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समीक्षा : कहानी संग्रह ‘पीली रोशनी का समंदर’

कहानीकार- विपिन पवार 
प्रकाशक- प्रलेक प्रकाशन, मुंबई
मूल्य- दो सौ रुपये।
-श्री देवेन्द्र सोनी, 
प्रधान संपादक ‘युवा प्रवर्तक’ इटारसी, 
मोबा.-9111460478

जब भी साहित्य की या लेखन की बात होती है तो सर्वमान्य रूप से जेहन में जो दो प्रमुख विधाएं उभरती हैं वह हैं- गद्य और पद्य। इन विधाओं के विभिन्न रूप यथा- एकांकी, कहानी, संस्मरण, निबंध, रिपोर्ताज, लघु कथा, यात्रा वृतांत और गीत ग़ज़ल तथा नई कविताएं ही जन स्वीकार्य के बाद साहित्य का दर्जा पाते हैं। यहां कुछ अपवाद भी हो सकते हैं।
अर्थात इन विधाओं में किया गया वह लेखन जो पाठकों के मन मस्तिष्क में रच बस जाए वही साहित्य है, इसलिए आवश्यक यह है कि सृजनकर्ता वह लिखे जो कालांतर में भी पाठकों को वर्तमान सा महसूस हो क्योंकि आगे चलकर यही शाश्वत साहित्य होगा। विपिन पवार का लेखन ऐसे ही साहित्य साधकों की श्रेणी में आता है चाहे वह किसी भी विधा में, किसी भी भाषा में रच रहे हों।
विपिन के लेखन की एक विशेषता मुझे यह भी लगती है कि वे पहले पात्रों और परिस्थितियों में स्वयं को ढालते हैं। उन्हें आत्मसात करते हुए मानसिक रूप से उसे स्वयं जीते हैं। इस प्रक्रिया को अपनाने के बाद वे अपनी रोचक शैली में अभिव्यक्त करते हैं, जिसे पाठक ना केवल स्वीकारते हैं बल्कि उसमें रच-बस भी जाते हैं और पाठकों को यह लगता है कि जैसे यह हमारी अपनी ही कहानी है या हमारे आसपास घटित हुआ कोई वह कथानक है जिससे हम अनभिज्ञ नहीं हैं।
हाल ही में विपिन के तीन संग्रह प्रकाशित हुए हैं। 
इस कहानी संग्रह पीली रोशनी का समंदर से पहले उनके दो निबंध संग्रह शब्दों के परे  और अक्षरों की मेरी दुनिया प्रकाशित होकर बेस्टसेलर की श्रेणी में आ गए हैं।
कहानी और निबंध के अलावा विपिन की कविताएं भी पाठकों के हृदय को झकझोरे बिना नहीं रहती हैं।
अध्ययन और पर्यटन का शौक रखने वाले अनुज विपिन के यात्रा वृतांत पाठकों को पर्यटन स्थल का जीवंत एहसास कराते हुए प्रतीत होते हैं।
विपिन बहुमुखी प्रतिभा के धनी तो हैं ही साथ ही वे रेल मंत्रालय के राजभाषा विभाग में उच्चाधिकारी भी हैं। मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र में अपना ज्यादातर समय गुजारने के अलावा अन्य प्रदेशों की यात्राओं ने उन्हें बहु भाषी भी बना दिया है।
हिंदी, मराठी तथा अंग्रेजी भाषा पर उनकी व्यापक पकड़ है जो उनके लेखन में साफ झलकती है तथा यह भी बताती है कि वे सभी भाषाओं का सम्मान करते हैं।
अब बात करते हैं विपिन पवार के कहानी संग्रह-  पीली रोशनी का समंदर की।
इस संग्रह में उन्होंने अपनी आठ प्रतिनिधि कहानियों को सम्मिलित किया है। ये कहानियां इस प्रकार हैं - इस रिश्ते को क्या नाम दूं, बारात, पीली रोशनी का समंदर, रुलाऊ साहब, अदावत, बहुत बड़ा सच, रिश्तों की छांव तले और आठवीं कहानी है, सिक्का एक रुपए का। चूंकि कहानी संग्रह का शीर्षक-  पीली रोशनी का समंदर है, तो इसी कहानी की चर्चा करते हैं- इस कहानी का नायक नामदेव अत्यंत साधारण परिस्थिति का रेलकर्मी गस्तीदार है नायक की सूझबूझ का ही परिणाम है कि वह अप्रत्याशित रूप से एक बड़े रेल हादसे को बचा लेता है। इसके लिए जब उसे पुरस्कृत किया जाता है तब भी उसके दिलो-दिमाग में कर्तव्य भाव की लहरें हिलोरें मारती रहती है। इस कहानी का मुख्य किरदार नामदेव जहां अपनी ड्यूटी को पूरी सजगता