पुणे, नवंबर (जिमाका)
सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास के तहत पंजीकृत और 5 लाख रुपये से अधिक वार्षिक व्ययवाले अस्पतालों को गरीब मरीजों को रियायती दर पर इलाज और निर्धन मरीजों को मुफ्त इलाज प्रदान करना चाहिए। यह निर्देश पुणे विभाग के धर्मादाय सहआयुक्त कार्यालय ने दिया है।
महाराष्ट्र सार्वजनिक ट्रस्टी प्रणाली अधिनियम 1950 के प्रावधानों के तहत पंजीकृत सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्टों के तहत पंजीकृत अस्पतालों को इस प्रावधान का पालन करना आवश्यक है। तदनुसार, मुंबई उच्च न्यायालय रिट याचिका (पीआईएल) नं. 3132/2004 का निर्णय न्यायालय द्वारा किया जा चुका है।
धर्मार्थ अस्पतालों को कुल बेड का 10 प्रतिशत हिस्सा निर्धन मरीजों के लिए मुफ्त इलाज के लिए और 10 प्रतिशत बेड कमजोर वर्ग के मरीजों के लिए रियायती इलाज के लिए आरक्षित करना चाहिए। आपातकालीन स्थिति में धर्मार्थ अस्पतालों को मरीज को तुरंत भर्ती करना चाहिए। जब तक रोगी स्थिर न हो जाए, उसे सभी आपातकालीन उपचार और जीवन रक्षक प्रक्रियाओं के लिए सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए। यदि आवश्यक हो, तो मरीज को आगे के इलाज के लिए सार्वजनिक अस्पताल तक ले जाने के लिए परिवहन सुविधा प्रदान की जानी चाहिए। धर्मार्थ अस्पतालों को आपातकालीन रोगी के रूप में भर्ती करते समय रोगी से कोई जमा राशि नहीं मांगनी चाहिए।
धर्मार्थ अस्पतालों ने बिस्तर, निवासी चिकित्सा अधिकारी सेवाएं, सुश्रृषा, भोजन (यदि अस्पताल द्वारा प्रदान किया जाता है), कपड़ा, पानी, बिजली, सामान्य विशेष उपचार के लिए आवश्यक नियमित निदान सेवाएं और हाऊस किपिंग आदि गरीब एवं कमजोर वर्ग के रोगियों को गैर-लाभकारी सेवाएँ निःशुल्क प्रदान की जानी चाहिए। गरीब मरीजों के मामले में, धर्मार्थ अस्पतालों को हर विभाग में चिकित्सा जांच और उपचार पूरी तरह से मुफ्त प्रदान करना चाहिए।
निर्धन मरीज़ों के भुगतान में जिन सेवाओं के लिए शुल्क लिया जाता है, ऐसी सेवाओं के लिए अस्पताल की न्यूनतम श्रेणी दर पर शुल्क लिया जाए। अस्पतालों को खरीद मूल्य में उपभोग्य सामग्रियों और प्रत्यारोपणों का आकार शामिल करना चाहिए।
औषधियाँ उपयोग में आनेवाली सामग्री (कंझ्युमेबल्स) व शरीर के अंदर प्रत्यारोपण (इम्प्लांट) अस्पतालों को इसे खरीद मूल्य में शामिल करना चाहिए।यदि डॉक्टर ने अपना वेतन माफ कर दिया है तो ऐसे वेतन को अंतिम भुगतान में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रकार किया गया भुगतान गरीब वर्ग के मरीजों के निधि खाते से खर्च किया जाना चाहिए।
कमजोर वर्ग के रोगियों के मामले में, धर्मार्थ अस्पतालों को हर विभाग में रियायती दरों पर चिकित्सा परीक्षण और उपचार प्रदान करना चाहिए। सेवाओं का शुल्क उस अस्पताल की न्यूनतम श्रेणी के रोगी दर पर लिया जाना चाहिए। अस्पतालों को खरीद मूल्य में उपभोग्य सामग्रियों और प्रत्यारोपणों का आकार शामिल करना चाहिए। हालांकि, कमजोर वर्ग के मरीजों को उपभोग्य सामग्रियों और प्रत्यारोपण के लिए कम से कम पचास प्रतिशत शुल्क का भुगतान करना होगा। साथ ही यदि डॉक्टर ने वेतन माफ कर दिया है तो उसे अंतिम भुगतान से बाहर रखा जाए और अंतिम भुगतान कमजोर वर्ग के मरीजों द्वारा भुगतान किए जाने वाले फंड खाते से किया जाए।
धर्मार्थ अस्पतालों को गरीब या कमजोर वर्ग के मरीजों को भर्ती करना होता है जो अन्य स्रोतों से या सरकारी अस्पतालों, नगरपालिका अस्पतालों आदि के माध्यम से उनके पास आते हैं। धर्मार्थ अस्पतालों को संबंधित मरीजों द्वारा अपने चिकित्सा सामाजिक कार्यकर्ता के माध्यम से प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों जैसे कि तहसीलदार के प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, गरीबी रेखा से नीचे के कार्ड जैसे दस्तावेजों के आधार पर मरीजों की वित्तीय स्थिति की सावधानीपूर्वक जांच और सत्यापन किया जाना चाहिए।
