श्री राहुल गोरवाडकर
मोबा. 9890144570
साम्यवाद (कमुनिज्म) खत्म हो गया है। पूंजीवाद (कैपिटलिज्म) नाकाम हो रहा है। समाजवाद खत्म होने को है। जनतंत्र (डेमोक्रेसी) की हालत भी खस्ता है। कोई भी एक व्यवस्थ्या आज दुनिया में सफल नहीं है। गरीबी बढ़ रही है। जो धनी है, वो अधिक धनी हो रहा है। जो गरीब है, वो अधिक गरीब हो रहा है। जो धनी देश है वो, दूसरे गरीब देशों के संसाधनों पर, वहां उनकी मर्जी की सरकार स्थापित करके लूट रहे हैं। चीन इसका एक ज्वलंत उदाहरण है, जो 8% के ब्याज पर गरीब देशों को आर्थिक मदद करने का नाटक करके, उनके एक-एक शहरों पर कब्जा कर रहा है। तो वो कौनसी व्यवस्था है, जो परिपूर्ण है, जो अपनी चरम उपयोगिता सिद्ध कर चुकी है।इसका उत्तर है, भारतवर्ष की 17,000 वर्ष पुरानी, सोनेसी चकाकी, शुद्ध धर्मक्रसी-मायक्रो इकोनोमिक मोडेल। ये छोटे-छोटे वर्ण के छोटे-छोटे, व्यापारियों का मोडेल है। भारत को अपने पूर्वजों का अर्थ पूर्ण मोडेल अपनाना चाहिये। पूर्ण रूप से ना साम्यवाद चल सकता है, ना समाजवाद, ना पूंजीवाद चल सकता है।
हमने ब्रिटिश लोगों से अपना आज का इकोनोमिक मोडेल आयात किया। ये पश्चिमी बाहरी मोडेल जो, बहुत बड़ी फौज, और बड़े व्यापारी, बड़े राजकीय अधिकारी, लोगों के हाथों में, सत्ता के एकीकरण का मोडेल था। आज का पूंजीवाद, इसी मोडेल का बहुत बड़ा रूप है। जबकि हमारा देसी इकोनोमिक मोडेल हमेशा छोटे-छोटे व्यापारी और छोटे कौटुंबिक लोगों के हाथों में था।
भारत हमेशा ही एक मायक्रो इकोनोमिक मोडेल का देश रहा है। जैसे बालों को काटने वाला नाई, पान वाला, गाड़ी चलाने वाला, चप्पल बनाने वाले मौची, मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुंभार, लोहे का काम करने वाले लोहार, सोने का काम करने वाले सुनार, और खेती करने वाले किसान। आज इसी मायक्रो इकोनोमिक मोडेल का गुणगान गाते भारतवर्ष के बुद्धिजीवी कभी नहीं थकते। इनकी अगली पीढ़ी घर में ही तैयार हो जाती थी। ना कि आज की शिक्षा व्यवस्था, जो एक बच्चे को उसकी पीढ़ीजात काम से घृणा सिखाता है।
यही वो भारतवर्ष का विचार था जो शुभ, लाभ, रिद्धी, सिद्धी की पूजा करते हैं। भारतवर्ष का दान धर्म करना और पुण्य कामना, ये समाज के अतिधनशाली होने के गलत प्रभाव को नष्ट करने की ही योजना थी। ये ठीक आज के कार्बन क्रेडिट योजना जैसी ही पद्धति थी।
समाज के उत्थान की इसी भावना को बल देने के लिये भारतवर्ष में हमारे ऋषि, मुनियों ने 8 प्रकार की लक्ष्मी का प्रयोग किया है।
