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आलसी! (व्यंग्य)

कादर मन कहूं एक अधारा,
दैव-दैव आलसी पुकारा ।
 

गोस्वामी तुलसीदास की जय हो! जब से मैंने राम चरित मानस की ये पंक्तियाँ पढ़ीं तब से ‘आलस्य क्या है?’ आलसी किसे कहते हैं? इनकी पहचान क्या है? इनके गुण/अवगुण क्या हैं? इनकी विशेषता क्या है और इनका व्यवहार कैसा होता है? इसी की शोध/खोज में मैंने अपनी सारी उम्र गंवा दी।
आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, यह बात मैं अब मानने को तैयार नहीं। पहले मैंने कभी इस विषय पर इतनी गहराई से सोचा ही नहीं, पर एक दिन मजबूर हो गया। आप जानते हैं मरता क्या न करता? नहीं! नहीं! मैं मर नहीं रहा था। यह तो लोकोक्ति है। मैं अपनी लाचारी बता रहा हूं। बात समझने वाली है। हुआ यूं कि एक दिन टीवी के रिमोट पर दोस्तों/दुश्मनों के साथ बहुत वाद-विवाद हुआ। बात झगड़े-लड़ाई तक पहुंच गई। मैंने केवल यही कहा कि संसार के सारे आविष्कार आलसियों  ने किए हैं। बस इतनी सी बात पर बहस शुरू हो गई और अगल-बगल बैठे मित्रों /शत्रुओं ने अपनी-अपनी राय देने का सिलसिला शुरू कर दिया। कोई कहता सारे आविष्कार आदि मानव ने किए तो कोई मूर्खों को इसका श्रेय देने की जिद पर अड़ गया। भारत के लोग किसी भी विषय पर बिना ज्ञान या अनुभव के विचार व्यक्त करने के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। बस फिर क्या था, सारे अपने-अपने ज्ञान-भंडार का द्वार खोलकर उसी तरह मेरे पीछे पड़ गए जैसे लाल कपड़े को देखकर सांढ़। खैर, मैं मामला बिगड़ता  देख कर चुप-चाप वहाँ से खिसक लिया। बाद में पता चला कि वहां जबान के बाद लात- घूसे भी चले। मैं और कुछ पहचानूँ या न पहचानूँ पर समय की नजाकत को तुरंत भांप लेता हूं। कुछ लोग मुझे दोष देने लगे। सारी फसाद मेरे कारण हुई। अब आप ही बताइए मेरा इसमें क्या दोष है? 
एक समय वह था कि हम टीवी का एंटीना घुमा-घुमाकर टीवी देखते थे। घर का एक सदस्य छत पर चढ़कर एंटीना घुमाता फिर पूछता आया कि नहीं? नीचे से सभी एक साथ बोलते नहीं! जैसे ही तस्वीर आती, सभी लोग जोर-जोर से बोलते हां आ गई! बस! अब मत छूना!
अब क्या बताएं, एक वह दिन और एक आज का समय। टीवी चलाने के लिए रिमोट भी उठकर नहीं लेते। किसी से मांगते हैं जरा रिमोट पकड़ा दो। यही तो हैं आलसी के लक्षण।
आइए! अब मैं आपको आलसी के बारे में थोड़ा और बता दूँ। संसार के सभी जीवों में सबसे अधिक बुद्धिमान यह बंदरों की संतान, बिना पूंछ वाला बंदर, आदमी नामक प्राणी, एकमात्र आलसी जीव है। यह बहुत बुद्धिमान है पर जीभ हिलाने के अलावा शरीर का कोई भी अंग हिलाने से कतराता है। इसे संसार के सारे सुख चाहिए पर अगर प्राण सकट में न हों तो यह हिल कर भी खुश नहीं। इसका बस चले तो अपने हाथ से यह खाना भी ना खाए। यह मनोविज्ञान के ट्रायल और एरर के आसरे अपना जीवन यापन करता है। एक भी काम करने के लिए हिलना न पड़े ऐसा कुछ उपाय बार-बार करता है। अगर सफल हो जाता है तो सारे आलसी उसकी जय जयकार करने लगते हैं कि इसने एक अविष्कार किया है, इस ने हमारा परिश्रम बचाया है, यह महान है, आदि-आदि। उसे पुरस्कृत/अलंकृत किया जाने लगता है।
