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“हम भारत के लोग…” : खोती हुई जनसत्ता और पिसता हुआ मेहनतकश भारत

लेखक : विठ्ठल राजे पवार
*राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं निमंत्रक*
शरद जोशी विचारमंच किसान कामगार एम.एस. फाउंडेशन एवं किसान संगठन महासंघ,
नई दिल्ली, महाराष्ट्र राज्य
*अध्यक्ष – वेस्टर्न भारत.*
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अल्पसंख्यक महासंघ,
नई दिल्ली, वेस्टर्न भारत, महाराष्ट्र राज्य
“हम भारत के लोग…” — संविधान के ये प्रारंभिक शब्द भारतीय लोकतंत्र की आत्मा हैं। यह केवल प्रस्तावना की शुरुआत नहीं, बल्कि भारतीय जनता द्वारा स्वयं के लिए लिया गया एक पवित्र संकल्प है। इन शब्दों का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है: इस देश में सर्वोच्च सत्ता किसी राजा, शासक, राजनीतिक दल या धनबल से खड़ी व्यवस्था के पास नहीं, बल्कि सीधे जनता के पास है। किंतु आज की वास्तविकता देखें, तो यह संकल्प पूरी तरह से टूटता हुआ दिखाई देता है।*
आज राज्य और देश के किसान, मजदूर, कामगार, पिछड़ा वर्ग, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज के लिए त्योहार मनाने की स्थिति नहीं रही। जिनके पसीने पर यह देश खड़ा है, उन्हीं के जीवन पर अन्याय, दमन और उपेक्षा की गहरी छाया छाई हुई है। संविधान द्वारा दिए गए स्वतंत्रता, समानता और न्याय के मूल्य आज केवल कागज़ों तक सीमित रह गए हैं।
शासकों ने भ्रष्टाचार, धनबल, खोखली भाषणबाज़ी और जनता को भ्रमित करने की नीति के माध्यम से लोकतंत्र के स्वरूप को ही बदल दिया है। चुनावी राजनीति, जाति-धर्म का ज़हर, झूठे वादे और प्रचार की चकाचौंध में आम जनता फँस गई है। इस विषैली व्यवस्था ने समाज की वैचारिक स्वतंत्रता छीन ली है और सवाल पूछने वाली जनता को चुप कराया जा रहा है।
इस स्थिति का सबसे बड़ा आघात किसानों, मजदूरों और कामगार वर्ग पर पड़ रहा है। कृषि उपज को उचित मूल्य नहीं मिल रहा, उत्पादन लागत बढ़ती जा रही है, कर्ज़ का बोझ बढ़ता जा रहा है और किसान आत्महत्याओं की ओर धकेले जा रहे हैं। कामगारों को सुरक्षित रोज़गार नहीं है, श्रम का मूल्य नहीं है और न्याय पाने के लिए अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। अशिक्षित, गरीब और सामान्य जनता इस व्यवस्था के पहियों तले बेरहमी से पिस रही है।
*संविधान स्पष्ट रूप से कहता है — सरकार से बड़ा संविधान है और संविधान से बड़ी जनता है। लेकिन आज ठीक इसके विपरीत तस्वीर दिखाई देती है। सरकारें स्वयं को सर्वोच्च समझने लगी हैं और जनता को केवल मतदाता बनाकर इस्तेमाल किया जा रहा है। जनसत्ता की जगह सत्ता की भूख ने ले ली है और संविधान की याद केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित रह गई है।
आज आवश्यकता है कि “हम भारत के लोग” इन शब्दों के वास्तविक अर्थ को फिर से समझा जाए। संविधान को पढ़ा जाए, समझा जाए और उसकी रक्षा के लिए खड़ा हुआ जाए। यदि किसान, मजदूर, कामगार और वंचित समाज एकजुट होकर अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाएंगे, तभी लोकतंत्र जीवित रहेगा। अन्यथा यह लोकतंत्र केवल नाम का रह जाएगा।*
*जय किसान! जय संविधान!*

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