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हमारे समय एवं समाज का जीवंत दस्तावेज : विपिन पवार

 पुस्तक समीक्षा 
व्यंग्य के पुरोधा हरिशंकर परसाई ने एक बार कहा था कि  व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है, विसंगतियों, अत्याचारों, मिथ्याचारों और पाखंड का पर्दाफाश करता है। हमारा इस कथन से साक्षात्कार होता है, जब हम स्थापित अभिनेता, कवि, लेखक एवं व्यंग्यकार आशुतोष राणा की पहली पुस्तक मौन मुस्कान की मार पढ़ते हैं। आशुतोष राणा मंजे हुए कलाकार हैं और जब कलाकार व्यंग्यकार हो, तो सोने में सुहागा हो जाता है। इस संग्रह में आशुतोष के 27 व्यंग्यलेख समाहित हैं। लगभग सभी व्यंग्यलेखों के पात्र हमारे आसपास से लिए गए हैं। ये पात्र काल्पनिक नहीं हो सकते। हम अपने रोजमर्रा के जीवन में प्रायः इनसे रूबरू होते हैं। चाहे वे लामचंद, गप्पी, भक्क नारायण, भग्गू पटेल, आत्माराम विज्ञानी, राम रवा, बिस्पाद बुधौलिया, गुंचई, मुरली मनोहर श्याम बिहारी हों या डॉ. लाठी हों, आशुतोष अपने व्यंग्यलेखों के अंत में बड़े मार्के की बात कह देते हैं और यह बिलकुल भी सायास नहीं होता। इसमें कहीं भी उपदेश की बू नहीं आती। जैसे- हम अपने जीवन में संकल्पों को तो बहुत महत्व देते हैं, लेकिन विकल्पों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते। सफलतापूर्वक जीवन जीने के लिए जितना महत्व संकल्प का होता है, शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए उतना ही महत्व विकल्प का भी होता है। (पृष्ठ 31)
कहते हैं कि जीवन अनुभवों की खान होता है और इसी खान से कुछ नायाब हीरे- मोती निकलते हैं। आशुतोष राणा ने अपने संपूर्ण जीवन में जो अनुभव किया, वही लिखा है और इस लेखन के दौरान कुछ अनूठे वाक्यों का सृजन हुआ है, जो सूक्तियों में परिवर्तित हो गए हैं। जैसे- मूर्खता से शुरू होने वाला जीवन धूर्तता पर ही समाप्त होता है। (पृष्ठ 37) 
हत्या से अधिक घातक चरित्र हत्या होती है। (पृष्ठ 43)
आजकल कुछ न बोलना भी एक किसम का विरोध माना जाता है, इसलिए बो मत बोलो जो तुमको अच्छा लगता है बो बोलो जो उसको अच्छा लगता है। (पृष्ठ 53) 
अकेला व्यक्ति यदि बात करने लगे तो लोग उसे पागल कहेंगे, चुप रहना मेरा स्वभाव नहीं, मेरे सामान्य प्राणी होने का प्रमाण है। (पृष्ठ 67) 
शेष आदमी होकर विशेष आदमी होने का रुतबा मत मांगो। (पृष्ठ 73)
मैं सन्नाया हुआ सा खड़ा था वे भन्नाए हुए से मुझे देख रहे थे। (पृष्ठ 87) 
आसक्ति अशांति का कारण होती है। (पृष्ठ 113) 
व्यक्ति का विवेक जागता ही तब है जब उसकी वेदना मर जाती है। (पृष्ठ 113) 
जिस दिन मां बच्चे को शौच कराना बंद कर दें और बच्चा स्वयं शुरू कर दे, तो समझ लो वह स्वावलंबी हो गया। शौच की निर्भरता के साथ ही आपकी सोच भी शुरू हो जाती है। (पृष्ठ 114) 
आदमी को खुशी वर्तमान की हकीकत में नहीं भविष्य की सुखद कल्पना से मिलती है। (पृष्ठ 117) 
कल शब्द बड़ा चमत्कारी है इसको भविष्य के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है और अतीत के लिए भी। जिस युग में आज के लिए नहीं कल के लिए जिया जाए वही तो कलयुग है। (पृष्ठ 118) 
यह दुनिया मन से नहीं धन से चलती है। तुम्हारा मन भले ही काला हो, लेकिन धन सफेद होना चाहिए, समझे। (पृष्ठ 123) 
पाप भले ही उजाले में करो, लेकिन पुण्य का काम हमेशा अंधेरे में करना चाहिए। (पृष्ठ 123 एवं 124) 