संसार में सबसे अधिक अलसी सिंधु घाटी सभ्यता के प्रदेशों में मिलते हैं। यह लोग झुंड में रहते हैं। न दाढ़ी बनाते हैं, न बाल बनाते हैं, न तरह-तरह के वस्त्र पहनते हैं, न खेती करते हैं, न कोई व्यवसाय करते हैं। बस सुनते सुनाते हैं। संसार और सांसारिक ज्ञान का इनके पास असीमित भंडार है। इन्हें देख कर ही मलूक दास ने कहा कि सबके दाता राम। यह खुद भी आलसी होते हैं और दूसरों को भी आलसी बनाते हैं। किसी की सहायता कर के खुश नहीं होते पर दूसरों से अपनी सेवा करा कर प्रसन्न होते हैं, आनंदित होते हैं। सेवा के बदले मेवा नहीं केवल आशीर्वाद देते हैं,जो किसी काम का नहीं।
आलसी मनुष्यों की अलग-अलग श्रेणियां हैं। उनके बारे में जानना और उन्हें पहचानना आप के लिए आवश्यक है। मैं इनके बारे में बहुत कुछ जानता हूं और इन्हें पहचानता भी हूं क्योंकि मैं बचपन से इन्हीं के साथ रहा हूं। अपना कोई काम नहीं करते पर काम करने का तरीका जरूर बताते हैं। कोई कुछ भी कर रहा हो यह उसको तरीका जरूर बता देते हैं।
अब इनकी श्रेणियों के बारे में जान लें। सर्वोच्च श्रेणी के आलसियों को सम्मान से आलसी शिरोमणि कह कर संबोधित किया जाता है। यह बचपन से ही अमरबेल के गुणों से पूर्ण होते हैं। इनकी पहचान यह है कि यह स्वयं नहीं चलते। इन्हें दूसरे आलसी लेकर चलते हैं। इन्हें लेकर चलने वाले वही होते हैं जो स्वयं आलसी होते हैं और शिरोमणि बनने की दौड़ में शामिल रहते हैं। इन्हें परम आलसी की संज्ञा से संबोधित किया जाता है। यह लोग महा आलसी वाले समूह को आलस्य के लाभ-हानि की विवेचना कर उन्हें अपनी सेवा करने के लिए प्रेरित करते हैं। इस समूह में उन्हीं लोगों को रखा जाता है जो घर से काम की तलाश में निकलते हैं और काम नहीं मिलने की दशा में भिक्षाटन से जीवनयापन करते हैं। वास्तव में यह समाज के बीच पुकारे जाने वाले सामान्य आलसी श्रेणी के होते हैं। इनकी उत्पत्ति अवसरवादी आलसी समूह से होती है जो स्वार्थी आलसी के रूप में समाज में परिगणित होते हैं। ऐसे आलसी तभी तक आलस्य करते हैं जब तक इनका अपना स्वार्थ सिद्ध होने में कोई व्यावधान उत्पन्न न हो। जो लोग आलसी होने का ढोंग करते हैं, उन्हें ढोंगी आलसी की श्रेणी में रखा जाता है। समाज में मेरे और आपके जैसे आलसियों को अन्य आलसी की श्रेणी में रखा जाता है।
अब आप इन्हें आसानी से पहचान सकते हैं। आपने मुझे पहचाना कि नहीं? मैं तो आपको पहचान गया कि आप भी आलसी हैं पर श्रेणी नहीं बताऊंगा क्योंकि आपने मेरे इस निबंध को पूरा पढ़ लिया है और अपने बारे में जान गए हैं।
श्री राम प्रताप चौबे 
(सैनिक बाबा)
अहिरौली, बक्सर (बिहार)

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