डॉ. केशव प्रथमवीर
(पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, पुणे विश्वविद्यालय)
आज भी किसानों की दुर्दशा और आत्महत्या के समाचार जानकर बहुत दुख होता है। इस संबंध में नेताओं, विद्वानों, लेखकों सभी ने समय-समय पर अपने विचार व्यक्त किए हैं और कर रहे हैं, पर कोई हल नहीं निकल रहा। मुझे डॉ. केशव प्रथमवीर (पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, पुणे विश्वविद्यालय) द्वारा समग्र दृष्टि दिसंबर 2006 में लिखा गया संपादकीय याद आ रहा है, जो उनकी पुस्तक- हे विधना परि भारत में न किसान बनइयो- में संग्रहीत है, याद आ रहा है, जिसमें उन्होंने बड़े अच्छे शब्दों में किसानों की समस्या का वर्णन किया है। उस लेख के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं।
आज़ादी की लड़ाई के इतिहास से पता चलता है कि उस कालखंड में भी किसानों की दयनीय दशा को लेकर आंदोलन चलाए गए थे। उन्हें यह समझाकर संगठित किया गया था कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद किसानों को ही सर्वाधिक लाभ पहुँचेगा। महात्मा गांधी स्वयं मूलतः ग्रामीणों-किसानों-मजदूरों के ही नेता थे। उस कालखंड के नेताओं ने किसानों को आश्वस्त किया था कि आज़ादी के बाद किसानों को जमींदारों, महाजनों के खूनी पंजों से छुड़ा लिया जाएगा। उन्हें अपनी जमीन का मालिक बना दिया जाएगा। ...प्रशासन के भ्रष्टाचारी तंत्र को निर्मूल कर देने के आश्वासन दिए गए थे। ...इसलिए आज़ादी की लड़ाई में किसान वर्ग ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था। लाठी-डंडे और गोलियाँ उसने भी सीने पर झेली थीं। उसने भी जेल भरो आंदेलन में भाग लिया था। उसने भी रेल की पटरियाँ उखाड़ी थीं, अंग्रेजों के तार तोड़ डाले थे। अनैतिक लगान न देने के आंदोलन किए थे।
आज़ादी के बाद क्या हुआ? इसमें दो राय नहीं हो सकती है कि दिए गए सभी आश्वासनों की पूर्ति हेतु कानूनी कार्यवाहियाँ हुईं। राजतंत्र समाप्त हुआ, प्रजातंत्र आया। जमींदारी समाप्त हुई। किसान खेत का मालिक बना। महाजनों-साहूकारों के विकल्प में सहकारी सोसाइटियाँ बनीं, किसानों को आसान किस्तों पर कर्ज देने वाले बैंकों का जाल फैलाया गया। सरकारी तौर पर तकावियाँ (वह धन जो जमींदार, राज्य या सरकार की ओर से गरीब खेतिहरों को खेती के औजार बनवाने, बीज खरीदने या कुआँ आदि बनवाने के लिए ऋण स्वरूप दिया जाए) बाँटी गईं। छूट (सब्सिडी) के दौर-पर-दौर चले। आए दिन ब्याज माफी भी हुई। खेती की गुणवत्ता सुधारने के लिए राज्यों में कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई। अधिक उपज देने वाले नए-नए किस्मों के बीजों का प्रचार-प्रसार हुआ। उसी के अनुषंग में रासायनिक खादों का भी प्रचलन किया गया। कुओं के पानी को बैलों से खींचकर होने वाली कष्टप्रद और समय साध्य सिंचाई की जगह ट्यूबवेल और पंपसेटों ने ली। हल बैल की जगह टैक्टर आया। गाँवों तक सड़कें पहुँचीं। सिंचाई के लिए नहरों की खुदाई हुई। बिजली के खंबे गढ़े, तार लगे।
