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कलाकारों के बारे में क्या कोई सोचेगा? : कलाकार प्रशांत बोगम व कुणाल देशमुख का सरकार से करुण सवाल

हड़पसर, अप्रैल (ह.ए. प्रतिनिधि)

अपनी कला से अपना और अपने परिवार का पेट भरनेवाले कलाकारों के बारे में क्या कोई   सोचेगा? कोरोना संक्रमण की चपेट में वे भी पूरी तरह से आ गए हैं। क्या कलाकार कामगार नहीं? फिर से एक बार वही यातनाएं हमें ही क्यों सहन करनी पड़ रही हैं? अपनी कला से मनोरंजन करनेवाले कलाकार भी इंसान ही हैं, फिर हमारी ओर सरकार सकारात्मक रूप से क्यों नहीं देखती है? हमारी या हमारे परिवार की कोई चिंता नहीं है? सरकार ने समाज के विभिन्न वर्गों को मदद की घोषणा की है, जिसका हम निश्चित रूप में स्वागत करते हैं परंतु हमें कामगार वर्ग में क्यों नहीं गिना जाता है? यह करुण सवाल सरकार से कलाकार प्रशांत बोगम व कलाकार कुणाल देशमुख ने पूछा है।
पिछले साल से कोरोना विश्व महामारी से पूरा मनोरंजन क्षेत्र थम गया था। इसी पर निर्भर रहनेवाले कलाकारों का जीवन तहस-नहस हो गया था, अब कहीं जाकर उनका जीवन वापस फिर से पटरी पर आ ही रहा था कि लॉकडाऊन की पाबंदी से उनकी गाड़ी फिर से पटरी से नीचे उतार दी और मनोरंजन क्षेत्र फिर थम गया। नाट्यगृह बंद, शूटिंग बंद, कर्फ्यू, कार्यक्रम बंद, अनुमति नहीं, कोई मदद नहीं। संसार का बोझ किस तरह उठाया जाए, यही चिंता सताए जा रही है। सरकार ने समाज के विभिन्न वर्गों को मदद की घोषणा की, जिसका हम निश्चित रूप में स्वागत करते हैं। हमें कामगार वर्ग में क्यों नहीं गिना जाता? जिस दिन काम, उस दिन मानधन यह कामगार की व्याख्या नहीं है? हर समय सहयोग की भावना से सरकार को मदद की है। महाराष्ट्र का किल्लारी भूकंप हो या पश्चिम महाराष्ट्र में बारिश का हा:हाकार और अब कोरोना संक्रमण का संकट। इस परिस्थिति में खुद के नाटक, शूटिंग, विभिन्न कार्यक्रम एक तरफ रखकर समाज के विभिन्न वर्गों को अनाज, कपड़े, आर्थिक मदद जरूरतमंदों तक पहुंचाई। अपने निजी जीवन को एक ओर रखते हुए जरूरतमंद परिवारों को संभालने के लिए जी जान से कड़ी मेहनत की। मदद पहुँचाने के लिए दिन देखा ना रात, अपना कर्तव्य मानते हुए जिम्मेदारी निभाई। कभी शूटिंग हुई तो मानधन के लिए एक महीने तक राह देखनी पड़ती है। अपेक्षाओं के बोझ तले हम दबे हुए हैं, कल दूसरा काम मिलेगा, इसलिए महीने की राह देखनी पड़ती है। कलाकार के रूप में सब कुछ सहन किया है। 
देश की बड़ी आर्थिक स्त्रोत वाले कार्यक्रमों को अनुमति दी गई, लेकिन हमें अनुमति नहीं दी गई। हर बार हमने सहनशीलता दिखाई। हमारा और कोई इसके अलावा दूसरा विकल्प नहीं बस अपनी कला पर ही अपना व अपने परिवार का पूरा जीवन निर्वाह निर्भर है। पारिवारिक जरूरत को पूर्ण करने के लिए समाज का मनोरंजन करते आ रहे हैं। बैंक कर्ज देती नहीं है क्योंकि हमारे काम का कुछ भरोसा नहीं। हमारा जीवन सार्थक कैसे होगा? आगामी समय में किसानों की खुदखुशी के बजाए कलाकारों की खुदखुशी की कतार लगेगी। 
जब चुनाव का वक्त होता है तब हम कलाकारों की बड़ी याद आती है। कलाकारों को अपने प्रचार में शामिल किया जाता है। चुनाव की रैली में मुख्य आकर्षण का रूप दिया जाता है और अब उन्हीं कलाकारों को इन्सानियत में भी नहीं गिना जा रहा, क्या कलाकार इन्सान नहीं हैं? इन्हें जीने का कोई हक नहीं है ? हमारे बारे में क्या कोई सोचेगा? हम कलाकारों की कोई कदर नहीं अगर होती तो हमें हमारा काम शुरू करने की इजाजत दी जाती थी। 

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