श्री संदीप लहाने पाटिल
(मजदूर नेता)
राष्ट्रीय अध्यक्ष- राष्ट्रीय गैस एजेंसी कामगार संघटना
शरीर और देश का, साथ ही राज्य का विकास होते हुए इन असंगठित गैस एजेंसी कर्मियों का योगदान महत्वपूर्ण है। हालाँकि, वे अपने ही विकास के लाभ से वंचित हैं, उनके सामाजिक और आर्थिक स्तर को ऊपर उठाकर उन्हें शहर या देश के विकास में शामिल करना और उन्हें नागरिक के रूप में रहने में सक्षम बनाना आवश्यक है। सभी तत्वों के साथ-साथ तेल कंपनी या प्रणाली की ओर से एक ठोस प्रयास होना जरूरी है, जिसके बिना गैस एजेंसी के कर्मचारियों को वास्तविक न्याय नहीं मिलेगा।यह देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले देश के सभी शहरों या यहाँ तक कि गाँवों-बस्ती, हवेलियों में, छोटे-बड़े गाँवों में, शहरों में लोगों के घरों तक सिलेंडर पहुंचाकर हाथ पर पेट रहनेवाले ऐसे देशभर में असंगठित करीब 8 से 10 लाख या उससे अधिक गैस एजेंसी कर्मचारी हैं। गैस एजेंसी में काम करते-करते कई कर्मचारियों की एक पीढ़ी गुजर गई और दूसरी पीढ़ी वर्तमान में काम कर रही है और कुछ जगहों पर उनकी तीसरी पीढ़ी वर्तमान में गैस कर्मचारी के रूप में काम कर रही है। 1980 और 1990 के दशक में अधिकांश क्षेत्रों में गैस एजेंसियों का संचालन शुरू हुआ और तब से हर साल नई गैस एजेंसियां मार्केट में प्रवेश कर रही हैं। पिछले 40 वर्षों में आज तक बिना किसी हड़ताल के, कोरोना काल में भी, जब मौत सामने थी, बिना डरे कि कोरोना हो जाएगा, बिना डगमगाए, जितना हो सके अपना ख्याल रखा और इस काम को एक आवश्यक सेवा के रूप में जारी रखा। उन्होंने यथासंभव सावधानी बरतते हुए, यहां तक कि मृत्यु के भय के बिना, एक आवश्यक सेवा के रूप में इस कार्य को निरंतर जारी रखते हुए अपनी अहम भूमिका निभाई है। यह गैस एजेंसी कर्मचारी ज्यादातर राजस्थान राज्य के बिश्नोई के साथ-साथ मारवाड़ी, राजपूत जाति के हैं जो ज्यादातर भारत के पश्चिमी या दक्षिणी हिस्सों और भारत के उत्तर और मध्य भागों में भी काम करते पाए जाते हैं। इसके अलावा, उन राज्यों में श्रमिक वर्ग भी बड़े पैमाने पर उन राज्यों में गैस एजेंसी श्रमिकों के रूप में काम करते हैं। गैस मैकेनिक व गैस एजेंसी कार्यालय के कार्यरत कर्मचारी भी गैस एजेंसी का मुख्य घटक हैं। इन श्रमिकों के साथ मजदूर, खेतिहर मजदूर, घरेलू कामगार, पेट्रोल पंप कर्मचारी, गैस सिलेंडर यातायात करनेवाले ट्रक ड्राइवर, डीजल-पेट्रोल यातायात करनेवाले टैंकर ड्राइवर, स्विगी और ज़ोमैटो के डिलीवरी बॉय ऐसे अन्य और कई आदि असंगठित श्रमिक शामिल हैं जो वर्तमान में देश भर में विभिन्न स्थानों पर सेवा दे रहे हैं। अब तक इनके हक, अधिकार व सुविधा के बारे में किसी ने भी ना आवाज उठाई ना ही कोई बोल रहा है इसलिए हम अपने माध्यम से उनके लिए एक राष्ट्रीय गैस एजेंसी वर्कर्स यूनियन का गठन (स्थापना) कर रहे हैं।
स्वास्थ्य संबंधी अनेक शिकायतें
