विनय यानी स्वभाव की नम्रता, विनम्रता, यानी कि नम्रता वाला व्यक्ति सभी को प्रिय होता है। विनम्र स्वभाव का होना स्नेह और प्रेम का एक बड़ा संकेत माना जाता है।
हम अक्सर कहते हैं विद्या विनय शोभते। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि ज्ञान के धनी व्यक्ति में नम्रता हो तो वह व्यक्ति चाहे पुरुष हो या स्त्री सभी आदर्श माने जाते हैं वे प्रिय हो जाते हैं।
इस सन्दर्भ में जिन बहुआयामी विद्वानों से मैं मिला, उनकी नम्रता किसी ऋषि-मुनि की तरह लग रही थी, इसलिए मैं उनके करीब जाना चाहता था और उनके प्रति अपना स्नेह बढ़ाना चाहता था। वास्तव में उनके व्यक्तित्व का मेरे मन पर प्रभाव पड़ा। इसमें संत साहित्य के अभ्यासक डॉ. रामचंद्र देखणे, अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष तथा संत साहित्य के अभ्यासक डॉ. सदानंद मोरे, डॉ. यु.म. पठाण, पुणे विद्यापीठ के पूर्व कुलगुरू डॉ. शं.ना. नवलगुंदकर ऐसे ऋषितुल्य व्यक्तियों का संग मुझे मिला है। उनके गहन ज्ञान के बावजूद, उनके स्वभाव में कहीं भी घमंड नहीं था। इसके विपरीत वे हमें नम्रता, स्नेह और विनम्रता की प्रकृति के बारे में बहुत कुछ सिखाते हैं। उन्हें विभिन्न आयोजनों में आमंत्रित करते हुए उन्होंने समय-समय पर बड़ी आस्था के साथ मार्गदर्शन किया है। हमें उनके उदाहरण पर चलना होगा। नम्रता अगर हमारे पास है, तो यह निश्चित रूप से हमारे जीवन में बहुत काम आएगी। इतना ही नहीं नम्रता की मदद से आप अपने मतभेदों को कम करने और अपने स्नेह को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।
हममें नम्रता की प्रवृत्ति होना यह अपनेपन व प्रेम निर्माण करने का बहुत बड़ा प्रतीक माना जाता है या वास्तव में यह है। नम्रता का अर्थ हमारा रवैया, दूसरे के लिए स्नेह, सद्भावना नम्रता इससे एक दूसरे के साथ हमारे संबंध मजबूत होते हैं। स्नेह बढ़ता है और एक दूसरे के लिए प्यार पैदा होता है। यह उन लोगों के बीच एक सौहार्दपूर्ण संबंध भी बनाता है जो आपको गलत समझते हैं।
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