लेखक- शरद कोकास
"जिस तरह हमारा बचपन होता है, उसी तरह समाज का, देश का और दुनिया का भी बचपन रहा है। यही बचपन इतिहास कहलाता है।" इतिहास की इतनी सटीक, संक्षिप्त, सुंदर एवं सरल परिभाषा हमें पढ़ने को मिलती है, साहित्यकार एवं एक्टिविस्ट शरद कोकास के आत्मकथात्मक संस्मरणों की पुस्तक "बैतूल से भंडारा" में, जिसे उन्होंने एक जन इतिहास कहा है।बैतूल (मध्यप्रदेश) और भंडारा (महाराष्ट्र) पहले कस्बे थे और संयुक्त प्रांत का हिस्सा हुआ करते थे, इसलिए आज भी इन दोनों शहरों के बीच बहुत कुछ एक जैसा है, जो आज भी नहीं बदला। यह पुस्तक हमें दोनों शहरों के बारे में सब कुछ बता देती है। पुस्तक कुल 127 अध्यायों में विभाजित है। सभी अध्यायों के शीर्षक उपयुक्त, बेजोड़ एवं काव्यात्मक हैं, जिन पर कवि शरद कोकास के व्यक्तित्व की छाप स्पष्टतः परिलक्षित होती है। कुछ बानगियां देखिए- लकीरों के जाल में नि:शब्द अक्षर, बड़े बाजार में एक छोटा बाजार रहता था, अवचेतन पर विज्ञापनों के झूठ की हैमरिंग, देह राग में जन्म आरोह है अवरोह मृत्यु, एक बीड़ी रात भर सीने में सुलगती है, शहर में आदमियों का बाड़ा।
यह पुस्तक दो शहरों का इतिहास होने के साथ-साथ शरद कोकास की आत्मकथा भी है, जिसमें उन्होंने प्रसंगानुकूल अनेक विख्यात साहित्यकारों की प्रसिद्ध काव्य पंक्तियों / उक्तियों का उल्लेख भी किया है, जिससे पुस्तक की रोचकता में वृद्धि ही हुई है।
निर्जीव वस्तुओं का आलंकारिक काव्यात्मक मानवीकरण तो अनूठा है।
'दूध को दो बार गर्म किया जाता था ताकि वह गुस्से से फटे नहीं'। (पृष्ठ 33)
'रोटी खुशी से फूल कर कुप्पा हो जाती थी'। (पृष्ठ 33)
'बाहरी दीवारें बरसात के दिनों में दु:ख की तरह पसीजती रहती थी'। (पृष्ठ 36)
'वे गांव, जहां रास्ते, रास्ते में ही दम तोड़ देते थे'। (पृष्ठ 59)
'जलेबी जैसे ही खुशी से फूलती, उसे तुरंत चाशनी में दबा दिया जाता'। (पृष्ठ 96)
'जैसे-जैसे संध्या परी का आगमन होता, लाल परी की बिक्री बढ़ जाती'। (पृष्ठ 98)
'देह की घाटी में मांसपेशियों की कुछ चट्टानें ठोस रूप ले रही थी। भीतर ही भीतर नसों में कोई नदी बहने लगी थी। (पृष्ठ 161)
'शरद का चांद खुले आसमान में अपनी मसें भीगने की उम्र तक आ चुका है और ओस में नहाती हुई चांदनी को छुप-छुप कर देख रहा है'। (पृष्ठ 220)
पृष्ठ 66 पर चावल के विभिन्न उत्पादों/ व्यंजनों की विस्तृत जानकारी दी गई है, जो आम पाठक के लिए बेहद रोचक एवं महत्वपूर्ण है। पृष्ठ 73 पर बीड़ी निर्माण की प्रक्रिया का वर्णन है, जो आज की पीढ़ी के लिए बिल्कुल नई एवं अनूठी जानकारी होगी।