भारत का संविधान काम और सामाजिक सुरक्षा के लिए सहायता प्रदान करता है। दिन भर कड़ी मेहनत-परिश्रम करते हुए सिलेंडर प्लांट से भरा हुआ सिलेंडर ट्रक आने के बाद सिलेंडर को गोदाम में वहां से अपने टेम्पो, गाड़ी या साइकिल पर सिलेंडर लेकर ग्राहकों को समय पर सिलेंडर पहुंचाने की जिम्मेदारी बखूबी निभाते हैं। ग्राहकों को समय पर सिलेंडर पहुंचाना, लेकिन काम के घंटे तय नहीं, कितना काम करना है इसकी कोई सीमा नहीं, सिलेंडर हाथ में है और ग्राहक द्वारा बुक किया गया सिलेंडर ग्राहक के घर तक पहुंचाया जाना है उनके दिमाग में बस इतना ही रहता है और इसके लिए कितना भी समय लगे फिर भी वो काम पहले। साथ ही गैस मैकेनिक को भी अपना काम इसी तरह पूरा करना होता है। पेट के लिए दो वक्त का खाना और अपना संसार चलाने के लिए गैस कर्मचारी यह सब चुपचाप सहन कर लेते हैं और दिनभर बड़ी मेहनत करके अपने परिवार की उपजीविका चलाते हैं। ग्राहक को समय पर सिलेंडर पहुंचाकर उनके घर की रसोई में समय पर खाना बनाने के लिए वक्त पर वे सिलेंडर लेकर पहुंचते हैं। चाहे शरीर को कितना भी दर्द क्यों न हो, उन्हें ये 30 से 40 किलो का सिलेंडर उठाना ही पड़ता है। इतने वजन के साथ उन्हें बिल्डिंग की कई मंजिल सिलेंडर अपने कंधों पर उठाकर ऊपर चढ़ना पड़ता है। कभी-कभी यह इतना निराशाजनक होता है कि 6 वीं- 7 वीं- 8 वीं मंजिल तक सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद ग्राहक का घर बंद होता है, उनका कॉल भी लगता नहीं है, ऐसे समय में विकट परिस्थितियों में वापस लौटना पड़ता है। कई जगहों पर बिल्डिंग में सिलेंडर ऊपर ले जाने के लिए लिफ्ट के इस्तेमाल पर भी रोक है। साथ ही कई बार छोटी - छोटी सड़कें या भीड़भाड़ के कारण काफी दूर तक गाड़ी खड़ी करनी पड़ती है और कंधे पर आधा-आधा किलो मीटर सिलेंडर लेकर ग्राहक के घर तक सिलेंडर पहुंचाना पड़ता है। कभी-कभी इतनी दिक्कतें उठाने के बावजूद भी अगर किसी ग्राहक का घर बंद हो तो उसे अगले दिन वापस फिर से घर जाना पड़ता है। इस कारण शरीर पर लगातार तनाव के कारण कई लोगों के मस्तिष्क, रीड की हड्डी व अन्य अंग स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो गए हैं। वे अस्पताल का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं। श्रमिकों का कई जगहों पर काम करते समय पैरों पर सिलेंडर गिरने से दुर्घटनाएं होती रहती हैं। घर-घर गैस सिलेंडर ले जाने के दौरान सड़क दुर्घटना में मृत्यु भी हुई है। कभी-कभी गैस सिलेंडर फटने से दुर्घटनाएं होती हैं और चोटें या मौत हो जाती है। आए दिन सिलेंडर हाथ-पैरों पर गिरने से कई बार उनकी हाथों और पैर की उंगलियां टूट जाती हैं, छोटे-मोटे फ्रैक्चर लगातार होते रहते हैं, लेकिन उस समय वे इसका खर्च वहन नहीं कर सकते थे या उस समय कोई उन्हें पैसे नहीं देता है। गैस एजेंसी मालिक या तेल कंपनियां पर्याप्त सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराती हैं इसके चलते कई कर्मचारी दुर्घटना का शिकार होकर घायल हो जाते हैं। साथ ही गैस मैकेनिक को भी अपना काम इसी तरह पूरा करना होता है, इसलिए उनके लिए एक स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी शुरू करनी चाहिए।
काम की गारंटी नहीं
