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सत्येंद्र सिंह ‘श्री श्याम श्रोत्रिय-स्मृति साहित्य पुरस्कार’ से सम्मानित

पुणे, सितंबर (ह.ए. प्रतिनिधि)

पं. हरप्रसाद पाठक-स्मृति बाल साहित्य पुरस्कार समिति, मथुरा द्वारा श्री सत्येंद्र सिंह को श्री श्याम श्रोत्रिय-स्मृति साहित्य पुरस्कार तथा 1100/- की राशि व सम्मान पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया है। सुप्रसिद्ध लेखक डॉ. दिनेश पाठक शशि द्वारा 1997 में बाल साहित्य के उन्नयन हेतु बाल साहित्यकारों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अपने पिता श्री की स्मृति में पं. हरिप्रसाद पाठक बाल साहित्य पुरस्कार समिति का गठन किया गया था, जिसके अंतर्गत पुरस्कृत होने वाले साहित्यकारों को 2251/- रुपए तथा अंग वस्त्र, स्मृति चिह्न एवं सम्मान पत्र प्रदान किया जाता है। अब इस समिति द्वारा हर विधा के साहित्यकारों को सम्मानित किया जाता है, जिसके लिए इस समिति के साथ अन्य महापुरुष जुड़ते गए और अपने पूज्यजनों  के नाम पर साहित्य पुरस्कार जोड़ते गए। 2019 में  श्री राम मोहन श्रोत्रिय ने अपने भाई के नाम पर श्री श्याम श्रोत्रिय जी की स्मृति में 1100/- नकद व सम्मान पत्र देने की शुरुआत की और 2020 का पुरस्कार श्री सत्येंद्र सिंह को उनके काव्य संग्रह ‘फ़र्क पड़ता है’ पर प्रदान किया गया है।
श्री सत्येंद्र सिंह के काव्य संग्रह ‘फ़र्क पड़ता है’ में 70 स्वतंत्र, तुकांत व अतुकांत कविताओं का संग्रह है, जिसे वे आत्माभिव्यक्ति मानते हैं। इस काव्य संग्रह की समीक्षा डॉ. लतिका जाधव, रेल मंत्रालय के पूर्व निदेशक राजभाषा श्री के. पी. सत्यानंदन, पंजाब नैशनल बैंक के पूर्व प्रबंधक राजभाषा, वरिष्ठ साहित्यकार व संपादक चर्वणा आगरा श्री शीलेंद्र कुमार वशिष्ठ व श्री विपिन पवार, निदेशक राजभाषा, रेल मंत्रालय द्वारा की गई, जो विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। वैसे तो श्री सत्येंद्र सिंह हाईस्कूल करने के बाद 1967-68 से ही लिखने लगे, परंतु रेलवे में हिंदी के प्रयोग प्रसार, हिंदी भाषा, हिंदी टाइपिंग व आशुलिपि, हिंदी कार्यशाला में प्रशिक्षण देने में जुटे रहे और निरंतर लिखते रहने के बावजूद पुस्तक प्रकाशन में अधिक रुचि नहीं ले सके। हालांकि 1985 में उनका एक काव्य संग्रह ‘एक मुट्ठी आसमान’ प्रकाशित हो गया था पर अब यह काव्य संग्रह मित्रों के अनुरोध पर प्रकाशित करा पाए हैं। उनका रुझान हिंदी को अखिल भारतीय स्तर पर प्रसारित करने की ओर है और वे हर वह कार्य करने में रुचि रखते हैं जिससे हिंदी का प्रयोग प्रसार बढ़े, चाहे वह लेखन हो, अनुवाद हो, शब्दावली निर्माण हो, हिंदी पत्र, पत्रिकाओं व संस्थाओं को सहयोग देना हो।

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