मुख्य समाचार

6/recent/ticker-posts

महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी और हिंदी आंदोलन परिवार द्वारा आयोजित ‘कविता की अनुभूति एवं अभिव्यक्ति’ विषय पर चर्चासत्र संपन्न

हिंदी आंदोलन परिवार द्वारा आयोजित ‘कविता की अनुभूति एवं अभिव्यक्ति’ विषय पर चर्चासत्र श्रीमती सुधा भारद्वाज, श्री संजय भारद्वाज, डॉ. शहाबुद्दीन शेख, डॉ. अश्विनी कुमार और श्री दिनेश चंद्रा। अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. शहाबुद्दीन शेख, डॉ. अश्विनी कुमार और श्री संजय भारद्वाज उक्त चित्र में दिखाई दे रहे हैं।

पुणे, अक्टूबर (हड़पसर एक्सप्रेस न्यूज नेटवर्क)

महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई, हिंदी आंदोलन परिवार एवं क्षितिज के संयुक्त तत्वावधान में आजादी का अमृत महोत्सव, हिंदी पखवाड़ा और हिंदी आंदोलन के 28 वर्ष पूर्ण होने पर ‘कविता की अनुभूति एवं अभिव्यक्ति’ विषय पर चर्चासत्र का आयोजन गत् शनिवार, 1 अक्टूबर 2022 को पत्रकार भवन, नवी पेठ, पुणे में आयोजित किया गया।
चर्चासत्र की अध्यक्षता डॉ. शहाबुद्दीन शेख (अध्यक्ष, विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उ.प्र.) ने की। मुख्य अतिथि डॉ. मिलिंद बनकर (हिंदी विभागाध्यक्ष, गरवारे महाविद्यालय, पुणे), विशिष्ट अतिथि- डॉ. अश्विनी कुमार (गायक, संगीतकार, लेखक, पूर्व कार्यक्रम अधिकारी, दूरदर्शन, मुंबई) और श्री दिनेश चंद्रा (संपादक, हिंदी साप्ताहिक ‘हड़पसर एक्सप्रेस’, पुणे) थे। इस अवसर पर अध्यक्ष और विशिष्ट अतिथियों को शाल, श्रीफल और तुलसी पौधा देकर सत्कार किया गया।
कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. शहाबुद्दीन शेख ने ‘कविता की अनुभूति एवं अभिव्यक्ति’ विषय अपने विचार करते हुए कहा कि मैंने कभी भी कविता नहीं लिखी, पढ़ना बहुत पसंद है। हां इतना जरूर है कि कविता लिखने वाले बहुत मेहनत करते हैं, वे हृदय से कविता लिखते हैं, जो सुनने वालों के हृदय में उतर जाती है। उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि आज देवनागरी का  प्रभाव कम होता जा रहा है, जिसे जिंदा रखना हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है। हिंदी विश्व में अपना परचम फहरा रही है, परंतु अपने भारत देश में अंग्रेजी को अधिक महत्व दिया जा रहा है, जो भारत की संस्कृति के लिए बहुत दुखद है। भारत में सर्वाधिक हिंदी बोली जाती है, उसके बावजूद हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ है। संविधान में हिंदी को राज भाषा के रूप में मान्यता है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ. अश्विनी कुमार ने ‘कविता की अनुभूति एवं अभिव्यक्ति’ विषय अपने विचार करते हुए कहा कि साहित्य की सर्वाधिक प्रभावशाली विधा के रूप में कविता लगभग सभी भाषा के साहित्य के केंद्र में रही है। साहित्य की अन्य विधाओं की तरह ही काव्य का सृजन भी मानवीय संवेदनाओं एवं अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए ही होता है। रुचियों में भिन्नता के कारण कवियों की काव्य-संवेदना भी एक-दूसरे से अलग होती है। काव्य-रचना के लिए एक जिज्ञासू और संवेदनशील मन होने के साथ ही कल्पनाशीलता और अंतर्दृष्टि संपन्न होना भी आवश्यक है। कहावत है- ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि।’
उन्होंने आगे कहा कि हमारे आसपास, समाज, प्रांत, राष्ट्र, विश्व, ब्रह्मांड और इस संपूर्ण सृष्टि में हर पल परिवर्तन होता रहता है। कुछ न कुछ घटित होता रहता है। इनमें से किसी घटना से जब हमारी भावना जुड़ती है और उस घटना के तथ्यों के साथ हमें चिंतन के धरातल पर ले जाती है, हमारे अंतर्मन के तारों को संकृत करती है तब हमारी अनुभूतियां अभिव्यक्त होने के लिए माध्यम तलाशती हैं, (ठीक उसी प्रकार जैसे किसी वाद्य यंत्र के तारों को किसी विशिष्ट पद्धति से छेड़ा जाए तो उससे जो ध्वनि उत्पन्न होती है, वो किसी विशिष्ट भाव को अभिव्यक्त करती है।) ऐसे में कविता के शिल्प, कला और कौशल के अभ्यासी इन अनुभूतियों को कविता के रूप में अभिव्यक्त करते हैं। कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जो बात हम कई पृष्ठों में व्यक्त नहीं कर पाते, उन्हें चंद पक्तियों में कह जाते हैं, इसलिए काव्य को सर्वाधिक प्रभावशाली विधा के रूप में देखा जाता है।
गागर में सागर भरना
यही कारण है कि सभ्यता के प्रारंभ में ही छंद कविताओं का विभिन्न अवसरों पर पाठ किया जाता रहा है। प्रकारांतर से गीत/ भजन/ गज़ल आदि रूपों में गाया-बजाया जाता रहा है और इसे अभूतपूर्व लोकप्रियता भी मिली है।
उन्होंने आगे कहा कि कविता जितनी सहज और सरल भाषा में लिखी जाएगी, उतनी ही ज्यादा उसकी पहुंच होगी और प्रभावशाली होगी। हर कालखंड में कुछ ऐसे ही कवि हुए हैं, जिनकी रचनाओं ने सामान्य जन मानस को भी प्रभावित किया है। जैसे- संत कबीर भक्तिकाल में, आधुनिक कविता में जयशंकर प्रसाद इत्यादि। हां, यह जरूर है कि काव्य कौशल की बंदिशों से बाहर आकर आधुनिक समय में कविताएं ज्यादातर मुक्तछंद में होने लगी हैं पर ऐसा माना जाता है कि मुक्तछंद में भी उन्हीं कवियों की रचनाएं लोकप्रिय हुई हैं, जिन्हें छंदबंद्ध रचनाओं पर प्रभुत्व प्राप्त था। उनकी   रचनाओं में छंदमुक्त होने के बाद भी एक लयात्मकता होती है, इसी कारण जनमानस के हृदय की लयात्मकता के साथ उनका सीधे जुड़ाव हो जाता है, इसलिए संवेदनशील दृष्टि और अनुभूति संपन्नता के साथ ही काव्य के छंद विधान से परिचित होना कविता की अनुभूति और अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक है।
इस अवसर पर हिंदी आंदोलन परिवार के अध्यक्ष श्री संजय भारद्वाज ने भी अपने विचार व्यक्ति किए। साथ ही हिंदी आंदोलन परिवार की श्रीमती सुधा भारद्वाज ने हिंदी आंदोलन के अबतक के सफर पर प्रकाश डाला और इस आंदोलन को आगे ले जाने का संकल्प लिया।
समारोह का संयोजन श्री सचिन निंबालकर, सह-निदेशक एवं सचिव महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी और हिंदी आंदोलन परिवार के अध्यक्ष श्री संजय भारद्वाज द्वारा किया गया।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