मुख्य समाचार

6/recent/ticker-posts

बेटी बचाओ जनआंदोलन का दसवें साल में पदार्पण

डॉ. गणेश राख ने किया हिन्दी साप्ताहिक हड़पसर एक्सप्रेस से वार्तालाप
डॉ. गणेश राख : जनक एवं मुख्य प्रवर्तक : बेटी बचाओ जनआंदोलन
3 जनवरी 2012 को एक कुली के बेटे डॉ. गणेश राख ने अपने पुणे स्थित मेडिकेयर हॉस्पिटल में लड़की होने पर मुफ्त डिलिवरी और लड़की के जन्म होने पर केक व मिठाई बांटकर नन्हीं बिटिया का स्वागत करने का ऐलान किया था। आज देखते ही देखते यह ‘बेटी बचाओ जनआंदोलन’ की जो छोटी सी नींव रखी गई थी वो विशाल जनसैलाब में फैल गई है। इस शुरूवात के बाद अब इस आंदोलन में लड़कियों के लिए बहुत सारी योजनाएं चालू की गईं। 10 साल पहले लड़की नहीं चाहिए, यह मानसिकता समाज में अपने चरण सीमा पर थी। कई लोग तो लड़कियों को पैदा ही करने के लिए तैयार नहीं होते थे। कन्या भ्रूणहत्या का प्रमाण     बहुत बढ़ गया था। किसी लड़की का जन्म होने पर लोग उसे हॉस्पिटल से घर ना ले जाकर बल्कि उस नवजात शिशु को कूड़े में फेंक देते थे ।
लड़की नहीं चाहिए इस मानसिकता को बदलने के लिए समाज का लड़कियों के प्रति नकारात्मक रवैये में परिवर्तन करने के लिए ‘बेटी बचाओ जनआंदोलन’ की शुरूवात 3 जनवरी 2012 को डॉ. गणेश राख द्वारा की गई। देखते ही देखते यह आंदोलन भारत तक ही ना सीमित रहकर पूरे विश्व में फैल चुका है। दस सालों में ‘बेटी बचाओ आंदोलन’ में कुछ हद तक सफलता मिली है, जो इस तरह  से है....
1) आज आंदोलन में पूरे विश्वभर से 4 लाख से ज्यादा डाक्टर, 13 हजार से ज्यादा सामाजिक संस्थाएं और 25 लाख से ज्यादा स्वयंसेवक काम कर रहे हैं। सब लोग अपने अपने-अपने क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं।
2) डॉक्टरों की तरह अन्य व्यवसायिक क्षेत्र जैसे फार्मासिस्ट, पैथोलॉजिस्ट, लैब, स्कूल, कॉलेज, कोचिंग क्लासेस, एडवोकेट, ऑटोवाले, ज्वेलर्स, समाचारपत्र, टायर पंक्चरवाले, पेंटर और अन्य अनेक क्षेत्रों के व्यवसायी लड़कियों को विशेष  छूट दे रहे हैं। 
3) विश्व के करोड़ों लोगों का श्रद्धास्थान अजमेर दर्गा ‘बेटी बचाओ जनआंदोलन’ में शामिल है। बेटी बचाने के लिए, लड़की की तरफ देखने का रवैया बदलने के लिए उन्होंने नए-नए उपक्रम शुरू किए हैं। हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिस्ती (1142-1236 एडी) के 26 वें वंशज हाजी सैयद सलमान चिस्ती से रविवार 24 जून 2019 को मुलाकात हुई थी। उनके साथ हुई बातचीत के बाद उन्होंने अपील की कि दुनियाभर की मस्जिदों में जुम्मे की नमाज के वक्त इमाम ‘बेटी बचाओ’ का संदेश देने लगे हैं। अजमेर दर्गा के साथ अन्य धार्मिक स्थल और हिंदू मंदिर प्रसिद्ध धार्मिक संप्रदाय भी ‘बेटी बचाओ जनआंदोलन’ में शामिल हुए हैं। 
4) यह जनआंदोलन अब भारत तक ही सीमित ना रहते हुए अब कनाडा, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, बांगलादेश, नेपाल, चीन, पाकिस्तान, अरब राष्ट्र, झांबिया, तुरकेस्तान, काँगो, सूडान, मालावी के साथ अफ्रीकन देशों सहित विकसित राष्ट्रों में भी फैल गया है।
5) दस साल पहले जब यह ‘बेटी बचाओ जनआंदोलन’ शुरू हुआ था तब लोगों को इसका महत्व समझ में नहीं आ रहा था, परंतु आंदोलन शुरू होने के बाद केंद्र शासन के साथ-साथ लगभग सभी राज्य सारकारों ने ‘बेटी बचाओ’ का नारा दिया और वे भी इसमें शामिल हुए हैं।
