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आइए नेत्रदान का संकल्प करें, नेत्रहीन लोगों के जीवन में रोशनी लाएं

 
‘हिरवे हिरवे गार गालिचे, हरीततृणांच्या मखमलाची, त्या सुंदर मखमालीवरती फुलराणी ही खेळत होती’ बालकवि त्र्यंबक बापूजी ठोंबरे की यह कविता आपने बचपन में पढ़ा या सुना होगा ही। बारिश से नहाती हरी-भरी सृष्टि को आपने देखा होगा। आपने तूफानी बारिश को शरीर पर खेलते हुए गांव में, जंगल में, सात रंगों के इंद्रधनुष को देखा होगा। यह सब हम देख सकते हैं क्योंकि हमारे पास दृष्टि है, लेकिन उन लोगों के बारे में सोचें जिनके पास यह देखने के लिए दृष्टि नहीं है उनका क्या..? हम मरणोपरांत नेत्रदान के माध्यम से उन्हें एक नई दृष्टि देकर उनके जीवन में प्रकाश ला सकते हैं!
आँखों के आनुवंशिक नेत्र रोगों, संक्रमण, दुर्घटनाओं और उचित नेत्र देखभाल की कमी के कारण समय से पहले अंधापन हो सकता है। इस अंधेपन को लगभग 80 प्रतिशत इलाज से रोका या ठीक किया जा सकता है।
हमारे देश में 5 में से 1 नेत्रहीन व्यक्ति यानी लगभग 3 लाख लोग आईरिस रोग से पीड़ित हैं। हर साल 40 हजार से 50 हजार नए मरीज जुड़ते हैं। इनमें से ज्यादातर मरीज आईरिस ट्रांसप्लांट (नेत्र प्रत्यारोपण) सर्जरी से अपनी आंखों की रोशनी वापस पा सकते हैं।
हर साल 1 लाख आंखों की जरूरत होती है, लेकिन करीब 26 हजार आईरिज नेत्रदान होता है। नेत्रहीन भाइयों के लिए आवश्यक आंखों और नेत्र दाताओं से एकत्र की गई आंखों के बीच की खाई को भरने के लिए लगभग 74 से 75 हजार आईरिस की आवश्यकता होती है, इसलिए नेत्रदान के महत्व को जानना जरूरी है। आइए हम मरणोपरांत नेत्रदान को अपने परिवार में एक परंपरा बनाएं और हमारे रिश्तेदारों को भी हमारे संकल्प में भाग लेने दें।
अंधापन आने के कारण :
अंधापन विभिन्न प्रकार का होता है। दृष्टिदोष काचबिंदू, आईरिस रोग, मोतियाबिंद, पश्च झिल्ली रोग शामिल हैं। इनमें आईरिस रोग के कारण भारत में 2 लाख से अधिक नेत्रहीन हैं। आईरिस रोग के कारण अंधापन मुख्य रूप से कॉर्नियल अल्सर, आंखों की चोट, विटामिन ए की कमी, रासायनिक जलन, आनुवंशिक आईरिस रोग, शल्य चिकित्सा के बाद आईरिस सूजन आदि के कारण होता है। अंधेपन के इन सभी कारणों के लिए आईरिस इम्प्लांटेशन सर्जरी आशा की एक किरण है।
नेत्रदान किसे करना चाहिए ?
मरणोपरांत नेत्रदान के लिए उम्र की कोई बाध्यता नहीं है। किसी भी जाति, धर्म, वंश, पंथ का व्यक्ति नेत्रदान कर सकता है। किसी भी ब्लड ग्रुप के लोग नेत्रदान कर सकते हैं। मोतियाबिंद और काचबिंदु की सर्जरी करानेवाले मरीज भी नेत्रदान कर सकते हैं। जिन मरीजों की नेत्रदान की सर्जरी हुई है, वे भी मरणोपरांत नेत्रदान कर सकते हैं।
नेत्रदान से पहले बरती जाने वाली सावधानियां :
मरणोपरांत नेत्रदान छह घंटे के भीतर किया जाना चाहिए, जिसके लिए तुरंत नेत्र बैंक से संपर्क किया जाना चाहिए। नेत्रदाता के कमरे में पंखा बंद कर देना चाहिए। आंख में दवा (एंटीबायोटिक्स) डालें या पानी की पट्टी रखें। नजदीकी नेत्र बैंक से संपर्क करें। ससून सर्वोपचार अस्पताल के अलावा पुणे शहर में अन्य नेत्र बैंक हैं। ससून अस्पताल के नेत्र विभाग में नेत्र प्रत्यारोपण सर्जरी (केराटोप्लास्टी) नि:शुल्क की जाती है।
नेत्रदान के बारे में वस्तुनिष्ठता :
एक भ्रांति है कि नेत्रदान के बाद चेहरा विद्रुप हो सकता है। आँख के सॉकेट में नरम कपास या प्लास्टिक की आंख लगाकर पलकों को ठीक से बंद किया जा सकता है। यह भ्रांति है कि शरीर के किसी अंग को हटाना पाप है, लेकिन दूसरी ओर नेत्रदान करने से दो लोगों के पूरे जीवन का निर्माण करने का बहुत बड़ा पुण्य का महान कार्य होता हैख इसलिए ‘मरावे परी नेत्ररूपी उरावे’ कहा जाता है।
यह एक गलत धारणा है कि आंख की सर्जरी में बकरी की आंख को प्रत्यारोपित किया जा सकता है। बकरी की आंख की संरचना और मानव आंख की संरचना में मूलभूत अंतर होता है। सर्जरी के दौरान कॉर्निया को सिर्फ बदला जाता है। तब वह आंख बिठाई नहीं जाती। नेत्रदान के लिए नेत्रदान सहमति प्रपत्र नेत्र विभाग में नि:शुल्क उपलब्ध है। अधिक जानकारी के लिए नेत्रशल्य चिकित्सा शास्त्र विभाग से संपर्क करें।
शरीर की अंधता नहीं मन की अंधता बड़ा मर्ज है...
उजाला लाने के लिए नेत्रदान हम सब का फर्ज है...
चिता में जायेगी राख बन जायेगी,
कब्र में जायेगी मिट्टी बन जायेगी,
नेत्रों का कर दो दान,
किसी की जिंदगी गुलजार बन जायेगी..!
सार्वजनिक शिक्षा के माध्यम से हम नागरिकों को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि आईरिस रोग या इसके परिणामस्वरूप होनेवाले अंधेपन को आईरिस रोग के बारे में लोगों को सूचित करके नेत्र प्रत्यारोपण द्वारा ठीक किया जा सकता है, इसलिए हम जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों का सहयोग ले रहे हैं। नेत्रहीनों को दृष्टि के माध्यम से प्रकाशमान जीवन प्राप्त करवाकर देने के लिए न केवल नेत्रदान की प्रतिज्ञा करना आवश्यक है बल्कि मृत्यु पश्चात नेत्रदान करना भी आवश्यक है और रिश्तेदारों को भी इसे अमल में लाने की आवश्यकता है।
-डॉ. सतीश शितोले 
(नेत्र रोग विशेषज्ञ, ससून सर्वोपचार रुग्णालय)
संकलन: जिला सूचना कार्यालय, पुणे

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