भगवान श्रीकृष्णजी के परमभक्त ठाकुर विल्वमंगल का जन्म आठवीं शताब्दी में केरल में दक्षिणात्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। विल्वमंगल लीला शुक नाम से प्रसिद्ध हुए। ये संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। बचपन से ही उनका मन भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को सुनने में लगता था। ग्रंथों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि जब उन्होंने भगवान श्रीकृष्णजी के दर्शन हेतु केरल से वृन्दावनधाम के लिए प्रस्थान किया तो मार्ग में भिक्षा करते हुए हुए अपनी मंजिल पर बढ़ते-बढ़ते एक दिन भिक्षा मांगते समय एक वणिक युवती पर आसक्त हो गये और काम वासना के वशीभूत होकर पागलों की तरह व्यवहार करने लगे और काम वासना के अलावा उन्हें कुछ भी नहीं सूझ रहा था। इस घटना के तत्काल बाद प्रभु कृपा से उनका विवेक जागृत हुआ और उन्हें अपनी इस हरकत पर इतनी ग्लानि हुई कि उसी युवती से उन्होंने सुई मांगी और अपनी दोनों आंखें फोड़ डालीं। भक्तमाल के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें पुनः आंखें प्रदान कीं और युगल रूप में दर्शन दिए। वे इन्हें गोपवेश में नित्य भोजन कराते।
ठाकुर विल्वमंगल ने अनेकों रचनाएं की हैं जिनमें ‘कृष्ण कृष्णामृत’, ‘कृष्ण बालचरित’, ‘कृष्णाह्निक’, ‘गोविन्द स्तोत्र’, ‘बालकृष्ण क्रीड़ा काव्य’, ‘विल्वमंगल स्तोत्र’, ‘गोविन्द दामोदर स्तवन’ आदि संस्कृत स्तोत्र एवं काव्य ग्रंथों के प्रेणता हैं
ठाकुर विल्वमंगल ने अनेकों रचनाएं की हैं जिनमें ‘कृष्ण कृष्णामृत’, ‘कृष्ण बालचरित’, ‘कृष्णाह्निक’, ‘गोविन्द स्तोत्र’, ‘बालकृष्ण क्रीड़ा काव्य’, ‘विल्वमंगल स्तोत्र’, ‘गोविन्द दामोदर स्तवन’ आदि संस्कृत स्तोत्र एवं काव्य ग्रंथों के प्रेणता हैं
-डॉक्टर सोमदत्त शर्मा
उपनिदेशक राजभाषा, रेलवे बोर्ड (सेवानिवृत्त)

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