मेरे चाचा पांडुरंग गायकवाड़ को सावित्रीमाई का छात्र होने का भाग्य प्राप्त हुआ। उनके द्वारा मिली सीख व संस्कार गायकवाड़ परिवार के लिए आज भी अध्यापन और पुष्प संस्कार का हमारे जीवन में बहुत महत्व है, इसलिए हम कोरोना काल में सभी की मदद कर पाए।
मैंने वास्तव में अपने चाचा को नहीं देखा, मेरे पिता ने भी उन्हें नहीं देखा, लेकिन चाचा के गुजरने और बहुत मन्नतें करने के बाद मेरे पिता केरू का जन्म मेरे दादा-दादी के घर हुआ था। चाचा पांडुरंग को जब प्लेग से अनुबंधित किया, तो खबर सावित्रीमाई तक पहुंच गई। उन्होंने तुरंत स्कूल के पास गायकवाड़ परिवार के पांडुरंग से मुलाकात की और उनसे पूछताछ की। मुंढवा के आनंद नगर में हमारा गायकवाड़ का एक बड़ा घर हुआ करता था। महात्मा फुले ने घर के बगल में ही स्कूल शुरू किया था। हम गायकवाड़ के महान भाग्य हैं कि मेरे चाचा पाडुरंग उसी स्कूल में पढ़ने के लिए थे और सावित्रीमाई खुद उन्हें सिखाती थीं। चाचा स्कूल में उनके पसंदीदा छात्र थे क्योंकि वह स्कूल में होशियार थे। जब प्लेग शुरू हुआ, तो सावित्रीमाई ने अपने दत्तक पुत्र डॉ. यशवंत को बुलाकर लिया। दवाखाना में बुखार से पीड़ित पांडुरंग को अपनी पीठ पर लेकर हड़पसर ससाणेनगर में शुरू करीब पांच-छह किलोमीटर दूरी पर डॉ. यशवंत के दवाखाना में लेकर गईं परंतु इतने समय तक प्लेग के मरीज के संपर्क में रहने के बाद आखिरकार वही हुआ जिसकी आशंका थी। सावित्रीबाई को छात्रों ने प्लेग से संक्रमित किया। पांच से सात किलोमीटर का पैदल सफर तय किया और उसमें उन्हें प्लेग का संक्रमण हुआ और उसमे उनका अंत हुआ। सावित्रीबाई और पांडुरंग की मृत्यु से मेरे दादा (बाबाजी गायकवाड) बहुत व्यथित हुए। कुछ साल बाद, मेरे पिता केरू गायकवाड़ का जन्म हुआ। उन्हें भी दादाजी ने उसी स्कूल में भर्ती कराया था। उस समय सावित्रीमाई वहां पढ़ाने के लिए नहीं थीं, परंतु पिताजी को यादों ने तरोताजा कर दिया। उनमें मदद करने की भावना पैदा हुई। वही संस्कार बाद में गायकवाड़ परिवार में निहित हुए। कोरोना की महामारी में प्लेग की याद आई।
सावित्रीमाई के जो विद्यार्थी थे, वे मेरे चाचा पांडुरंग व मेरे दादाजी बाबाजी आज मुझे व मेरे भाई कालिदास गायकवाड, रोहिदास गायकवाड को उनके वंशज होने पर बहुत गर्व है। जिस घर में स्कूल था, वह आज भी वैसा ही है। हम गायकवाड़ परिवार के लिए वह एक अनमोल ज्ञान का खजाना है।
मैंने वास्तव में अपने चाचा को नहीं देखा, मेरे पिता ने भी उन्हें नहीं देखा, लेकिन चाचा के गुजरने और बहुत मन्नतें करने के बाद मेरे पिता केरू का जन्म मेरे दादा-दादी के घर हुआ था। चाचा पांडुरंग को जब प्लेग से अनुबंधित किया, तो खबर सावित्रीमाई तक पहुंच गई। उन्होंने तुरंत स्कूल के पास गायकवाड़ परिवार के पांडुरंग से मुलाकात की और उनसे पूछताछ की। मुंढवा के आनंद नगर में हमारा गायकवाड़ का एक बड़ा घर हुआ करता था। महात्मा फुले ने घर के बगल में ही स्कूल शुरू किया था। हम गायकवाड़ के महान भाग्य हैं कि मेरे चाचा पाडुरंग उसी स्कूल में पढ़ने के लिए थे और सावित्रीमाई खुद उन्हें सिखाती थीं। चाचा स्कूल में उनके पसंदीदा छात्र थे क्योंकि वह स्कूल में होशियार थे। जब प्लेग शुरू हुआ, तो सावित्रीमाई ने अपने दत्तक पुत्र डॉ. यशवंत को बुलाकर लिया। दवाखाना में बुखार से पीड़ित पांडुरंग को अपनी पीठ पर लेकर हड़पसर ससाणेनगर में शुरू करीब पांच-छह किलोमीटर दूरी पर डॉ. यशवंत के दवाखाना में लेकर गईं परंतु इतने समय तक प्लेग के मरीज के संपर्क में रहने के बाद आखिरकार वही हुआ जिसकी आशंका थी। सावित्रीबाई को छात्रों ने प्लेग से संक्रमित किया। पांच से सात किलोमीटर का पैदल सफर तय किया और उसमें उन्हें प्लेग का संक्रमण हुआ और उसमे उनका अंत हुआ। सावित्रीबाई और पांडुरंग की मृत्यु से मेरे दादा (बाबाजी गायकवाड) बहुत व्यथित हुए। कुछ साल बाद, मेरे पिता केरू गायकवाड़ का जन्म हुआ। उन्हें भी दादाजी ने उसी स्कूल में भर्ती कराया था। उस समय सावित्रीमाई वहां पढ़ाने के लिए नहीं थीं, परंतु पिताजी को यादों ने तरोताजा कर दिया। उनमें मदद करने की भावना पैदा हुई। वही संस्कार बाद में गायकवाड़ परिवार में निहित हुए। कोरोना की महामारी में प्लेग की याद आई।
सावित्रीमाई के जो विद्यार्थी थे, वे मेरे चाचा पांडुरंग व मेरे दादाजी बाबाजी आज मुझे व मेरे भाई कालिदास गायकवाड, रोहिदास गायकवाड को उनके वंशज होने पर बहुत गर्व है। जिस घर में स्कूल था, वह आज भी वैसा ही है। हम गायकवाड़ परिवार के लिए वह एक अनमोल ज्ञान का खजाना है।

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