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एआई से नहीं, शिक्षकों से पूछें सवाल: प्रो. हिमकुमार चटर्जी

एआई से नहीं, शिक्षकों से पूछें सवाल : प्रो. हिमकुमार चटर्जी

डॉ. सुधाकर चव्हाण को ‘विश्वारंभ कला पुरस्कार’ से किया गया सम्मानित

लोणी-कालभोर, सितंबर | हड़पसर एक्सप्रेस न्यूज़ नेटवर्क

किसी भी संस्था या विश्वविद्यालय की पहचान उसकी इमारतों से नहीं, बल्कि वहां के शिक्षकों और उनके द्वारा तैयार किए गए विद्यार्थियों से होती है। किसी विषय को बेहतर तरीके से समझाने और उसे अनुभव के स्तर तक पहुंचाने का कौशल एक शिक्षक में ही होता है। इसलिए विद्यार्थियों को एआई से नहीं, बल्कि अपने शिक्षकों से सवाल पूछने चाहिए। यह विचार प्रसिद्ध भित्तिचित्रकार और मुंबई स्थित प्रतिष्ठित सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट, आर्किटेक्चर एंड डिजाइन अभिमत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हिमकुमार चटर्जी ने व्यक्त किए।

वे पुणे के लोणी-कालभोर स्थित एमआईटी आर्ट, डिजाइन एंड टेक्नोलॉजी विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित ‘विश्वारंभ कला पुरस्कार’ समारोह में बोल रहे थे।

इस अवसर पर वरिष्ठ शिक्षाविद् एवं प्रसिद्ध दृश्य कलाकार डॉ. सुधाकर चव्हाण को दृश्य कला के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘विश्वारंभ कला पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। डॉ. सुधाकर चव्हाण की अनुपस्थिति में उनके पुत्र अमित चव्हाण ने उनकी ओर से पुरस्कार ग्रहण किया।

कार्यक्रम में एमआईटी एडीटी विश्वविद्यालय की कार्यकारी निदेशक ज्योति कराड-ढाकणे, प्रो-वाइस चांसलर डॉ. नचिकेत ठाकुर, एमआईटी स्कूल ऑफ फाइन आर्ट्स के डीन डॉ. गणेश तरतरे सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

कला समाज और मानवीय मूल्यों से जोड़ती है

प्रो. हिमकुमार चटर्जी ने कहा कि एक कलाकृति अपने कलाकार से भी अधिक लंबा जीवन जीती है। इसलिए कलाकारों को केवल व्यावसायिक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय समाज और कला के क्षेत्र में अपने योगदान को प्राथमिकता देनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि कला जीवनभर मनुष्य का साथ देती है। कला के प्रति संवेदनशील व्यक्ति ही मानवीय मूल्यों को बेहतर तरीके से समझ सकता है। विद्यार्थियों के लिए शिक्षक केवल जानकारी देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि अनुभव और ज्ञान का मार्गदर्शक होता है।

‘एक्यू’ पत्रिका का विमोचन, ‘कलाकोश’ लोगो का अनावरण

कार्यक्रम के दौरान अतिथियों के हाथों ‘एक्यू’ पत्रिका का विमोचन किया गया। साथ ही ‘कलाकोश’ के लोगो का अनावरण भी किया गया।

इस अवसर पर एमआईटी स्कूल ऑफ फाइन आर्ट्स के विद्यार्थियों द्वारा तैयार की गई चित्रों की प्रदर्शनी भी आयोजित की गई, जिसमें विद्यार्थियों की कलात्मक प्रतिभा और रचनात्मकता देखने को मिली।

कार्यक्रम की शुरुआत विश्वशांति प्रार्थना से हुई और समापन राष्ट्रगान के साथ किया गया। प्रो. शिरिन चिमथानवाल और प्रो. टेरेसा जोशी ने कार्यक्रम की प्रस्तावना रखी, जबकि प्रो. विराज कांबले ने आभार व्यक्त किया।

‘विश्वारंभ’ नाम में ही नई और रचनात्मक सोच : ज्योति ढाकणे-कराड

ज्योति ढाकणे-कराड, कार्यकारी निदेशक, एमआईटी एडीटी विश्वविद्यालय, पुणे ने कहा कि ‘विश्वारंभ’ नाम में ही कुछ नया और रचनात्मक करने की संकल्पना निहित है। इस नाम के पीछे मार्गदर्शक प्रो. डॉ. विश्वनाथ दा. कराड की प्रेरणा है।

उन्होंने कहा कि प्रो. डॉ. विश्वनाथ दा. कराड स्वयं भी एक सुंदर कलाकार हैं। विश्व का सबसे बड़ा विश्वशांति गुंबद और विश्वराजबाग उनकी दृष्टि से साकार हुई अद्भुत कलाकृतियां हैं। ऐसे में डॉ. सुधाकर चव्हाण को ‘विश्वारंभ कला पुरस्कार’ प्रदान करते हुए उन्हें अत्यंत आनंद हो रहा है।

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