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एक चोर का कनफेशन


 मजदूर हूं मैं, इक छटपटाती, तिलमिलाती तलवार हूं मैं... बनाम एक चोर का कनफेशन 
पिछले दिनों महाराष्ट्र के रायगढ़ से एक अनोखा मामला सामने आया था। यहां एक चोर ने पहले मशहूर कवि स्व. नारायण सुर्वे के घर पर चोरी की, लेकिन अपने कृत्य का उसे इतना पछतावा हुआ कि उसने सारा सामान वापस रख दिया। यहीं नहीं, उसने माफी भी मांगी। वाकया महाराष्ट्र के रायगढ़ का है। पुलिस ने एलईडी टीवी से चोर के फिंगरप्रिंट लिए, जिसे वह चुरा ले गया था, लेकिन बाद में घर में वापस रख गया था। 
रायगढ़ के नेरल इलाके में फिलहाल उनके घर में उनकी बेटी सुजाता और दामाद गणेश घड़े रहते हैं। वे करीब 10 दिन के लिए अपने बेटे से मिलने के लिए विरार गए थे। इसी दौरान चोर ने उनके घर से एक एलईडी टीवी और अन्य सामान को चुराया।
चोर को जब सुर्वे जी की फ़ोटो पर चढ़ी चंदन की माला से पता चला कि उसने चोरी मशहूर मराठी कवि नारायण सुर्वे के घर की है, तो उसे इतना पछतावा हुआ कि वह सारा सामान वापस घर में रख गया। यही नहीं एक नोट छोड़ा जिसमें अपने किए कृत्य के लिए माफी मांगी। कूड़े-कचरे के ढेर से उठाकर पाले गए सुर्वे की कविताओं में शहरी मजदूर वर्ग के संघर्षों को दर्शाया गया है। खुद गरीबी में पले-पढ़े सुर्वे ने श्रमिकों और कामगारों के संघर्ष में छिपे गौरव को अपनी कविताओं के जरिये आमजन तक पहुंचाया।
उस्मान अली, मेरे शब्द, लेनिन, एक नए घमासान में, दबाव नहीं डालें आप, माफ कीजिए, रायटर्स पार्क, पोस्टर जैसी चर्चित मराठी कविताओं के लिए पहचाने जाने वाले सुर्वे ने प्रसिद्ध मराठी कवि बनने से पहले की जिंदगी एक अनाथ बच्चे के रूप में मुंबई की गलियों में गुजारी। उन्होंने घरेलू सहायक, होटल में बर्तन मांजने, बच्चों की देखभाल, पालतू कुत्ते की देखभाल, दूध वाले, कुली और एक मजदूर के तौर पर काम किया।

प्रस्तुत है उनकी एक प्रसिद्ध कविता का हिंदी अनुवाद...
रोजी का रोटी का सवाल तो रोज का ही है,
कभी फाटक के अंदर तो कभी फाटक के बाहर का है।
मजदूर हूं मैं, इक छटपटाती, तिलमिलाती तलवार हूं मैं, 
धर्म के ठेकेदारों! कुछ गलत करने वाला हूं मैं।
कुछ शेष,  देखा भाला, जोखिम वाला है,
मेरी दुनिया की एक गंध का रखवाला है, 
कभी चुक गया, मुकर गया, कुछ नया भी सीख गया,
जैसा मैं इस दुनिया में हूं, वैसा ही अपने शब्दों में भी हूं।
रोटी प्यारी, खरी,  और क्या चाहिए?
इसलिये मेरी दुनिया राजमुद्रा गढ़ रही है। 
यहीं से मैं रख रहा हू फूलों को, 
शब्दों की हथेलियों पर,  
यहीं से मैं रख रहा हूं तलवारें, शब्दों की हथेलियों पर। 
अकेला ही नहीं आया मैं, 
युग भी मेरे साथ है, मजदूर हूं मैं,  
धर्म के ठेकेदारों! कुछ गलत करने वाला हूँ मैं।

मराठी कविता
मूल कविता- नारायण सुर्वे 
हिन्दी अनुवाद- डॉ. विपिन पवार

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