असंगठित गैस एजेंसी के कर्मचारियों की नौकरी कभी भी स्थायी नहीं होती है, चाहे वे कितनी भी बड़ी या छोटी गलतियाँ क्यों न करें, उन्हें बिना किसी कारण के नौकरी से निकाल दिया जाता है, चाहे वे उस गैस एजेंसी में कितने वर्षों से काम कर रहे हों उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है। फिर उन्हें जल्दी कहीं नौकरी भी नहीं मिलती है। श्रमिकों के जीवन-घातक संघर्षों और स्थायी निजी कारखानों, आस्थापना, सरकारी श्रमिकों के बीच असमानता की एक बड़ी खाई है। ऐसे संगठित कर्मचारियों को या सरकारी अफसर बाबू को वार्षिक छुट्टियाँ, भुगतान की छुट्टी, बीमारी का खर्च, घर का किराया, बोनस और परिवार के अन्य सदस्यों के लिए बीमारी का खर्च भी उपलब्ध है। हर साल अलग-अलग वेतन वृद्धि समझौते होते हैं। उन्हें अच्छा बीमा मिलता है, उनकी मृत्यु के बाद, इन उत्तराधिकारियों को पर्याप्त लाभ मिलता है। इसके विपरीत असंगठित गैस एजेंसी के श्रमिकों के साथ अन्य असंगठित श्रमिकों को कोई खर्च या लाभ नहीं मिलता है और न ही उन्हें बीमारी का खर्च या मृत्यु बीमा या दुर्घटना मृत्यु के मामले में मुआवजा मिलता है। यदि परिवार का भरण-पोषण करनेवाले श्रमिक की मृत्यु हो जाए तो उसका परिवार बेबस-बेसहारा हो जाता है। अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। उन्हें मिलनेवाला वेतन संतोषजनक नहीं है, उनकी आय ग्राहकों से मिलनेवाले उपहार के रूप में चंद रुपए और अल्प मासिक वेतन या प्रत्येक सिलेंडर की डिलीवरी पर मामूली कमीशन के रूप में एकत्र की जाए फिर भी बढ़ती महंगाई, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान का किराया आदि खर्चा ठीक से नहीं उठा पाते हैं तो उनके पास इतने पैसे कब आ पाएंगे कि वे अपना खुद का घर बना सकें जिसके कारण सिर पर अपना खुद की छत, अपना एक सुंदर घर होने की ख्वाइश पाने का सपना अधूरा ही रह जाता है। कई श्रमिकों की दो पीढ़ियाँ गैस एजेंसी के कर्मचारियों के रूप में काम कर रही हैं, लेकिन वे अपना खुद का एक घर भी बना नहीं सके हैं।
सुरक्षा अधिनियम की आवश्यकता
जिस प्रकार संगठित क्षेत्र के साथ-साथ सरकारी क्षेत्र के श्रमिकों को भविष्य निधि, स्वास्थ्य बीमा, बोनस, पेंशन, मृत्यु बीमा जैसे लाभ मिलते हैं, उसी प्रकार असंगठित गैस एजेंसी के श्रमिकों को भी न्यूनतम वेतन, स्वास्थ्य बीमा, मृत्यु बीमा और पेंशन मिलना आवश्यक है। इसके लिए सामाजिक सुरक्षा अधिनियम बनाया गया, लेकिन वित्तीय प्रावधान की कमी या धन की कमी के कारण कुछ नहीं किया गया। राष्ट्रीय और राज्य बजटों में इसकी घोषणा तो की जाती है, लेकिन इसे लागू नहीं किया जाता। समाज का एक महत्वपूर्ण तत्व यानी गैस सिलेंडर एक तरह से जिंदा बम है, इसके लिए पहले इसकी जांच करके फिर हर घर में जाकर गैस सिलेंडर दिया जाता है। गैस सिलेंडर देने के बाद ही लोगों के घरों में खाना पकाया जाता है। एक दिन अगर गैस एजेंसी के कर्मचारी छुट्टी ले लें तो कई घरों में गैस जलती नहीं है और अगर गैस एजेंसी कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर कुछ दिनों के लिए हड़ताल पर चले गए तो देश में बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी, लेकिन चूंकि यह एक आवश्यक सेवा है, इसलिए वे कोई छुट्टी नहीं ले सकते। यदि छुट्टी ली जाती है तो उसकी जगह किसी दूसरे कर्मी को लाना पड़ता है। वर्तमान समय में कई शहरों में पाइप लाइन के माध्यम से घर तक आनेवाली गैस पाइपलाइन के कारण कई कर्मचारी अपनी नौकरी खो रहे हैं, उन्हें उनकी उम्र के अनुसार दोबारा साधारण नौकरी भी नहीं मिल रही है, क्योंकि वे कई