डॉ. सि. तु. (दादा) गुजर पुरस्कार वैद्यकीय क्षेत्र का डॉ. अशोक बेलखोडे को और सामाजिक क्षेत्र का पुरस्कार रवि बापटले को प्रदान करते हुए डॉ. श्रीपाल सबनीस, साथ में डॉ.एस.एफ.पाटिल, श्री सतीश अग्रवाल व श्री अनिल गुजर उक्त चित्र में दिखाई दे रहे हैं।
हड़पसर, प्रतिनिधि (हड़पसर एक्सप्रेस न्यूज़ नेटवर्क)
डॉ.दादा गुजर का समाजकार्य बहुत बड़ा है। डॉ. एस. एफ. पाटिल, श्री अनिल गुजर संशोधन जैसे सभी प्रकल्प संस्था में कार्यान्वित रखते हैं। डॉ. दादा गुजर के कार्य को अविरल जारी रखने के लिए, साथ ही संस्था के सामाजिक कार्यों को बढ़ाने का कार्य श्री अनिल गुजर बखूबी निभा रहे हैं। यह विचार अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. श्रीपाल सबनीस ने व्यक्त किए।
डॉ. दादा गुजर की सोलहवीं स्मृति के उपलक्ष्य में महाराष्ट्र आरोग्य मंडल की ओर से वैद्यकीय व सामाजिक क्षेत्र में समाजकार्य करनेवाले व्यक्तियों को डॉ. सि. तु. (दादा) गुजर पुरस्कार से नवाजा जाता है। डॉ. दादा गुजर के समानांतर चिकित्सा एवं ग्रामीण विकास कार्य करनेवाले डॉ.अशोक बेलखोडे व श्री रवि बापटले को इस साल का डॉ. सि. तु.(दादा) गुजर पुरस्कार अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. श्रीपाल सबनीस के शुभ हाथों प्रदान करके उनका सम्मान किया गया, तब आयोजित पुरस्कार वितरण समारोह में वे बोल रहे थे। पुरस्कार वितरण समारोह की शुरूआत साने गुरुजी प्राइमरी स्कूल के विद्यार्थियों ने अभिवादन गीत प्रस्तुत करके की।
इस अवसर पर यहां महाराष्ट्र आरोग्य मंडल के अध्यक्ष डॉ.एस.एफ.पाटिल, उपाध्यक्ष श्री सतीश अग्रवाल, सचिव श्री अनिल गुजर, डॉ. राजेश पवार, डॉ.सुदाम काटे व डॉ.अनिता शरद पाटिल प्रमुख रूप से उपस्थित थे। पुरस्कार वितरण समारोह में साने गुरूजी अस्पताल, किनवट, नांदेड के डॉ. अशोक बेलखोडे को वैद्यकीय क्षेत्र और हैप्पी इंडियन विलेज, लातूर के श्री रवि बापटले को सामाजिक क्षेत्र का पुरस्कार दिया गया। पुरस्कार का स्वरूप शाल, श्रीफल, मानपत्र व 51 हजार रुपए था। डॉ. अशोक बेलखोडे का सम्मानपत्र डॉ. प्रणिता जोशी देशमुख व श्री रवि बापटले के सम्मानपत्र को सुनीता कारंडे ने पढ़ा।
पुरस्कार का जवाब देते हुए डॉ.अशोक बेलखोडे ने कहा कि डॉ. दादा गुजर सभी क्षेत्रों में वास्तविक दादा थे। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी ग्रामीण स्वास्थ्य की उपेक्षा की जा रही है जो अफसोस की बात है। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में अभी भी विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। डॉ. दादा गुजर के नाम पर दिया जानेवाला पुरस्कार मुझे स्फूर्ति देनेवाला है। यह पुरस्कार एक बड़े भाई ने छोटे भाई की पीठ थपथपानेवाला है।
पुरस्कार को जवाब देते हुए श्री रवि बापटले ने कहा कि जिंदगी के सामने जीना आसान है, लेकिन मौत के सामने जीना बहुत मुश्किल। मैं एक समाज के द्वारा बहिष्कृत किया गया हूँ। भविष्य में, समाज ने बच्चों की शादी करने से पहले एच.आई.वी. जांच करना जरूरी है तब ही एच.आई.वी. नियंत्रण में लाया जा सकता है। भारत की कुल जनसंख्या का एक प्रतिशत वर्तमान में एच.आई.वी.से संक्रमित है। प्रमिला कलसे व विजया देवकाते ने डॉ.दादा गुजर के साथ आए अनुभव बताते हुए डॉ. दादा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। श्री चंद्रकांत जोगदंड ने डॉ. दादा के बारे में कृतज्ञता व्यक्त करते हुए रची गई कविताएँ प्रस्तुत कीं।
पुरस्कार वितरण समारोह का प्रास्ताविक संस्था के सचिव श्री अनिल गुजर ने किया। सूत्र-संचालन डॉ. गायत्री सावंत और आभार प्रदर्शन सोनाली बोरसे ने किया।
0 टिप्पणियाँ