जो माया के आगे चले वह मायापति होता है और जो माया के पीछे चले वह मायावी कहलाता है। (पृष्ठ 130) 
सत्य पीड़ित हो सकता है किंतु पराजित नहीं। (पृष्ठ 161)
सिस्टम लायकी और नालायकी का अदभुत मिश्रण है। (पृष्ठ 163) 
जितना बड़ा आपका दुश्मन उतने बड़े आप। (पृष्ठ 164) 
मां को न चाहते हुए भी अपने हृदय के टुकड़े करने पड़ते हैं क्योंकि वह इस व्यावहारिक सत्य को जानती हैं यदि वे बच्चों में बँटेगी नहीं तो फिर कटेगी या पीटेगी। (पृष्ठ 170) 
मुस्कान वह अद्भुत अस्त्र है, जो मुखर, वाचाल और वाचिक प्रदूषण पैदा करने वाले व्यक्ति को नष्ट ही नहीं, ध्वस्त भी करता है। (पृष्ठ 192) 
एक होता है जबरदस्त अपनापन और एक है जबरदस्ती का अपनापन। (पृष्ठ 195) 
प्रत्येक व्यंग्य लेख में परमात्मा श्रीवास्तव द्वारा कलेवर के अनुरूप रेखांकन किए गए हैं। पृष्ठ 162 का व्यंग्य रेखांकन तो इतना सटीक है कि संपूर्ण लेख के चरित्र को व्याख्यायित करता है... क्योंकि छाछ भी कभी दही थी।  आशुतोष के इन व्यंग्य लेखों में जहां अनेक स्थानों पर ठहाकों के तड़के लगते हैं, वहीं इनमें हमें मौन मुस्कान की जबरदस्त गुदगुदी भी दिखाई देती है, लेकिन इस हास्य के पीछे एक मारक सत्य भी छुपा होता है, जिसे वह समझ कर अपने सिर के बाल नोच लेता है जिस पर व्यंग्य  लिखा गया है, जैसा कि डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि  व्यंग्य  वह है जहां कहने वाला तो अधरोंष्ठों में हँस रहा हो पर सुनने वाला तिलमिला रहा हो।   
समर्थ कवि होने के नाते आशुतोष तुक के बादशाह हैं। उनके ये व्यंग्य लेख काव्यात्मक गद्य कहे जा सकते हैं, जिनमें हमें विलक्षण कवित्व के दर्शन होते हैं। आशुतोष की भाषा व्यंग्यों के अनुरूप हैं। हमें इस भाषा में मध्यप्रदेश के महाकौशल क्षेत्र की ठेठ हिंदी के दर्शन हो जाते हैं। जैसे- बो मत बोलो (पृष्ठ 53), ऐसे सुट्ट हो गए (पृष्ठ 120), हुदके हुए (पृष्ठ 123), झांपे (पृष्ठ 140), बड्डे (पृष्ठ 119) आदि में बुंदेली की मिठास घुली हुई है।  
आशुतोष ने अपने लेखन में धड़ल्ले से अंग्रेजी का प्रयोग किया है, लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि अंग्रेजी को भी रोमन की बजाय देवनागरी लिपि में लिखा जाए। केवल शॉर्टकट/कटशार्ट शीर्षक से लिखित अंतिम लेख में रोमन लिपि का प्रयोग अनिवार्य होने के कारण किया गया है। नवीन शब्दों के निर्माण से भाषा समृद्ध होती है और इस दृष्टि से हम आशुतोष राणा के ऋणी हैं कि उन्होंने इस संग्रह में हिंदी को कुछ नए शब्द दिए हैं। जैसे- सोचित (पृष्ठ 65), कद कटाई (पृष्ठ 96), हदबदा (पृष्ठ 106), ठुसकी की ठसक (पृष्ठ 107), जमानतवीर (पृष्ठ 109), थोड़े-मोड़े विचार, चुकीया- जो ऐन मौके पर चुक जाए (पृष्ठ 114), स्वचुरित (पृष्ठ 115), चुरफंदे (पृष्ठ 117)। पुस्तक में वर्तनी की कुछ अशुद्धियां पाई गई हैं। जैसे- राजपाठ (पृष्ठ 79), तुष्टी (पृष्ठ 125), चहरे (पृष्ठ 125), धोषणा, संतुष्टी) (पृष्ठ 169)। पुस्तक का मुखपृष्ठ आकर्षक है। कागज, छपाई, बाइंडिंग आदि बढ़िया है। हमारे समय एवं समाज को जानने के लिए यह एक बेहद जरूरी पुस्तक है, जिसे जब आप शुरू करेंगे, तो पढ़ कर ही खत्म करेंगे।
पुस्तक- मौन मुस्कान की मार, 
विधा- व्यंग्य लेख, 
लेखक- आशुतोष राणा, 
प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली,
संस्करण- 2019, 
मूल्य-  400, 
पृष्ठ संख्या 200
श्री विपिन पवार
उप महाप्रबंधक (राजभाषा) 
मध्य रेल, मुंबई

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