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देश के उस जज्बे को सलाम

श्रीमती नीलम सक्सेना चंद्रा
अपर मंडल रेल प्रबंधक
पुणे रेल मंडल (मध्य रेल)

‘देश के उस जज्बे को सलाम’, ये पंक्तियाँ हैं अद्भुत प्रतिभा की धनी नीलम सक्सेना चंद्रा की। प्रशासनिक, तकनीकी प्रतिभा संपन्न नीलम सक्सेना चंद्रा हिंदी और अंग्रेजी में कविता, कहानी, उपन्यास लिखती हैं और उक्त दोनों भाषाओं में बाल साहित्य की रचना भी करती हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर लगभग 200 कवियों/कथाकारों को एक सशक्त साहित्यिक मंच प्रदान किया है।
मध्य रेल के पुणे मंडल पर अपर मंडल रेल प्रबंधक के पद पर कार्यरत नीलम सक्सेना चंद्रा ने इंजीनियरिंग और मानव विकास एवं वित्तीय प्रबंधन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा करने के बाद  संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण की और 1992  बैच की आई. ई. एस. अधिकारी बनीं। लेखन बचपन से करती थीं परंतु प्रकाशन इसके बाद शुरू हुआ। 
एक प्रश्न के उत्तर में वे बताती हैं कि उन्होंने अपनी बेटी के लिए कहानी लिखना शुरू किया और उनके एक काव्य रचना पर गुलज़ार साहब के हाथों मिलने वाले पुरस्कार ने उन्हें स्थाई कवि व  बना कथाकार  दिया।  और, उन्होंने अपनी बेटी के साथ कविता संग्रह लिख कर इतिहास रच दिया और उसके लिए माँ बेटी द्वारा एक साथ पहली बार कविता संग्रह लिखने हेतु उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में प्रविष्ट हो गया। बेटी के लिए लिखना शुरू किया था तो बाल साहित्य की रचना तो होनी ही थी। उनके कविता संग्रह, कहानी संग्रह व बाल साहित्य की 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनके लिए महाराष्ट्र राज्य साहित्य समिति द्वारा सोहनलाल द्विवेदी पुरस्कार, प्रेमचंद पुरस्कार के साथ-साथ प्रतिष्ठित पुरस्कार रवींद्र नाथ टैगोर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी उन्हें मिल चुका है।
बेटी के लिए वे लिखती हैं- बेटी से बढ़कर नहीं कोई गहना, दिल में छुपा लो मेरा यह कहना। और माँ के प्रति भी वे उतनी ही समर्पित हैं, जो कुछ भी है आज मेरी हस्ती, यह सब तेरी अमानत है माँ, ...मन कर रहा आज जरा, कुछ पल के लिए तेरी गोद में, सो जाऊँ। जब तक कवि प्रकृति से प्रेम नहीं दर्शाता तब तक वह सच्चा कवि नहीं होता। नीलम जी वो भूले हुए मंजर कविता में लिखती हैं...
इस दरख्त को देखा तो लिपट गई उससे, 
जैसे सदियों से मिले दो मुहब्बत करने वाले। 
इसी प्रकार बसंत के लिए लिखती हैं,  बसंत का महीना तो जाता ही है बीत, 
कब हुआ है वो कभी किसी का मीत, 
क्यों नहीं बसाते अपने ज़हन में ही बसंत, 
फिर सालों गाते रहते खुशी के गीत।

नीलम जी प्रेम की कवयित्री हैं और उनके जीवन में नफरत को कोई स्थान प्राप्त नहीं है। चाँद को देखकर वे कह उठती हैं... 
किसने कहा कि चाँद तनहा होता है, 
उस रात जब मैंने चाँद को देखा,
 
तो देखती रह गई।
समाज को सुदृढ़ और सुसंगठित बनाए रखना हर कवि का ध्येय होता है और नीलम जी भी इसमें पीछे नहीं हैं, लिखती हैं... 
यूँ भी धर्म, जात, लिंग, वर्ण पर लड़ रहा आदमी, 
जाने कहाँ गुमसुम सा पड़ा है ऐंठकर वो प्यार।
    देशप्रेम नीलम जी की कविताओं में पूरी तरह अनुस्यूत है,  देश के उस जज्बे को सलाम, देश की उस मिट्टी को सलाम, यादें हैं हुईं छुपी कई कुर्बानियों की, दिलाती हैं याद जो देश प्रेम का पैगाम।
नीलम जी की प्रसिद्ध पुस्तकों में कई बसंत देखे हैं मैंने, रंग भर तोहफ़ा, मेरे महक रहे अल्फाज, बुलबुले ख्यालों के दिल से,  प्रीत पाखी, आशा के पंख,  कविता संग्रह; गीत गाता चल, रिश्ते मुहब्बत के, मैं हवा हो गई हूँ कहानी संग्रह; पंखुड़ियाँ, सुंदरवन की कहानियाँ, चंदा, पाँच कहानियाँ, ताविशी के तारे, तितलियों के लोक में, बाल साहित्य और उपन्यास रज्जो, रानी और सूरजमुखी मेरी स्मृतियों में हैं।
-श्री सत्येंद्र सिंह

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