐसी जातियां सूची में नहीं हैं जिनके लिए आरक्षण मांगा जाता है। समाज में ऊंचा सिर रखने के लिए सवर्ण और लाभ पाने के लिए जाति उजागर। जाति सूची में एक सीरियल नंबर पर एक ही जाति होनी चाहिए। यदि किसी जाति की उप जातियां हैं तो सीरियल नंबर में उप जाति बताना चाहिए। राणा जी के बारे में तो न्यायालय ही कुछ कहेगा।
-श्री सत्येंद्र सिंह
आंबेगांव खुर्द, पुणे

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