कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या रूप चतुर्दशी या छोटी दीवाली के रूप मनाया जाता है। कहते हैं कि भगवान श्री कृष्ण ने सत्यभामा के सहयोग से नरकासुर का वध किया था और उसकी कैद से सोलह हजार एक सौ कन्याओं व स्त्रियों को मुक्त करा कर उन्हें सम्मान दिया था। इसी उपलक्ष्य में दीयों की बारात सजाई जाती है।
नरकासुर भूदेवी और वराह का पुत्र था। उसका वास्तविक नाम भौमासुर था, लेकिन क्रूर अत्याचारी होने के कारण उसे नरकासुर कहा जाने लगा। उसे तीन राजवंशों प्राग्ज्योतिषपुर, भौम और कामरूप का जनक माना जाता है। मान्यता यह भी है कि मिथिला से आया और प्राग्ज्योतिषपुर के दानव सम्राट घटकासुर को हराकर प्राग्ज्योतिषपुर पर अधिपत्य स्थापित किया। कहा जाता है कि नरकासुर बहुत ही प्रतापी व बलशाली राजा था, उसने न केवल पृथ्वी के सभी राज्यों पर अपितु स्वर्ग पर भी अधिकार कर लिया। वह त्रलोक विजयी था। इतना ही नहीं उसने वरुण का छत्र, अदिति के कुण्डल और देवताओं की मणि छीन ली थी। कई राजाओं और आमजनों की सोलह हजार एक सौ कन्याओं को बंदी गृह में डाल दिया था। श्री कृष्ण की पत्नी सत्यभामा को भूदेवी का अवतार माना जाता है। श्री कृष्ण और सत्यभामा ने नारायणास्त्र से नरकासुर वध कर दिया और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को उसकी कैद से मुक्त कर दिया, परंतु कैद में रहने के लांछन और अपमान के कारण उन कन्याओं को कोई अपनाने को तैयार नहीं हुआ तो श्री कृष्ण ने उन्हें अपनी पत्नी बनी रह कर जीने का सम्मान प्रदान किया। इस इस दिन नरक चतुर्दशी को पर्व के रूप में मनाया जाता है।
पूरे देश में दीपावली के पाँचों त्यौहार अर्थात धनतेरस, नरक चतुर्दशी या रूप चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज अपनी भौगोलिक व प्राकृतिक स्थिति के अनुसार मनाया जाता है। परंतु, गोवा में नरक चतुर्दशी ऐसे मनाई जाती है जैसे दशहरा मनाया जाता है अर्थात जिस तरह रावण का पुतला बनाकर उसका दहन के किया जाता है उसी तरह गोवा में नरकासुर का पुतला बनाकर दहन किया जाता है। वहाँ चतुर्दशी को नरकासुर का पुतला बनाकर खड़ा किया जाता है और दीपावली के दिन प्रातः दहन किया जाता है। आज 3 नवंबर को बनाए गए नरकासुर के पुतले का चित्र यहाँ प्रस्तुत है, जिसका दहन 4 नवंबर दीपावली के दिन किया जाएगा।
श्री सत्येंद्र सिंह
सेवानिवृत्त वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी
सप्तगिरी सोसाइटी, जांभुलवाडी रोड,
आंबेगांव खुर्द, पुणे-411046
0 टिप्पणियाँ