-वरिष्ठ पत्रकार श्री सुधीर मेथेकर
नमस्कार,
आज शुभ संस्कार-अशुभ संस्कार विषय पर स्वामी विवेकानंदजी ने बहुत ही अच्छा मार्गदर्शन किया है, वही आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।
संदर्भ : स्वामी विवेकानंद ग्रंथ : कर्मयोग
शुभ संस्कार - अशुभ संस्कार
स्वामी विवेकानंदजी लिखते हैं कि यदि शुभ संस्कारों का प्राबल्य रहे तो मनुष्य का चरित्र अच्छा होता है और यदि अशुभ संस्कारों का प्राबल्य हो तो चरित्र बुरा होता है। यदि मनुष्य निरन्तर बुरे शब्द सुनता रहे, बुरे विचारों पर ही सोचता रहे, बुरे कर्म करता रहे, तो उसका मन भी बुरे संस्कारों से पूर्ण हो जायेगा और बिना उसके जाने ही वे संस्कार उसके समस्त विचारों तथा कार्यों पर प्रभाव डाल देंगे।
अतएव बुरे संस्कार-संपन्न होने के कारण उस व्यक्ति के कार्य भी बुरे होंगे - वह एक बुरा आदमी बन जायेगा। बुरे संस्कार उसमें दुष्कर्म करने की प्रबल प्रवृत्ति उत्पन्न कर देंगे। इसी प्रकार यदि एक मनुष्य अच्छे विचार के भाव मन में रखे और सत्कार्य करे तो उसके इन संस्कारों का प्रभाव भी अच्छा ही होगा तथा उसकी इच्छा न होते हुए भी वे उसे सत्कार्य करने के लिये प्रवृत्त करेंगे। जब मनुष्य इतने सत्कार्य एवं सच्चिन्तन कर चुकता है कि उसकी इच्छा न होते हुए भी उसमें सत्कार्य करने की एक अनिवार्य प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है। तब फिर वह दुष्कर्म करना भी चाहे तो इन सब संस्कारों की समष्टि - स्वरुप उसका मन उसे ऐसा करने से तुरंत रोक देगा । इतना ही नहीं, उसके ये संस्कार उसे उस मार्ग पर से भी हटा देंगे।

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