पुस्तक में अनेक आम बोलचाल के उर्दू शब्दों का प्रयोग किया गया है, लेकिन पृष्ठ 47, 48, 52, 79, 127,128, 143, 153, 154, 160, 233 पर मराठी के जो शब्द तथा वाक्यांश दिए गए हैं, वे एक आम भारतीय पाठक की समझ से परे हैं। पुस्तक में उनका हिंदी अनुवाद दिया जाना चाहिए था, क्योंकि उत्तर भारत के अधिकांश लोगों को मराठी बिल्कुल भी नहीं आती। इसी प्रकार पृष्ठ 63, 64, 78, 111, 112, 113, 115, 121, 129, 131, 146, 189, 193, 194, 195, 196, 197, 199, 201, 203, 211, 212, 219, 223, 228, 229, 231 तथा 233 पर अंग्रेजी के जो शब्द तथा वाक्यांश दिए गए हैं, कोष्ठक में उनका हिंदी अनुवाद दिया जाना चाहिए था ।
पृष्ठ 31, 33, 36, 39, 41, 42, 43, 47, 50, 52, 53, 54, 59, 61, 67, 69, 75, 77, 79, 83, 88, 89, 94, 95, 96, 98, 102, 107, 110, 113, 116, 118, 121, 122, 124, 126, 128, 131, 136, 140, 141, 143, 144, 145, 147, 149, 160, 171, 184, 191, 192, 194, 201, 205, 208, 231 तथा 240 पर वर्तनी/ टंकण की त्रुटियां पाई गई है।
'तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है' शीर्षक से लिखित अध्याय अत्यंत मार्मिक है। पढ़कर आंखें भर आती है। दृष्टिबाधितों के मर्म को समझना आसान नहीं है।
भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भंडारा से लोकसभा का चुनाव लड़ा था और पराजय का सामना किया था। उनकी इस पराजय के कारणों को जानने के लिए इस पुस्तक को पढ़ना आवश्यक हो जाता है। बैतूल एवं भंडारा से जुड़े लोगों के लिए तो यह एक बेहद जरूरी पुस्तक है ही, लेकिन एक आम पाठक के दृष्टिकोण से भी यह केवल एक इतिहास एवं आत्मकथा नहीं है, दो संस्कृतियों, दो शहरों ,दो भाषाओं, दो राज्यों एवं दो परिवेशों का एक रोचक संगम भी है। पुस्तक का मुखपृष्ठ, मुद्रण, साज- सज्जा, कागज, बाइंडिंग बढ़िया है। आशा है आगामी संस्करण में निर्दिष्ट त्रुटियों/ कमियों को दूर कर लिया जाएगा।
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· पुस्तक - बैतूल से भंडारा
· लेखक- शरद कोकास
· कुल पृष्ठ संख्या- 242
· मूल्य- 425 रुपए
· संस्करण- प्रथम 2025
· प्रकाशक- न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी- 515, बुद्धनगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली 110 012
· संपर्क- 8750688053
निर्जीव वस्तुओं का आलंकारिक काव्यात्मक मानवीकरण तो अनूठा है।
'दूध को दो बार गर्म किया जाता था ताकि वह गुस्से से फटे नहीं'। (पृष्ठ 33)
'रोटी खुशी से फूल कर कुप्पा हो जाती थी'। (पृष्ठ 33)
'बाहरी दीवारें बरसात के दिनों में दु:ख की तरह पसीजती रहती थी'। (पृष्ठ 36)
'वे गांव, जहां रास्ते, रास्ते में ही दम तोड़ देते थे'। (पृष्ठ 59)
'जलेबी जैसे ही खुशी से फूलती, उसे तुरंत चाशनी में दबा दिया जाता'। (पृष्ठ 96)
'जैसे-जैसे संध्या परी का आगमन होता, लाल परी की बिक्री बढ़ जाती'। (पृष्ठ 98)
'देह की घाटी में मांसपेशियों की कुछ चट्टानें ठोस रूप ले रही थी। भीतर ही भीतर नसों में कोई नदी बहने लगी थी। (पृष्ठ 161)
'शरद का चांद खुले आसमान में अपनी मसें भीगने की उम्र तक आ चुका है और ओस में नहाती हुई चांदनी को छुप-छुप कर देख रहा है'। (पृष्ठ 220)