धर्मादाय सहआयुक्त या उनके प्रतिनिधि की अध्यक्षता में एक जिला स्तरीय निगरानी समिति योजना के कार्यान्वयन की निगरानी और रोगी की शिकायतों, यदि कोई हो, पर विचार करेगी और धर्मादाय आयुक्त को पेश करेंगे।
यदि अस्पतालों ने धर्मार्थ योजना का उल्लंघन करते पाया गया तो महाराष्ट्र सार्वजनिक ट्रस्टी अधिनियम, 1950 की धारा 66 के तहत जुर्माना लगाया जाएगा। इसके अलावा चैरिटी कमिश्नर राज्य सरकार को एक रिपोर्ट सौंपेंगे और अगले वर्ष से सार्वजनिक प्रशासन निधि में योगदान की छूट वापस लेने और संबंधित अस्पताल से सार्वजनिक ट्रस्ट प्रशासन निधि में योगदान की राशि की वसूली की सिफारिश करेंगे। साथ ही चैरिटी कमिश्नर सरकार से ऐसे अस्पताल को दी गई अन्य रियायतें और लाभ वापस लेने का अनुरोध करेंगे।
गरीब एवं निर्धन मरीज के रिश्तेदार ने अस्पताल स्वास्थ्य सेवक के लिए तहसीलदार को वार्षिक उत्पादन रसीद, राशन कार्ड, आधार कार्ड आदि जमा करना होगा। यदि आरोग्य सेवक मदद करने से इंकार करता है तो मरीज को मदद के लिए अस्पताल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, प्रबंधक, ट्रस्टी से शिकायत करनी चाहिए। यदि कोई अस्पताल बिस्तरों की उपलब्धता के बावजूद किसी पात्र मरीज का इलाज करने से इनकार करता है, तो यह उच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन होगा।
निर्धन व दुर्बल वर्ग के रोगियों को जिले के धर्मार्थ अस्पतालों की सूची के अनुसार धर्मार्थ अस्पताल में इलाज कराना चाहिए और यदि अस्पताल प्रबंधन रोगी के इलाज से इनकार करता है, तो संबंधित अस्पताल की अधीक्षक एवं निरीक्षक अस्पताल के कार्यालय से संपर्क करना चाहिए। यह अपील धर्मादाय सह आयुक्त सुधीरकुमार मु. बुक्के ने की है।
सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास के तहत पंजीकृत और 5 लाख रुपये से अधिक वार्षिक व्ययवाले अस्पतालों को गरीब मरीजों को रियायती दर पर इलाज और निर्धन मरीजों को मुफ्त इलाज प्रदान करना चाहिए। यह निर्देश पुणे विभाग के धर्मादाय सहआयुक्त कार्यालय ने दिया है।
महाराष्ट्र सार्वजनिक ट्रस्टी प्रणाली अधिनियम 1950 के प्रावधानों के तहत पंजीकृत सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्टों के तहत पंजीकृत अस्पतालों को इस प्रावधान का पालन करना आवश्यक है। तदनुसार, मुंबई उच्च न्यायालय रिट याचिका (पीआईएल) नं. 3132/2004 का निर्णय न्यायालय द्वारा किया जा चुका है।
धर्मार्थ अस्पतालों को कुल बेड का 10 प्रतिशत हिस्सा निर्धन मरीजों के लिए मुफ्त इलाज के लिए और 10 प्रतिशत बेड कमजोर वर्ग के मरीजों के लिए रियायती इलाज के लिए आरक्षित करना चाहिए। आपातकालीन स्थिति में धर्मार्थ अस्पतालों को मरीज को तुरंत भर्ती करना चाहिए। जब तक रोगी स्थिर न हो जाए, उसे सभी आपातकालीन उपचार और जीवन रक्षक प्रक्रियाओं के लिए सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए। यदि आवश्यक हो, तो मरीज को आगे के इलाज के लिए सार्वजनिक अस्पताल तक ले जाने के लिए परिवहन सुविधा प्रदान की जानी चाहिए। धर्मार्थ अस्पतालों को आपातकालीन रोगी के रूप में भर्ती करते समय रोगी से कोई जमा राशि नहीं मांगनी चाहिए।
धर्मार्थ अस्पतालों ने बिस्तर, निवासी चिकित्सा अधिकारी सेवाएं, सुश्रृषा, भोजन (यदि अस्पताल द्वारा प्रदान किया जाता है), कपड़ा, पानी, बिजली, सामान्य विशेष उपचार के लिए आवश्यक नियमित निदान सेवाएं और हाऊस किपिंग आदि गरीब एवं कमजोर वर्ग के रोगियों को गैर-लाभकारी सेवाएँ निःशुल्क प्रदान की जानी चाहिए। गरीब मरीजों के मामले में, धर्मार्थ अस्पतालों को हर विभाग में चिकित्सा जांच और उपचार पूरी तरह से मुफ्त प्रदान करना चाहिए।
