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डोडो पक्षी

चौधरी महाराज सिंह भारती बहुत बड़े विद्वान हुए हैं। उनकी एक पुस्तक पढ़ रहा था- सृष्टि और प्रलय। उसमें डोडो पक्षी के बारे में पढ़ा। अफ्रीका में कबूतर के आकार का एक पक्षी था। जब भूमिगत हलचल के कारण भूखंड अलग अलग हटने लगे तो मॉरीशस द्वीप अफ्रीका से कट गया। उस द्वीप पर शिकारी जानवर नहीं पहुंच पाए। भरपूर आहार भूमि पर उपलब्ध  था। वह पक्षी भरपूर आहार पूर्ण सुरक्षा के कारण मोटा और आलसी बन गया, जैसे घरेलू बतख मोटी और सुस्त हो गई। उसका प्रत्येक वह संकरण अधिक सफल रहा   जो भूमि पर रहने के लिए अधिक उपयुक्त था।
करोड़ों वर्षों तक उक्त भूमि पर पक्षी मॉरीशस में फलता फूलता रहा। जब खोज करते हुए यूरोप के पुर्तगालियों ने मॉरीशस द्वीप खोज निकाला और उसे आबाद करना आरंभ किया तो उक्त पक्षी का विनाश आरंभ हो गया। उसने कभी शत्रु नहीं देखे थे। वह अपना बचाव करना आवश्यक नहीं समझता था। पुर्तगाली उसे आराम से पकड़कर खा जाते थे। पुर्तगाली भाषा में मूर्ख को डोडो कहा जाता है। अतः उक्त भूमि पक्षी को डोडो के नाम से पुकारना आरंभ कर दिया गया। 1505 से लेकर 1598 तक बड़ी संख्या में डोडो पक्षी मारे गए। कहीं जंगलों आदि में कोई छिपा हुआ डोडो ही बच पाया। उस समय मानव में इतनी समझ नहीं थी कि वह किसी जानवर को संरक्षण दे सके। फलस्वरूप डोडो पक्षी जिसे भी कहीं मिल गया, उसी ने मार खाया। जनसंख्या बढ़ती गई, मॉरीशस का अंतिम डोडो 1691 ई. में मार डाला गया और डोडो पक्षी की नस्ल सदैव के लिए समाप्त हो गई।
मित्रो, हमने भी कोरोना देखा नहीं है। मानव के इतिहास में ऐसा कुछ घटित हुआ होगा यह तो पता नहीं। पर सफलता, विफलता और विनाश का इतिहास अवश्य है। एक बात समझ में आती है कि जो सहज बदलाव के अनुरूप ढलता चला गया, वह बचा रहा और जो अपनी नासमझी, हठधर्मी, अपनी आदत को अपने अहंकार से जोड़कर बदलाव के विरुद्ध चला, उसका अस्तित्व खतरे में रहा। आज पैदा हुए अदृश्य शत्रु कोरोना को जीतने न दें, पूरी सजगता, एकता, अनुशासन व सावधानी   से उसे हराएं। डोडो आज नहीं     है पर उसकी कहानी मौजूद है   और चिल्ला-चिल्लाकर सबक  सिखा रही है।
-श्री सत्येंद्र सिंह
सप्तगिरी सोसाइटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे-411046
मोबाइल : 9922993647

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