पृष्ठ 66 पर चावल के विभिन्न उत्पादों/ व्यंजनों की विस्तृत जानकारी दी गई है, जो आम पाठक के लिए बेहद रोचक एवं महत्वपूर्ण है। पृष्ठ 73 पर बीड़ी निर्माण की प्रक्रिया का वर्णन है, जो आज की पीढ़ी के लिए बिल्कुल नई एवं अनूठी जानकारी होगी।
पुस्तक में अनेक आम बोलचाल के उर्दू शब्दों का प्रयोग किया गया है, लेकिन पृष्ठ 47, 48, 52, 79, 127,128, 143, 153, 154, 160, 233 पर मराठी के जो शब्द तथा वाक्यांश दिए गए हैं, वे एक आम भारतीय पाठक की समझ से परे हैं। पुस्तक में उनका हिंदी अनुवाद दिया जाना चाहिए था, क्योंकि उत्तर भारत के अधिकांश लोगों को मराठी बिल्कुल भी नहीं आती। इसी प्रकार पृष्ठ 63, 64, 78, 111, 112, 113, 115, 121, 129, 131, 146, 189, 193, 194, 195, 196, 197, 199, 201, 203, 211, 212, 219, 223, 228, 229, 231 तथा 233 पर अंग्रेजी के जो शब्द तथा वाक्यांश दिए गए हैं, कोष्ठक में उनका हिंदी अनुवाद दिया जाना चाहिए था ।
पृष्ठ 31, 33, 36, 39, 41, 42, 43, 47, 50, 52, 53, 54, 59, 61, 67, 69, 75, 77, 79, 83, 88, 89, 94, 95, 96, 98, 102, 107, 110, 113, 116, 118, 121, 122, 124, 126, 128, 131, 136, 140, 141, 143, 144, 145, 147, 149, 160, 171, 184, 191, 192, 194, 201, 205, 208, 231 तथा 240 पर वर्तनी/ टंकण की त्रुटियां पाई गई है।
'तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है' शीर्षक से लिखित अध्याय अत्यंत मार्मिक है। पढ़कर आंखें भर आती है। दृष्टिबाधितों के मर्म को समझना आसान नहीं है।
भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भंडारा से लोकसभा का चुनाव लड़ा था और पराजय का सामना किया था। उनकी इस पराजय के कारणों को जानने के लिए इस पुस्तक को पढ़ना आवश्यक हो जाता है। बैतूल एवं भंडारा से जुड़े लोगों के लिए तो यह एक बेहद जरूरी पुस्तक है ही, लेकिन एक आम पाठक के दृष्टिकोण से भी यह केवल एक इतिहास एवं आत्मकथा नहीं है, दो संस्कृतियों, दो शहरों ,दो भाषाओं, दो राज्यों एवं दो परिवेशों का एक रोचक संगम भी है। पुस्तक का मुखपृष्ठ, मुद्रण, साज- सज्जा, कागज, बाइंडिंग बढ़िया है। आशा है आगामी संस्करण में निर्दिष्ट त्रुटियों/ कमियों को दूर कर लिया जाएगा।
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· पुस्तक - बैतूल से भंडारा
· लेखक- शरद कोकास
· कुल पृष्ठ संख्या- 242
· मूल्य- 425 रुपए
· संस्करण- प्रथम 2025
· प्रकाशक- न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी- 515, बुद्धनगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली 110 012
· संपर्क- 8750688053
समीक्षक : डॉ. विपिन पवार,
फ्लैट नंबर 805, टॉवर नंबर 19, जॉयविल हड़पसर एनेक्स, शेवालेवाड़ी, भारत पेट्रोल पंप के सामने, पोस्ट-मांजरी फार्म, पुणे 412307 (महाराष्ट्र) फोन - 8850781397



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