निर्धन मरीज़ों के भुगतान में जिन सेवाओं के लिए शुल्क लिया जाता है, ऐसी सेवाओं के लिए अस्पताल की न्यूनतम श्रेणी दर पर शुल्क लिया जाए। अस्पतालों को खरीद मूल्य में उपभोग्य सामग्रियों और प्रत्यारोपणों का आकार शामिल करना चाहिए।
औषधियाँ उपयोग में आनेवाली सामग्री (कंझ्युमेबल्स) व शरीर के अंदर प्रत्यारोपण (इम्प्लांट) अस्पतालों को इसे खरीद मूल्य में शामिल करना चाहिए।यदि डॉक्टर ने अपना वेतन माफ कर दिया है तो ऐसे वेतन को अंतिम भुगतान में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रकार किया गया भुगतान गरीब वर्ग के मरीजों के निधि खाते से खर्च किया जाना चाहिए।
कमजोर वर्ग के रोगियों के मामले में, धर्मार्थ अस्पतालों को हर विभाग में रियायती दरों पर चिकित्सा परीक्षण और उपचार प्रदान करना चाहिए। सेवाओं का शुल्क उस अस्पताल की न्यूनतम श्रेणी के रोगी दर पर लिया जाना चाहिए। अस्पतालों को खरीद मूल्य में उपभोग्य सामग्रियों और प्रत्यारोपणों का आकार शामिल करना चाहिए। हालांकि, कमजोर वर्ग के मरीजों को उपभोग्य सामग्रियों और प्रत्यारोपण के लिए कम से कम पचास प्रतिशत शुल्क का भुगतान करना होगा। साथ ही यदि डॉक्टर ने वेतन माफ कर दिया है तो उसे अंतिम भुगतान से बाहर रखा जाए और अंतिम भुगतान कमजोर वर्ग के मरीजों द्वारा भुगतान किए जाने वाले फंड खाते से किया जाए।
धर्मार्थ अस्पतालों को गरीब या कमजोर वर्ग के मरीजों को भर्ती करना होता है जो अन्य स्रोतों से या सरकारी अस्पतालों, नगरपालिका अस्पतालों आदि के माध्यम से उनके पास आते हैं। धर्मार्थ अस्पतालों को संबंधित मरीजों द्वारा अपने चिकित्सा सामाजिक कार्यकर्ता के माध्यम से प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों जैसे कि तहसीलदार के प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, गरीबी रेखा से नीचे के कार्ड जैसे दस्तावेजों के आधार पर मरीजों की वित्तीय स्थिति की सावधानीपूर्वक जांच और सत्यापन किया जाना चाहिए।
धर्मादाय सहआयुक्त या उनके प्रतिनिधि की अध्यक्षता में एक जिला स्तरीय निगरानी समिति योजना के कार्यान्वयन की निगरानी और रोगी की शिकायतों, यदि कोई हो, पर विचार करेगी और धर्मादाय आयुक्त को पेश करेंगे।
यदि अस्पतालों ने धर्मार्थ योजना का उल्लंघन करते पाया गया तो महाराष्ट्र सार्वजनिक ट्रस्टी अधिनियम, 1950 की धारा 66 के तहत जुर्माना लगाया जाएगा। इसके अलावा चैरिटी कमिश्नर राज्य सरकार को एक रिपोर्ट सौंपेंगे और अगले वर्ष से सार्वजनिक प्रशासन निधि में योगदान की छूट वापस लेने और संबंधित अस्पताल से सार्वजनिक ट्रस्ट प्रशासन निधि में योगदान की राशि की वसूली की सिफारिश करेंगे। साथ ही चैरिटी कमिश्नर सरकार से ऐसे अस्पताल को दी गई अन्य रियायतें और लाभ वापस लेने का अनुरोध करेंगे।
गरीब एवं निर्धन मरीज के रिश्तेदार ने अस्पताल स्वास्थ्य सेवक के लिए तहसीलदार को वार्षिक उत्पादन रसीद, राशन कार्ड, आधार कार्ड आदि जमा करना होगा। यदि आरोग्य सेवक मदद करने से इंकार करता है तो मरीज को मदद के लिए अस्पताल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, प्रबंधक, ट्रस्टी से शिकायत करनी चाहिए। यदि कोई अस्पताल बिस्तरों की उपलब्धता के बावजूद किसी पात्र मरीज का इलाज करने से इनकार करता है, तो यह उच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन होगा।
निर्धन व दुर्बल वर्ग के रोगियों को जिले के धर्मार्थ अस्पतालों की सूची के अनुसार धर्मार्थ अस्पताल में इलाज कराना चाहिए और यदि अस्पताल प्रबंधन रोगी के इलाज से इनकार करता है, तो संबंधित अस्पताल की अधीक्षक एवं निरीक्षक अस्पताल के कार्यालय से संपर्क करना चाहिए। यह अपील धर्मादाय सह आयुक्त सुधीरकुमार मु. बुक्के ने की है।

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