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वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ‘दीपोत्सव’ की कारण मीमांसा

 

महात्मा गांधी के आध्यात्मिक गुरु परम पूजनीय विनोबा भावे जी ने सभी धर्मों का सूक्ष्म अध्ययन किया था। तभी तो कुरान सार, बाइबल सार तथा भगवत गीता का एक समश्लोकि मराठी अनुवाद ‘गीताई’ लिखा था। इस तपस्वी ने 75 वर्ष पूर्व अर्थात बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कहा था, ‘आने वाली 21वीं सदी में मात्र विज्ञान एवं अध्यात्म जीवित रहेगा तथा उसी के अनुसार दुनिया चलेगी।’ 
पिछले 2 वर्षों से वर्धा में स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने 2 अक्टूबर महात्मा गांधीजी का जन्मोत्सव को ‘दीपोत्सव’ के रूप में मनाने की ठान ली है। उसका यह तीसरा वर्ष है। मैं विज्ञान का छात्र हूं तथा अध्यात्म में भी थोड़ीसी रुचि रखता हूं। इसी कारण 2 अक्टूबर गांधी जयंती अर्थात ‘दीपोत्सव’ वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से कितना सिद्ध एवं सार्थक है, इसकी कारण मीमांसा करने का यह प्रयास है। महात्मा गांधी का चरित्र ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़ते हुए निरंतर यही प्रतीत हुआ कि, सामान्य से सामान्य मोहन गांधी जगत मान्य महात्मा कैसे बन गया। उन्होंने असत्य से सत्य की ओर अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होने का सतत प्रयास किया है। प्रकाश की ओर अग्रसर होने वाला यह पथ, वर्तमान पीढ़ी के सन्मुख प्रकाशमान करने के लिए उस पथ को प्रशस्त करना होगा। भारतीय शास्त्र के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने जन्मदिन पर दीपक जलाता है। उसके पीछे का कारण यही होता है कि, मेरा भविष्य प्रकाशमय हो। मैं अपने स्वयं में जीता हूं, इसलिए घर में ही दीपक जलाता हूं।
जिसने अपना समग्र जीवन ही दीपक के भांति मानव कल्याण के लिए जलाया हो, फिर क्यों न यह महसूस किया जाए कि उनके जन्मदिन पर पूरी दुनिया में दीपक जलाना चाहिए। इस दुनिया को भी वर्तमान परिवेश में प्रकाश की सख्त जरूरत है और हम इस शक्ति को महात्मा गांधी के चरित्र में देखते हैं। समग्र विश्व सांप्रदायिक विवाद से गुजर रहा है। ऐसे में समरसता का तेजोमय हमें गांधीजी द्वारा दिए गए 'एकादश-व्रत' में दिखाई देता है। युवा पीढ़ी तथा समाज के अंतिम व्यक्ति के हाथों को काम भी गांधीजी के रचनात्मक कार्य से प्राप्त होगा, ऐसा स्पष्ट दिखाई देता है। विश्व में देश-देश में होने वाला सत्ता संघर्ष, आर्थिक संघर्ष विनोबाजी के ‘जग जगत’ से कम होगा यह स्पष्ट है।
 महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य रजनीश कुमार शुक्ल की प्रेरणा-संकल्प से 2 अक्टूबर 2019 से वर्धा में ‘दीपोत्सव’ का आरंभ हुआ।
शास्त्रीय दृष्टिकोण को सन्मुख रखते हुए महात्मा गांधी के विचार अनुसार सामान्य से सामान्य को रोजगार मिल जाना चाहिए। ‘दीपोत्सव’ के माध्यम से कुम्हार का रोजगार बढ़ता है। स्वयं सहायता समूह की द्वारा बनाई गई बाती को जलाकर वह चार पैसे कमा सकती है। अप्रत्यक्ष रूप से जिस के कपास से बाती तैयार होती है उस किसान के घर का कुछ अंधकार निश्चित ही कम होगा। गहराई से सोचें तो सूर्य के उगते ही वातावरण के सभी कीड़े- मकोड़े, जीव-जंतु गायब हो जाते हैं। अर्थात सभी अमंगल चीजें प्रकाश के आते ही दूर हो जाती है। इसी तरह भारतीय शास्त्र के अनुसार प्रत्येक घर में और घर के आंगन में संध्या के समय दीपक जलाए जाते हैं। यह प्रज्वलित ज्योति अपने आसपास के 5 से 10 फीट की दूरी के सभी उपद्रवी जीव को नष्ट करते हैं। यह तत्व केवल तेल और घी की ज्योति में है, बिजली के दिए में नहीं। हमारी आंखों को न दिखाई देने वाले अनंत जीव-जंतु विद्यमान होते हैं, यह कोरोना जैसी महामारी में ने सिद्ध किया है। 