इन गतिविधियों से हमें अमेरिका से आयातित सड़े लाल गेहूँ से राहत मिली। अस्सी के दशक में अनाज के लिए हम आत्मनिर्भर हो गए और संसार में वाहवाही होने लगी। हमने इतना गेहूँ और चावल पैदा किया कि सरकारी गोदामों में उसे रखने तक की जगह नहीं रही। मीडिया के समाचारों में बताया गया और चित्र दिखाए गए कि अनाज सड़ गया। लेकिन, आज गेहूँ, दाल और तेल विदेशों से मँगाया जा रहा है। एक परिदृश्य यह भी है कि पुराने राजतंत्र की जगह आज किसानों के प्रतिनिधि बैठे हैं। उनमें से अधिकांश अपने को किसान ही कहते हैं। हमारे देश के अधिकांश मंत्रियों, सांसदों तथा विधायकों के पास अपने अपने एग्रीकल्चर फार्म हैं, लेकिन उनके और उनके राजकुमारों के कारनामें कौन नहीं जानता है। कभी कभी खबर छप जाती है।
ऐसे किसानों तथा खेती से जुड़े डेअरी एवं मुर्गीपालन और कुटीर धंधा करने वालों के पास करोड़ों नहीं, अरबों-खरबों की संपत्ति है। ...खोजी पत्रकारिता के लिए यह क्षेत्र छुपा हुआ तो नहीं है कि आज प्रायः हर व्यवसायी और दो नंबर की आमदनी वालों के पास छोटी मोटी खेती है या उससे जुड़ा कोई पूरक व्यवसाय है। ऐसे किसानों पर भले ही करोड़ों का कर्जा हो तो भी वे कर्ज के बोझ से आत्महत्या करने का विचार नहीं करते। पुराने साहूकारों, महाजनों के चंगुल से किसानों का पीछा छुड़ाने हेतु जो तथाकथित उपाय हुए उनमें नए तरीके का भ्रष्टाचारी तंत्रजाल पुराने शोषण से भी भयंकर है। किसानों से संबंधित बैंकों से कर्जा लेने और चुकाने की प्रक्रिया का सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाए तो इसका सत्यापन हो सकता है।
महात्मा गांधी किसानों को आत्मनिर्भर देखना चाहते थे, किंतु आज वह पूर्णतः परावलंबी बन गए हैं। बीज, खाद, पानी, बिजली, ढुलाई-जुताई, रोटी, कपड़ा, मकान आदि सभी जीवनयापन की वस्तुओं के लिए वे परोन्मुखी हैं। बाजारतंत्र और खुले बाजारवाद ने अनावश्यक वस्तुओं के लिए उसकी तृष्णा बढ़ा दी है। इस नई मृग-मरीचिका के मोहपाश में जकड़ा हुआ किसान आत्महत्या न करे तो क्या करे, जिंदा रहे तो कैसे ? ...प्रश्न यह है कि क्या एक बार किसानों का कर्जा माफ कर देने ले समस्या का स्थायी समाधान हो सकेगा। पहले भी देश के अनेक भागों में अनेक परिस्थितियों में किसानों के कर्जे सामूहिक रूप से माफ होते रहे हैं, परंतु समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं हुआ है।
डॉ. प्रथमवीर ने यह लेख दिसंबर 2006 में लिखा था, पर आज भी उतना ही बड़ा प्रश्न उपस्थित है, जितना उस समय था। लेकिन क्या वास्तव में किसानों की समस्या का कोई समाधान नहीं है। कर्ज का बोझ, आधुनिक चकाचौंध भरे रहन-सहन, महँगी शिक्षा, आज की परिस्थिति-जन्य मानसिक बोझ कभी समाप्त नहीं होगा। उन्हीं के शब्दों में तत्काल राहत का महत्व तो है, लेकिन वहीं टिके रहना समस्या की तरफ से आँख बंद कर लेने जैसा है। पत्तों पर पानी का छिड़काव करने से कोई वृक्ष ज्यादा दिन हरा-भरा रह नहीं सकता। और उनके कवि पंडित ज्योतिराम की कविता की पंक्तियाँ ‘कितने हू दुख लिखियो विधना, परि भारत में न किसान बनइयो’ अमर बनी रहेंगी? कौन सोचेगा, कौन करेगा?



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