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मेरा चुनाव

मैंने नहीं चुना मित्र कि तुम मुझ पर शासन करो,
तुमने स्वयं चुन लिया होगा कि मुझ पर शासन करो।
जीवन की व्यवस्थाओं के लिए मूल्य चुकाना होता है,
मैं चुकाता हूँ मूल्य, पर ऐसा नहीं कि तुम शासन करो।

यह सच है कि व्यवस्थाओं के कुछ नियम होते हैं,
उनको पालन करने और कराने के विनियम होते हैं।
मगर पालन करने को करने-कराने वाले हैं जिम्मेदार,
नियमों विनियमों के मानदंड तो एक ही तरह होते हैं।

मेरा जीना मेरे वश में नहीं तो तुम्हारे वश में क्यों कैसे,
वृक्ष को पोषण आकार रंग देती कुदरत, दूजा क्यों कैसे।
जीवन के आयाम कितने, राह कितनी हैं मेरे दोस्त,
किसी एक में बाँधना किसी के लिए सरल क्यों कैसे?

-श्री सत्येंद्र सिंह, पुणे (महाराष्ट्र)

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