6) भारत और जगभर की प्रतिष्ठित संस्थाएं, इंटरनेशनल संस्थाएं भारत में कन्याभ्रूण और लड़कियों के बारे में होनेवाले भेदभाव पर रिसर्च करने लगे हैं। उदाहरण के तौर पर भारत के आर्थिक सर्वेक्षण-2017-2018 के अनुसार पिछले 10 सालों में 6 करोड़ 30 लाख लड़कियों की कोख में ही हत्या हुई है और यह दुनिया का सबसे बड़ा मानव नरसंहार है और 2 करोड़ 10 लाख लड़कियों को नकारा गया है। लैंसेट मेडिकल जर्नल-2018 की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 10 सालों में भारत देश में 0 से 5 आयु वर्ग में 24 लाख लड़कियों की हत्या यानी कि प्रतिवर्ष 2,40,000 लड़कियों की हत्या हुई है, यदि उनका इलाज किया जाता तो इतनी सारी हत्याएं नहीं हो पातीं। केवल वह लड़कियां होने के कारण उनके घरवालों ने (माता-पिता) उनको बचाने की कोई कोशिश नहीं की। इन सारे रिसर्च के अनुसार एक ही बात ध्यान में आती है कि भारत में कन्याभ्रूण हत्या/कन्या हत्या  (Female foeticide/ female Infanticide) दुनिया का सबसे बड़ा मानव नरसंहार (Human Genocide) है।
7) बेटी बचाओ जनआंदोलन की ओर से भारत और भारत के बाहर एक हजार से ज्यादा रैलियां (Rallies/March) निकाली गई हैं, जिसमें हजारों की तादाद में लोगों ने  हिस्सा लेते हुए स्त्री भ्रूण हत्या का कड़ा विरोध जताया। 
8) डॉ. गणेश राख ने अपने मेडीकेयर हॉस्पिटल में अब तक 2000 से ज्यादा लड़कियों की डिलिवरी मुफ्त में की है।
9) बॉलीवुड के फिल्मी सितारे अमिताभ बच्चन, अक्षयकुमार, शाहरूख खान, सोनाक्षी सिन्हा के साथ-साथ खेल जगत के सितारे सुशीलकुमार जैसी बड़ी विश्व हस्तियां इस जनआंदोलन में जुड़ चुुकी हैं। 
10) भारत में दिन-ब-दिन लड़कियों की घटती संख्या से हो रहा सामाजिक असमतोल, महिलाओं पर हो रहे अत्याचार इन सभी के कारण महिला और लड़कियों में असुरक्षित माहौल निर्माण हुआ है। स्त्रीभ्रूण हत्या जैसे दुष्चक्र के बारे में भारत के साथ-साथ पूरे विश्व की सरकारों व मीडिया में इस पर चर्चा हो रही है, इसमें से बाहर निकलने का विकल्प ढूंढ रहे हैं।
इससे एक बात तय है कि 10 साल पहले चिकित्सा क्षेत्र और समाज में पागल कहकर निंदा किए गए इस डॉक्टर के कारण ही पूरे विश्व में लड़कियों के लिए एक जनआंदोलन खड़ा हो पाया है। दस साल पहले जब यह आंदोलन शुरू किया गया था तब पहले उसको इतनी कामयाबी नहीं मिली। शुरू-शुरू में सिर्फ स्थानीय समाचारपत्रों में इस जनआंदोलन की खबरें आती थीं। सही मायने में स्थानीय समाचारपत्रों में आई खबरों के कारण ही यह क्रांति की चिंगारी आज इतनी फैल गई है कि इस आंदोलन को सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय पहचान तब मिली जब आदरणीय नाजमी सर ने आईएएनएस में इसकी खबर 2 जुलाई 2014 प्रकाशित की और इस आंदोलन को विश्वस्तर पर नवाजा गया। इस आंदोलन से सचमुच लड़कियों की जन्म संख्या बढ़ी है? सचमुच लड़कियां बचने लगी हैं? यह आंदोलन सचमुच कामयाब हो रहा है? क्या इसके लिए और अधिक प्रयास करना पड़ सकता है? इन सभी सवालों का जवाब हमें आनेवाली भारतीय जनगणना की रिपोर्ट (Next Ensuing Indian Census Report) में मिल सकता है।
आज तो सबको निश्चिततौर पर लग रहा है अगर देश, विश्व और इस समाज को बचाने के लिए बेटियों का बचना बेहद जरूरी है। लड़कियों को भी लड़कों के समान प्यार, सम्मान, सुरक्षा मिलनी चाहिए। उनकी तरफ देखने का नजरिया बदलना समय की जरूरत है तभी हम कह सकते हैं कि लड़कियों के लिए हमारा देश एवं समाज अब सुरक्षित है। मार्च 2020 से कोरोना महामारी के कारण हमने ‘बेटी बचाओ जनआंदोलन’ के सभी पब्लिक प्रोग्राम स्थगित किए गए हैं और हम भले ही अपने मेडिकेयर हॉस्पिटल में कोविड-19 के मरीजों का इलाज करने में जुट गए हैं परंतु हम अपने मुख्य उद्देश्य ‘बेटी बचाओ जनआंदोलन’ पर ही काम कर रहे हैं जो अंत तक बरकरार रहेगा।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