वर्षों से किसी न किसी गैस एजेंसी में काम कर चुके हैं और उनकी उम्र भी ज्यादा है और फिर इस उम्र में जहां उन्हें नौकरी मिलने की कोई उम्मीद नहीं है, ऐसे गैस एजेंसी कर्मचारियों के लिए किसी तरह की पेंशन योजना शुरू करनी चाहिए ताकि अगर उनकी नौकरी चली जाए तो भी वे आजीविका के साधन के रूप में मिलनेवाली पेंशन से अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें, ऐसे महत्वपूर्ण कार्य करनेवाले श्रमिकों का जीवन आरामदायक हो, इसके लिए सामाजिक सुरक्षा कानून की और गैस एजेंसी कर्मियों को लोग समझें, इसकी आवश्यकता है।
गैस एजेंसी कर्मियों को सड़क पर होनेवाली तकलिफें
सड़क से गैस एजेंसी के कर्मचारी को ग्राहक के घर तक जल्द से जल्द सिलेंडर पहुंचाना होता है इसलिए इस जल्दबाजी में वो जाते समय अपनी गाड़ी कहीं नो पार्किंग में खड़ी करनी पड़ती है या कभी उन्हें नो एंट्री में से भी थोड़ा गुजरना पड़ता है तब लोगों को परेशानी तो होती है परंतु ट्रैफिक पुलिसकर्मी भी उन्हें काफी परेशान करते हैं। साथ ही ट्रैफिक पुलिस उन्हें चौक-चौक में रोककर उनसे पूछताछ करती है कि क्या उनके पास गैस सिलेंडर परिवहन का लाइसेंस है। इसके लिए किसी भी विभाग द्वारा गैस एजेंसी कर्मियों या गैस एजेंसी मालिकों को अलग से कोई लाइसेंस नहीं दिया जाता है, इसलिए पुलिसकर्मी भी अपना काम करते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है। हालाँकि ऐसी और कई चीजों का सामना करते हुए अपने दिन के काम को समय पर पूरा करने की आवश्यकता को देखते हुए सामने आनेवाली स्थिति का सामना करते हुए वे आगे बढ़ते रहते हैं। अगर वे अपना समय एक ही जगह बिताते हैं तो फिर ग्राहक को समय पर सिलेंडर नहीं मिलता है तो फिर ग्राहक के घर में चूल्हा नहीं जलता है, इसलिए यह एक मामूली अपेक्षा है कि गैस एजेंसी के कर्मचारी सहयोगी बनें।
गैस एजेंसी कार्यबल का एक अन्य घटक गैस मैकेनिक
गैस एजेंसी कर्मियों के बीच गैस सिलेंडर और गैस ग्रिल की मरम्मत या जांच करनेवाले मैकेनिक, उन्हें भी 24 घंटे सेवा प्रदान करने की गारंटी दी जाती है क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि किसी भी घर में गैस सिलेंडर या भट्ठी लीक हो जाएगी, इसलिए जब भी किसी का फोन आता है तो तुरंत उन्हें आधे घंटे के अंदर वो अपना परिवार, बच्चे, पत्नी सब छोड़कर वहां पहुंचना होता है और लोगों की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर वहां काम करना पड़ता है और उन्हें मिलने वाली मज़दूरी बहुत कम है। कई जगहों पर गैस मैकेनिकों को कोई वेतन नहीं मिलता है। उन्हें ग्राहकों से मिलनेवाले टिप या उपहार पर निर्भर रहना पड़ता है। वे छोटी-बड़ी गैस भट्ठियों की सर्विसिंग से थोड़े-थोड़े पैसे बचाकर अपनी जिंदगी की उपजीविका चलाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। उन्हें कई लोगों का सामना भी करना पड़ता है, तब जाकर कहां उन्हें प्रतिदिन 400-500 रुपये मिलते हैं। इसके अलावा गैस एजेंसी कार्यालय के कर्मचारियों को अधिकतम घंटे काम करने के बाद भी न्यूनतम वेतन नहीं मिलता है। दिनभर लोगों के आनेवाले फोन कॉल का आनंदित होकर जवाब देकर उनकी परेशानियों को हल करके ग्राहकों को संतुष्ट करना पड़ता है। साथ ही रोजाना कई ग्राहकों का भी सामना करना पड़ता है, इसलिए इनका भी विचार किया जाना चाहिए।