1. आदिलक्ष्मी : आदि का अर्थ मुख्यस्रोत है। आदि लक्ष्मी धन के रूप में ईश्वरीय सिद्धांत पाना है, जो एक साधक को अपने मुख्यस्रोत यानी आत्मा या चेतना तक पहुंचने में सहायता करता है और आनंद, शांति समाधान प्रदान करती है। आदि लक्ष्मी के बिना एक साधक अपने अशांत मन को शांत करने में विफल रहता है। सभी अष्ट लक्ष्मियों में से, यह विशेष पहलू आध्यात्मिक धन को आगे बढ़ाने के लिए साधक/मनुष्य को मदद करती है। उसे चार-सशस्त्र, एक कमल और एक सफेद ध्वज, अन्य दो हाथों में अभय मुद्रा और वर मुद्रा के रूप में दर्शाया गया है।
2. धनलक्ष्मी : धनलक्ष्मी का अर्थ वो धन की पूजा है जो हमारे दिनंदिन उपयोग में उपजीविका के साधन हेतु काम में आती है। देवी धन लक्ष्मी चार भुजाओं वाली हैं, लाल वस्त्र में, सुदर्शन चक्र, शंख, कलश (आम के पत्तों वाला पानी का घड़ा और उस पर एक नारियल) या अमृता कलश (अमृत का एक घड़ा-जीवन का अमृत), धनुष-बाण, कमल (फूल) और अभय मुद्रा में एक हाथ जिसमें सोने के सिक्के थे।
3. धान्यलक्ष्मी : ये लक्ष्मी है जिसे धान्य, कृषि उपज के रूप में पूजा जाता है। हरे वस्त्र में उसे आठ-सशस्त्र के रूप में दर्शाया गया है, दो कमल, गदा (गदा), धान की फसल, गन्ना, केला और उसके दो हाथ अभय मुद्रा और वरदा मुद्रा में हैं। धन लक्ष्मी भी धन का सिद्धांत है जो प्रदान करता है। भस्म करने या भोगने की क्षमता। यदि किसी व्यक्ति के पास धन लक्ष्मी होती है, तो उन्हें सांसारिक सुखों का आनंद लेने का सौभाग्य प्राप्त होगा।
4. गजलक्ष्मी : ये लक्ष्मी है जिसे गाय बकरियां, हाथी, घोड़े के स्वरूप में पूजा जाता है। उसे लाल वस्त्र में, दो कमल, अभय मुद्रा और वर मुद्रा में दो हाथियों के साथ पानी के बर्तन से नहाते हुए, चार-सशस्त्र के रूप में चित्रित किया गया है।
5. संतानलक्ष्मी : संतानलक्ष्मी (संतान लक्ष्मी) श्रेष्ठ संतानों/पुत्र/पुत्री को पाने के लिये संतानलक्ष्मी की देवी के रूप में इसको पूजा जाता है। उसे छह-सशस्त्र के रूप में चित्रित किया गया है, जिसमें दो कलश (आम के पत्तों वाला पानी का घड़ा और उस पर एक नारियल), तलवार, ढाल, उसकी गोद में एक बच्चा, अभय मुद्रा में एक हाथ और दूसरा बच्चा पकड़े हुए है। उसकी तलवार और ढाल एक माँ की क्षमता का प्रतीक है कि वह अपने बच्चे को बचाने के लिए किसी की हत्या भी कर सकती है। बच्चा कमल धारण करता है।
6. वीरलक्ष्मी : वीरलक्ष्मी (वैधलक्ष्मी) या धीरलक्ष्मी (साहसलक्ष्मी) वह देवी है जो लड़ाई के दौरान वीरता को प्राप्त करने में मदद करती है और जीवन में आने वाली कठिनाइयों को पार करने के लिए साहस और शक्ति का स्त्रोत होती है। लाल वस्त्र में, चक्र, शंख, धनुष, बाण, त्रिशूल (या तलवार), हथेली के पत्तों की एक माला, शास्त्रों और वर मुद्रा में अन्य दो हाथों में उसे आठ-सशस्त्र के रूप में दर्शाया गया है। ये वह है जिसने दुर्गा का अवतार लिया था.
