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नहीं मालूम!


किसी की याद आती है मगर किसकी नहीं मालूम,
तमन्ना जाग जाती है मगर किसकी नहीं मालूम!

हर इक नग़मा तो गाया जा चुका दिल का मगर फिर भी,
ये धड़कन धुन बनाती है मगर किसकी नहीं मालूम!
दियों से दूर रौशन लौ को देखा तो ख़याल आया,
किसी की तो ये बाती है मगर किसकी नहीं मालूम!

ये किसने कह दिया हमको कोई अच्छा नहीं लगता,
कोई सूरत तो भाती है मगर किसकी नहीं मालूम!
घड़ी भर को अगर तन्हा रहूँ तो चौंक पड़ता हूँ,
कि पायल छनछनाती है मगर किसकी नहीं मालूम!

छिड़ा जो ज़िक्र उसका तो किसी ने ये कहा मुझसे,
ग़ज़ल वो गुनगुनाती है मगर किसकी नहीं मालूम!
-सुभाष पाठक ‘ज़िया’

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