इसका लाभ मजदूरों को मिलना चाहिए
असंगठित गैस कर्मियों की कुछ प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं :
-तेल कंपनियां गैस एजेंसी कर्मियों को अग्रिम पंक्ति का सैनिक (फ्रंट लाइन सोल्जर) मानती हैं या फिर कंपनी के व्यापार वृद्धि की रीढ़ मानती है, इसलिए तेल कंपनी का सीएसआर फंड अधिकतम गैस एजेंसी कर्मियों पर खर्च किया जाना चाहिए और श्रमिक हित की योजना बनाकर निर्णय लिये जाने चाहिए।
-सबसे पहले गैस एजेंसी के सभी कर्मचारियों का डाटा उस गैस एजेंसी में अनिवार्य रूप से होना चाहिए, कई बार श्रमिक अधिक होते हैं, लेकिन रिकार्ड में श्रमिक कम दर्शाए जाते हैं।
-न्यूनतम वेतन 30 हजार रुपये प्रति माह होना चाहिए या यदि कमीशन के रूप में है तो प्रत्येक सिलेंडर पर 35 रुपये कमीशन, कमर्शियल गैस सिलेंडर के लिए 70-80 रुपये कमीशन होना चाहिए।
-गैस एजेंसी मैकेनिक का भी न्यूनतम वेतन 25 हजार रुपये होना चाहिए या यदि ग्राहक आधारित कमीशन का भुगतान करना है तो प्रति ग्राहक 200 रुपये कमीशन अर्जित किया जाना चाहिए।
-असंगठित गैस एजेंसी के कर्मचारी और मैकेनिक की तेल कंपनी द्वारा दुर्घटना या किसी भी कारण से मृत्यु होने पर बीमा के रूप में 50 लाख रुपयों का मृत्यु बीमा उनके उत्तराधिकारियों को दिया जाना चाहिए ताकि उनके परिवारवालों को उनके बाद ज्यादा तकलीफ न उठानी पड़े।
-स्वास्थ्य बीमा के रूप में छोटी या बड़ी दुर्घटना या गैस सिलेंडर हाथों-पैरों पर गिरने से होनेवाली चोट या बीमारी होने पर 10 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा दिया जाना चाहिए और यह परिवार के सभी सदस्यों पर लागू होना चाहिए।
-दिवाली और त्योहारों पर एडवांस और बोनस देना गैस एजेंसी मालिकों या तेल कंपनियों को अनिवार्य किया जाए और यह कम से कम 30 से 40 हजार तक होना चाहिए।
-सभी गैस एजेंसी कर्मियों व उनके परिवार के सदस्यों की वर्ष में एक बार स्वास्थ्य जांच करायी जाए, यदि इसमें कोई बीमारी पाई जाए तो उसका तुरंत नि:शुल्क इलाज किया जाए।
-असंगठित गैस एजेंसी श्रमिकों का औद्योगिक स्तर पर पंजीकरण करके उनके लिए श्रमिक आवास (घरकुल) योजना लागू की जाए ताकि गैस एजेंसी श्रमिकों को अपनी खुद की छत का अधिकार मिल सके।
-देश भर में गैस एजेंसी कर्मचारियों की संख्या 8 से 10 लाख से अधिक है, इसलिए उनका अलग निगम स्थापित किया जाना चाहिए या फिर देश के श्रमिक कल्याण निगम में गैस एजेंसी कर्मियों के लिए अलग पद सृजित किया जाए।
-सभी गैस एजेंसी कर्मियों को राशन कार्ड जैसे उसी रूप में एक कार्ड या गैस कर्मी राशन कार्ड देकर उन्हें मामूली कीमत पर दाल, घी, तेल, चीनी, चायपत्ती, नारियल, दालें, गेहूं, चावल आदि चीजें उचित मूल्य पर उपलब्ध कराई जाएं।
-जिस स्थान पर गैस एजेंसी के कर्मचारी काम कर रहे हैं उसी स्थान पर इन्हें 60 वर्ष की आयु तक स्थायी कर्मचारी के रूप में रखना चाहिए।
-गैस एजेंसी कर्मियों के लिए भविष्य निधि के रूप में पीएफ की सुविधा शुरू की जाए, इसका आधा हिस्सा कर्मचारी का होना चाहिए और बाकी आधा हिस्सा गैस एजेंसी मालिक और तेल कंपनी का होना चाहिए।

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