और प्राणों की परवाह किए बिना भी पूरी निष्ठा से निभाता है, वहीं वह घर की जरूरतों और जिम्मेदारियों से भी मुख नहीं मोड़ता है। इस कहानी का ताना-बाना कुछ इस तरह से बुना गया है कि उसमें मानवीय स्वभाव की कमजोरियों को भी सहजता से ग्राह्य किया जा सकता है। इस ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ किरदार के घर की ही एक सदस्य, उसकी पालतू गाय भी स्वामी भक्ति का जो परिचय देती है -वह स्तुत्य है। अन्य सातों कहानियां भी मानवीय स्वभाव की सूक्ष्म से सूक्ष्म गतिविधियों पर नजर रखते हुए कुछ इस अंदाज में लिखी गई हैं कि वे पाठकों की ही होकर रह जाती हैं।
यह विपिन की लेखनी का ही कमाल है कि उनका भाषा शिल्प और कथानक पाठकों को अपनी ओर ऐसे खींचता है जैसे कोई चुंबक किसी लौह तत्व को खींचती है। विपिन पवार की कहानियों को पढ़ना, एक सुंदर, शिवत्व भरी दुनिया में प्रवेश करने जैसा है। हमारे चतुर्दिक घट रही भ्रष्ट, स्वार्थी गतिविधियों, विरूपताओं और खलनायकों को आंकने में उनकी कलम की रुचि नहीं है। वह खरे सोने से चरित्रों को बड़े मनोयोग से रच रच कर उकेरती हैं। सबसे अच्छी बात, ये चरित्र भी, हमारे बीच के बहुत जाने पहचाने होते हैं। अंतर सिर्फ इतना होता है कि कठिन संघर्षों से गुजरते हुए भी उनका आत्मबल और उनके अंदर का मनुष्यत्व अपनी जगह कायम रहता है। इन कहानियों का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी कि लेखक के पास कहानी के परिवेश और परिदृश्य को संपूर्ण विश्वसनीयता में जीवंत कर देने वाला भाषा शिल्प है। उससे समृद्ध कहानियां हमारी आंखों में चलचित्र से गुजरती हैं। भाषा की यह ताजगी और विनोदी चुटकियां भरी शैली कहानियों को एकरस होने से बचाती और स्वाभाविकता बरकरार रखती है। वरिष्ठ कथाकार एवं व्यंग्यकार सूर्यबाला जी की कवर फ्लैप पर लिखी यह टिप्पणी- विपिन की रचनात्मकता को सार्थकता प्रदान करती है। 
वहीं डॉक्टर दामोदर खड़से का यह कहना- कहानी की मुख्य शर्त होती है- पठनीयता और रोचकता। विपिन पवार की कहानियों में इन दोनों बातों को विशेष रूप से देखा जा सकता है। पाठक निरंतर कहानी के साथ-साथ बहता चला जाता है। जिज्ञासा का पुट इतना अधिक होता है कि रुकने की कहीं संभावना पाठक खोज नहीं पाता। शैली इस प्रकार चुनी गई है की कहानियां अत्यंत रोचकता लिए हुए हैं। भाषा अत्यंत सरल और बोधगम्य है। इससे मैं भी पूरी तरह सहमत हूं।
वरिष्ठ कथाकार एवं प्रतिष्ठित पत्रकार भाई महेश दर्पण ने ठीक ही कहा है- कविता से रचना आरंभ करने वाले विपिन पवार की यह कहानियां जीवनानुभवों से उपजी हैं। महेश भाई का यह विश्वास भी है कि जीवन को एक पाठशाला समझने वाले गुणी पाठक जब इन कहानियों को पढ़ेंगे, तो उन्हें एक नई रोशनी अवश्य मिलेगी। इस संग्रह की आठों कहानियां उन्हें अपने अपने ढंग से आकर्षित करेंगी। ठीक ही कहा है महेश दर्पण जी ने।
अंत में, मेरा मानना है- विपिन जैसे रचनाकारों की हिंदी साहित्य को बहुत जरूरत है जो अपने लेखन के माध्यम से जनमानस को, विपरीत परिस्थितियों के कारण धीरे-धीरे उपज रहे नैराश्य और अवसाद से बचाकर उन्हें सकारात्मकता की रोशनी प्रदान करेंगे। यही उनका सच्चा लेखन और साहित्य में एक बड़ा योगदान होगा।
यह कहानी संग्रह- पीली रोशनी का समंदर इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इतना विश्वास दिलाता हूं कि यह संग्रह पाठकों को निराश नहीं करेगा।

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