7. जयलक्ष्मी/ विजयलक्ष्मी : विजयलक्ष्मी या जयलक्ष्मी (विक्टर लक्ष्मी) जीत की देवी और दाता है, न केवल लड़ाइयों में बल्कि सफलता प्राप्त करने के लिए, बाधाओं पर विजय पाने के लिए शक्ति प्रदान करती है।
8. विद्यालक्ष्मी/ज्ञानलक्ष्मी : विद्या लक्ष्मी (ज्ञानलक्ष्मी) देवी और कला और विज्ञान के ज्ञान की सर्वश्रेष्ठ देवी हैं। उसने सफेद साड़ी पहनी हुई है और देवी सरस्वती से मिलती जुलती है। वह वेदों की एक पुस्तक, एक मोर पंख एक कलम, वर मुद्रा और अभय मुद्रा के रूप में रखती है।
याद रखिये, आज की दुनिया के बड़े- बड़े देश क्रूर कर्मा तानाशाही और नरसंहार के लिए तैयार हो गए हैं और भारतवर्ष, एक ही ऐसी सभ्यता है जो, एक सोच, प्राकृतिक पूजा और विविधता की एकता के बलबूते पर तैयार हुआ है.।
आज पूरी दुनिया में लोगों के वेजेस/ सेलेरी समतल हो गयी है। आज हमारा जीवन क्रेडिट कार्ड पर जीया जा रहा है। 90% लोग अपनी जान/हैसियत से ज्यादा कर्ज लेकर अपने जीवन को बर्बाद कर रहे हैं।
आज भारतवर्ष के पास एक बहुत सुनहरा अवसर है, अपने 17,000 वर्ष पुराने मायक्रो इकोनोमिक मोडेल को दूसरे देशों को सिखाने का, जिसका नाम है धर्मक्रसी. चलो इसके फायदे/नुकसान देखे...!
1. इसमें रिस्क रहता है, व्यवसाय के मालिक के पास या, राज्य के पास। (कमुनिज्म कैपिटलीज्म के रिस्क)
यहां पर, मैं रिस्क लेता हूं, पर इस जिम्मेदारी के साथ कि फायदा मेरे समाज को दानधर्म के रूप में बांटूंगा। (धर्मक्रसी फायदे)
2. इसमें हर कोई अपने राईट/अधिकार के लिये लड़ता है। मेरा खुद का राईट विरुद्ध समाज का राईट/अधिकार। (कमुनिज्म कैपिटलीज्म के रिस्क)
इसमें राईट/अधिकार का कोई महत्व नहीं है। महत्व है, मेरी जिम्मेदारी का, एक समाज का। मैं कितना जिम्मेदार साथी हूं। (धर्मक्रसी फायदे)
3. ये समाज को भौतिक-भोगवादी समाज में परवर्तित कर रहा है। कोई भी टीवी ऐड देख लीजिये। (कमुनिज्म कैपिटलीज्म के रिस्क)
ये समाज को जिम्मेदारी के साथ, पृथ्वी के संसाधन प्रयोग करना सिखाता है। सादगीपूर्ण जीवन जीना सिखाता है। (धर्मक्रसी फायदे)
4. ये पूर्ण रूप से प्रोफिट करना सिखाता है। चीन को देखिये 12-12 घंटे काम करना, वहां का कानून है, जो नहीं मानता, उसे सख्त से निपटा जाता है। (कमुनिज्म कैपिटलीज्म के रिस्क)
धर्मक्रसी सोचती है, धर्म के साथ काम करना। (धर्मक्रसी फायदे)
हम बहुत सारा फायदा लोगों और पृथ्वी के संसाधन नष्ट करके नहीं कमा सकते।
धर्मक्रसी पूरी तरह से ट्रस्टीशिप यानी जिम्मेदार मलिक के रूप में काम करती है, जिसमें सारी संपत्ति, ज्ञान का मलिक, उसके 4-5 जिम्मेदार ट्रस्टी होते हैं और उस संस्था को धर्म की राह पर चलकर प्रगति करने का मौका देती है।
मैं यहां यह नहीं कह रहा कि धर्मसंस्था को जैसे का तैसा लागू करो। उसमें हम कुछ बदलाव अवश्य करें, जिससे सारे वर्ग को समान अधिकार मिले।
यह सही वक्त है, हम भारतवासी पश्चिमी फेल इकोनोमिक मोडेल का अंधा अनुकरण बंद करें। भारतवर्ष विश्वगुरु तभी बन सकता है, जब वो अपने मूल धर्म, अपने मूल विचारों का अनुसरण करे। यह हमारा उत्तरदायित्य भी है, हमारी एकमात्र पृथ्वी/ धरती माँ को संहार से बचाने के लिये।

0 टिप्पणियाँ