यही बात हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों को पहले से ज्ञात थी। इसलिए उन्होंने शास्त्रों में अग्नि की अर्थात प्रकाश की पूजा को हमारे दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। किंतु 185 वर्षों की हमारी शिक्षा पद्धति इसी से अभी तक अनभिज्ञ है। क्योंकि भारतीय जन समाज अंधेरों में ही रहे, यह तत्कालीन पाश्चात्य राज्यकर्ताओं की योजना थी। और जो इस पाश्चात्य सभ्यता के मोह में है वह दीया बुझा कर जन्मदिन मना कर अपने आप को उच्च शिक्षा विभूषित समझते हैं। इससे विरुद्ध भारतीय संस्कार में पले बढ़े ग्रामीण परिवार आज भी घर, आंगन और मंदिर में दीपक जलाते है। गांव के प्रत्येक घर से एक दिया मंदिर में आता है। मंदिर में जल उठे असंख्य दीपक के कारण वहां का वातावरण शुद्ध, पवित्र एवं प्रसन्न होता है।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा इस दृष्टिकोण से निरंतर प्रयासरत है कि, वर्धा वासियों की ओर से इस का भव्य स्वागत हो। हमें संपूर्ण वर्धा जिले का वातावरण शुद्ध करना है, तो जैसे हम हमारे घर में और आंगन में दीपक जलाते हैं वैसे ही अपने गांव के लिए कम से कम 5 दीपक घर के सामने तथा मार्ग पर लगाने चाहिए। तथा जिस संस्था की जैसी क्षमता हो उन्होंने हजारों दिए चौराहों पर लगाने चाहिए। आज भी गांव-गांव में कार्तिक महीने में और भोर में दीपक जलाए जाते हैं। काकड़ आरती में जितने लोग सम्मिलित होते हैं, प्रत्येक के हाथ में एक काकड़ दीपक दिया जाता है। घर-घर में कपूर जलाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन मंदिर के कलश पर भव्य त्रिपुर ज्योत प्रज्वलित की जाती है। इसके पीछे कारण यह है कि, इस माध्यम से समग्र वातावरण मंगलमय हो।
 वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक तथा पर्यावरण की दृष्टि से भारतीय हिंदू शास्त्र के अनुसार दिवाली के दिन जो दीप ज्योति जलाई जाती है उसका भौगोलिक कारण यह है कि, उस समय भारत खंड से सूर्य की दूरी बढ़ी हुई रहती है। वातावरण ठंडा होता है। सब जानते हैं कि ऐसे ठंडे वातावरण में जीव जंतुओं की संख्या अधिक हो जाती है। ऐसे वातावरण में सूर्य का काम यही छोटे-छोटे दीपक करते हैं। पर्यावरण शास्त्र एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दशहरा-दिवाली यह बड़े त्यौहार संपूर्ण भारत खंड में मनाने की प्रथा ऋषि मुनियों के द्वारा प्रतिपादित की है।
 मुझे ऐसा लगता है कि गांधी जयंती के अवसर पर वर्धा में दीपोत्सव, या आपके गांव में भी कोई महात्मा हुआ है तो उनके स्मरणार्थ गांव में दीपोत्सव होना चाहिए। इस माध्यम से उनके अलौकिक कार्य से वर्तमान पीढ़ी परिचित हो जाएगी। जिससे सभी को सकारात्मक प्रेरणा प्राप्त होगी। हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में है और इसका नाम महात्मा गांधी के नाम पर रखा गया है, इसलिए हमने 'गांधी-जयंती' के दिन को चुना। मेरा आपसे अनुरोध है कि, आप अपनी सुविधानुसार अपने शहर और गांव का दिन चुनें और गांव में 'दीपोत्सव' मनाएं।

- प्रो चंद्रकांत रागीट
प्रति-कुलपति
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा।
मो ९४२१७०१५८२

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